
PM मोदी ने तोड़ा पंडित नेहरू का रिकॉर्ड, नमो युग में भारत को क्या मिला?
आज के दौर में भारत एक बहुत ही जटिल वैश्विक और भू-राजनीतिक माहौल का सामना कर रहा है। एक तरफ चीन का लगातार बढ़ता हुआ प्रभाव है, तो दूसरी तरफ भारत के पड़ोस में लगातार अस्थिरता बनी हुई है।
भारतीय राजनीति में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर स्थापित हो चुका है। नरेंद्र मोदी भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री (Longest-Serving Elected PM) बन गए हैं। उन्होंने इस मामले में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है।
इस ऐतिहासिक मौके पर 'द फेडरल' के एडिटर-इन-चीफ एस श्रीनिवासन ने अपने खास कार्यक्रम 'टॉकिंग सेंस विद श्रीनी' (Talking Sense With Srini) में इस कार्यकाल का एक गहरा विश्लेषण किया है। उनका मानना है कि मोदी सरकार की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण विरासत केवल चुनावों में जीत हासिल करना नहीं है, बल्कि भारत के राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदल देना है।
'सभ्यतागत बदलाव' या सिविलाइजेशनल ट्रांसफॉर्मेशन
एस श्रीनिवासन के मुताबिक, पीएम मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल चुनाव जीतना या सीटों का आंकड़ा बढ़ाना नहीं रहा। उन्होंने इसे भारत का एक 'सभ्यतागत बदलाव' (Civilisational Transformation) बताया। आजादी के समय भारत की परिकल्पना एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य (Secular Democratic Republic) के रूप में की गई थी। लेकिन पिछले कुछ सालों में भारत की राजनीति और सोच में एक बड़ा बदलाव आया है। देश अब एक बहुसंख्यकवादी मानसिकता (Hindu-Majoritarian Mindset) की तरफ बढ़ता हुआ दिख रहा है। यह बदलाव पूरी तरह से पूरा हो चुका है या नहीं, यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह मोदी युग का सबसे बड़ा राजनीतिक और वैचारिक बदलाव है।
चुनावी राजनीति और 2024 का मोड़
अगर हम चुनावी समीकरणों की बात करें, तो बीजेपी का चुनावी रथ लगातार आगे बढ़ता रहा है। हालांकि, साल 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को एक बड़ा झटका लगा जब पार्टी अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल करने से चूक गई। श्रीनिवासन ने ध्यान दिलाया कि 2024 में बीजेपी के सामने आई चुनौतियां केवल विपक्ष की तरफ से नहीं थीं, बल्कि पार्टी के अंदरूनी गलियारों और आरएसएस (RSS) के साथ कथित मतभेदों से भी जुड़ी हुई थीं।
लेकिन इस झटके के बाद भी पार्टी के नेतृत्व ने बहुत तेजी से अपनी गलतियों को सुधारा। लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद हुए राज्यों के विधानसभा चुनावों में सिलसिलेवार जीत दर्ज करके बीजेपी ने फिर से अपनी मजबूत स्थिति साबित कर दी और देश की राजनीति में अपनी पकड़ को ढीला नहीं होने दिया।
बहुसंख्यक राष्ट्रवाद का वैचारिक प्रोजेक्ट
श्रीनिवासन का मानना है कि मोदी सरकार ने अपने पूरे कार्यकाल के दौरान एक बड़े वैचारिक एजेंडे पर काम किया है। जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को हटाना, अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण और समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) की तरफ बढ़ते कदम—ये सभी फैसले एक ही थीम का हिस्सा हैं।
इन कदमों के जरिए देश के पुराने ढर्रे यानी नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता (Nehruvian Secularism) के मॉडल को बदलकर एक अधिक मुखर और आक्रामक बहुसंख्यक राष्ट्रवाद (Majoritarian Nationalism) में तब्दील करने की कोशिश की गई है।
विदेश नीति: नैतिक रुख बनाम रणनीतिक स्वहित
आज के दौर में भारत एक बहुत ही जटिल वैश्विक और भू-राजनीतिक माहौल का सामना कर रहा है। एक तरफ चीन का लगातार बढ़ता हुआ प्रभाव है, तो दूसरी तरफ भारत के पड़ोस में लगातार अस्थिरता बनी हुई है। श्रीनिवासन ने इस बात पर सवाल उठाया कि क्या भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी बढ़ती ताकत के मुताबिक प्रभाव डाल पा रहा है?
