तेल से लेकर कारपूल तक, पीएम मोदी की गुहार के पीछे का कड़वा सच
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गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के वेरावल में भगवान शिव को समर्पित पुनर्निर्मित मंदिर के उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी। फोटो साभार: पीटीआई (PTI)

तेल से लेकर कारपूल तक, पीएम मोदी की गुहार के पीछे का कड़वा सच

प्रधानमंत्री मोदी पश्चिम एशिया में जारी उथल-पुथल के बीच घरेलू स्तर पर खर्चों में कटौती का आह्वान कर रहे हैं, भारत का खोखला 'विश्वगुरु' का दावा सामने आ गया है..


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हैदराबाद में प्रधानमंत्री मोदी के हालिया भाषण से संकेत मिलता है कि भारत की आर्थिक शक्ति भारी दबाव में है और नेता लोगों से आर्थिक मितव्ययिता अपनाने की गुहार लगा रहे हैं। जैसे-जैसे प्रधानमंत्री मोदी पश्चिम एशिया में जारी उथल-पुथल के बीच घरेलू स्तर पर खर्चों में कटौती (belt-tightening) का आह्वान कर रहे हैं, भारत की निष्क्रिय विदेश नीति और उसका खोखला 'विश्वगुरु' का दावा सामने आ गया है।

रविवार (11 मई) को हैदराबाद में एक सार्वजनिक सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोगों से की गई अपील कि वे कारपूल करें, घर से काम करें (work from home), सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें और खाना पकाने के तेल का कम सेवन करें। ताकि पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण उत्पन्न संकट से उबरा जा सके। किसी प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्था के नेता के भाषण जैसी नहीं बल्कि एक छोटे और असुरक्षित देश के नेता के भाषण जैसी प्रतीत होती है।

यह वास्तव में सच है कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के दावे के बावजूद भारत असुरक्षित है। इसकी तीव्र वृद्धि एक गहरे मजबूत आर्थिक आधार पर टिकी नहीं रही है। यह देश एक तरह से किनारे पर खड़ा है, जहां एक भी बड़ा वैश्विक आर्थिक झटका देश को नीचे गिरा सकता है। भारत पहले ही दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से फिसलकर 2025 में छठे स्थान पर आ गया है और इसका मुख्य कारण डॉलर के मुकाबले रुपये का कमजोर होना है, जो लगभग 80 रुपये से गिरकर 95 रुपये तक पहुंच गया है।

पिछले कुछ महीनों से प्रधानमंत्री पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों के प्रचार में व्यस्त रहे हैं। और अब जाकर उन्हें ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध के राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को देखने का समय मिला है।

भारत विश्वगुरु नहीं है

श्री मोदी का यह दावा कि भारत विश्वगुरु है और विश्व मामलों में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी है, खोखला सुनाई देता है। जब देश को अपना प्रभाव दिखाना चाहिए था और स्पष्ट तथा मुखर होकर बोलना चाहिए था। चाहे वह रूस-यूक्रेन युद्ध हो, गाजा में 70,000 नागरिकों का इजरायली नरसंहार हो या ईरान पर अमेरिका-इजरायल का हमला, भारत ने वैश्विक मंच पर खुद को एक दयनीय रूप से निष्क्रिय अभिनेता तक सीमित कर लिया है।

रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत सरकार की चिंता केवल यूक्रेन में भारतीय छात्रों की सुरक्षा या रूसी युद्ध के मोर्चे पर भाड़े के सैनिकों के रूप में लड़ने वाले भारतीयों या युद्ध छिड़ने पर ईरान से भारतीयों को निकालने और गाजा में नागरिकों की हत्या पर हल्की सुगबुगाहट तक ही सीमित रही। ऐसा लगता है, जैसे भारत फटकार, तिरस्कार और उपहास के डर से अपनी आवाज उठाने से डर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस एकमात्र चीज में पर्याप्त साहस जुटाया, वह रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को यह बताना था कि 'यह युद्धों का युग नहीं है'।

भारत उतना असहाय नहीं है, जितना कि उसके प्रधानमंत्री और देश के दक्षिणपंथी सुरक्षा व रणनीति प्रतिष्ठान के अन्य लोग खुद को मानते हैं। भारत को पुतिन को यह बताने के लिए साहस और थोड़े कम संकोच की आवश्यकता है कि यूक्रेन के साथ रूस के मतभेदों को बल प्रयोग से नहीं सुलझाया जा सकता। इसी तरह इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को यह कहना जरूरी है कि हमास की किसी भी उकसावे वाली कार्रवाई के बावजूद नागरिकों को निशाना बनाना सही नहीं है। और ईरान के परमाणु व सुरक्षा प्रतिष्ठानों पर हवाई हमले उस धारणा की समस्या को हल नहीं करेंगे जो इजरायल, अमेरिका और ईरान एक-दूसरे के बारे में रखते हैं।

भारत को पश्चिम एशिया में युद्धविराम के लिए दबाव बनाने की पहल करनी चाहिए थी। क्योंकि तेल, गैस और उर्वरकों की आपूर्ति में व्यवधान सीधे भारत को प्रभावित कर रहा है। पाकिस्तान के साथ अपने तीखे मतभेदों के बावजूद, भारत को मध्यस्थता के प्रयासों में इस्लामाबाद के साथ हाथ मिलाना चाहिए था।

संकीर्ण दृष्टि (Blinkered vision)

भारत के रणनीतिक समुदाय के कथित कट्टरपंथियों के बीच यह एक संकीर्ण दृष्टि व्याप्त है कि भारत को कभी भी अंतरराष्ट्रीय मामलों में शांति और सद्भाव की बात नहीं करनी चाहिए। क्योंकि इससे भारत एक कमजोर और डरपोक देश (namby-pamby dove) बन जाएगा और कोई भी उसकी आर्थिक व सैन्य शक्ति का सम्मान नहीं करेगा।

भारत को सभी युद्धरत देशों के बीच शांति और संवाद के लिए मुखर होकर बोलना चाहिए क्योंकि वैश्विक शांति ही वह चीज है, जिसकी भारत को अपनी आर्थिक वृद्धि के लिए आवश्यकता है। भारत को शांति के प्रति 'आक्रामक' (hawkish) होना सीखना होगा। प्रधानमंत्री का हैदराबाद भाषण दर्शाता है कि भारत की आर्थिक शक्ति भारी तनाव में है और नेता लोगों से आर्थिक मितव्ययिता अपनाने की विनती कर रहे हैं।

पिछले कुछ हफ्तों से मोदी सरकार के सदस्य बयान जारी कर रहे थे कि तेल आपूर्ति के मामले में भारत आरामदायक स्थिति में है, जबकि स्थिति नाजुक थी। यह पूरी तरह से श्री मोदी की गलती नहीं है कि वे विश्व शांति के लिए आक्रामक रूप से बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। इस रुख में बदलाव 1991 से शुरू हुआ जब भारत ने आर्थिक उदारीकरण को अपनाया। तब रणनीति विशेषज्ञों ने तर्क दिया था कि भारत को विश्व शांति के बारे में मनोवैज्ञानिक विमर्श (psychobabble) बंद करना चाहिए, अपनी खाली उपदेश देने की आदत को कम करना चाहिए और केवल आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

संकीर्ण दृष्टि वाले विशेषज्ञ इस प्रमुख कारक को भूल गए कि आर्थिक विकास केवल एक शांतिपूर्ण दुनिया में ही सबसे अच्छा हो सकता है और अपने राष्ट्रीय हित में भारत को विश्व शांति के बारे में जोर-शोर से बोलना चाहिए। भारत को विश्व शांति की आवश्यकता है ताकि वह तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सके और अगले दशक में 7 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी हासिल कर सके।

भारत को विश्व शांति की आवश्यकता है

एक बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में भारत के रुख का वजन होता है। अब यह 1950 से 1970 के दशक वाला गरीब, विकासशील देश नहीं रहा। यह निवेश और खपत के लिए प्रमुख बाजारों में से एक बन गया है और नई दिल्ली को अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए अपनी आर्थिक शक्ति का उपयोग करना चाहिए।

शांति कोई काल्पनिक (utopian) लक्ष्य नहीं है बल्कि यह एक कठोर आवश्यकता है। वास्तव में भारत को अपने आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए उच्च नैतिक स्वर का उपयोग करना चाहिए। यह केवल यह दर्शाता है कि भारत के नीति निर्माता अपनी प्रतिक्रियाओं में बहुत जड़ (wooden) हैं। वे शांति के उच्च आदर्श को आर्थिक विकास की अनिवार्यता के साथ जोड़ने में सक्षम नहीं हैं। कभी-कभी दमनकारी और आक्रामक कूटनीति के अलंकारिक शब्दों को सादे शांतिपूर्ण संवाद को जगह देनी चाहिए। क्योंकि यही समय की मांग है।

ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध ने न केवल वैश्विक तेल आपूर्ति को बाधित किया है। बल्कि यह वैश्विक आर्थिक संभावनाओं को भी चोट पहुँचा रहा है। अमेरिका और इजरायल ईरान के परमाणु कार्यक्रम से पैदा हुए खतरे की अपनी पूर्व-निर्धारित धारणाओं के कारण विश्व अर्थव्यवस्था को बंधक नहीं बना सकते। मामले को सुलझाने के अन्य तरीके होने चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ईरान, इजरायल और अमेरिका के अलावा खाड़ी अरब देशों के रुख के कारण पश्चिम एशिया संकट बहुत जटिल है।

भारत को ईरान, इजरायल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ बातचीत करनी चाहिए और ईरान तथा अमेरिका के बीच 'ईमानदार मध्यस्थ' (honest broker) की भूमिका निभाने वाले पाकिस्तान का खुले तौर पर समर्थन करना चाहिए। श्री मोदी का आर्थिक मितव्ययिता का संदेश लाचारी की भावना प्रदर्शित करता है, जो दयनीय है। भारत को सक्रिय (pro-active) होने की आवश्यकता है। क्योंकि वह एक ऐसा वैश्विक आर्थिक खिलाड़ी है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।


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