उनका कहना है कि आज आम भारतीयों को भले ही यह महसूस होता हो कि विदेशों में भारत का सम्मान बहुत बढ़ गया है, लेकिन क्या हम वाकई वैश्विक स्तर पर अपने वजन के हिसाब से असर छोड़ रहे हैं? शायद नहीं। पहले के दौर में भारत वैश्विक मुद्दों पर एक नैतिक स्टैंड (Moral Position) लेने के लिए जाना जाता था। इसके विपरीत, आज की विदेश नीति पूरी तरह से रणनीतिक स्वहित (Strategic Self-Interest) पर आधारित है, जहां देश का फायदा सबसे पहले देखा जाता है।
आर्थिक प्रदर्शन: डिजिटल क्रांति बनाम कड़वी सच्चाई
आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार के पास गिनाने के लिए कई बड़ी और ठोस उपलब्धियां हैं। सरकार ने देश के बुनियादी ढांचे (Infrastructure), डिजिटल पेमेंट्स (Digital Payments), वित्तीय समावेशन और कल्याणकारी योजनाओं को आम जनता तक पहुंचाने में बेहतरीन काम किया है।
जनधन खाते, सरकारी योजनाओं से जुड़े सीधे बेनेफिट ट्रांसफर, ग्रामीण इलाकों में बिजली पहुंचाना और बड़े पैमाने पर शौचालयों का निर्माण—इन सभी योजनाओं का जमीन पर एक बड़ा और सकारात्मक असर देखने को मिला है। इन योजनाओं ने करोड़ों लोगों के जीवन को बेहतर बनाया है।
लेकिन इसी के साथ, श्रीनिवासन ने एक चेतावनी भी दी है। उनका कहना है कि केवल जीडीपी (GDP) के बड़े आंकड़े देश की असली और गहरी आर्थिक समस्याओं को छिपा नहीं सकते। कुल जीडीपी का बढ़ना अपने आप में हर नागरिक की समृद्धि की गारंटी नहीं होता। आज भी भारत की प्रति-व्यक्ति आय (Per-Capita Income) काफी कम है, हमारा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर उतना मजबूत नहीं हो पाया है जितनी उम्मीद थी, और देश के सामने रोजगार (Employment) की चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं।
वो क्षेत्र जहां तुरंत ध्यान देने की है ज़रूरत
अंत में उन सेक्टर्स की बात की गई है जहां सरकार को तुरंत बड़े कदम उठाने की जरूरत है। देश में आने वाले विदेशी निवेश (Foreign Investment) में हाल के दिनों में गिरावट देखी गई है। इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी भविष्य की तकनीकों को घरेलू स्तर पर विकसित करने के मामले में भी भारत अभी थोड़ा पीछे चल रहा है।
राजनैतिक रूप से देखें तो बीजेपी ने चुनाव दर चुनाव खुद को मजबूत किया है। लेकिन कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस राजनीतिक दौड़ के चक्कर में सरकार का ध्यान आर्थिक मोर्चे की बुनियादी समस्याओं से थोड़ा भटक गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल को लगभग 12 साल होने जा रहे हैं। इतने लंबे समय के बाद भी उनकी विरासत और उनके फैसलों को लेकर बहस अभी खत्म नहीं हुई है। आलोचकों और समर्थकों के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि भारत के इतिहास में बहुत कम ऐसे नेता हुए हैं जिन्होंने देश के राजनीतिक, सामाजिक और संस्थागत ढांचे को इतनी गहराई से बदला हो।

