सोशल मीडिया की रील से शुरू हुआ पूरा घटनाक्रम
दरअसल, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक वीडियो साझा किया था. इस वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें पार्ले प्रोडक्ट्स की मशहूर चॉकलेट-कैरमल कैंडी 'मेलोडी' का एक पैकेट सौंपते हुए नजर आ रहे हैं. इस हल्के-फुल्के पल ने इंटरनेट पर सालों से चल रहे "मेलोडी" (Melodi) मीम ट्रेंड को एक बार फिर से जिंदा कर दिया, जो अक्सर इन दोनों नेताओं की मुलाकात के समय सोशल मीडिया पर तैरने लगता है. इंटरनेट पर तो इस वीडियो को बहुत ज्यादा पसंद किया गया, लेकिन देश के भीतर इस पर तुरंत तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं. शो की होस्ट नीलू व्यास ने भी रेखांकित किया कि किस तरह इस एक वीडियो ने पूरे इंटरनेट पर तहलका मचा दिया है और साथ ही विपक्ष को सरकार पर हमला करने का एक बड़ा मौका दे दिया है.
राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे का तीखा हमला
कांग्रेस के दिग्गज नेता और सांसद राहुल गांधी ने इस वायरल वीडियो को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बेहद तीखा तंज कसा है. राहुल गांधी ने कहा कि इस समय हमारे देश के सिर पर एक बहुत बड़ा आर्थिक तूफान मंडरा रहा है, देश की जनता परेशान है और हमारे प्रधानमंत्री इटली में बैठकर टॉफियां बांटने में पूरी तरह व्यस्त हैं. राहुल गांधी के अलावा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को बुरी तरह घेरा है. खड़गे ने देश में लगातार बढ़ती जा रही महंगाई, बेरोजगारी के डरावने आंकड़ों और देश पर बढ़ते कर्ज का हवाला देते हुए बीजेपी सरकार पर निशाना साधा. उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि मोदी सरकार का मुख्य फोकस देश की जमीनी समस्याओं को सुलझाने और सुशासन देने पर नहीं, बल्कि केवल अपने लोक संपर्क (PR) को चमकाने पर है.
गंभीर रणनीतिक मुद्दों पर भारी पड़ा सिर्फ एक वायरल पल
वरिष्ठ पत्रकार संजय कपूर ने इस डिबेट में एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू को सामने रखा. उन्होंने कहा कि आज के दौर में इंटरनेट कल्चर और वायरल मोमेंट्स दुनिया के बड़े नेताओं के बीच होने वाली कूटनीतिक वार्ताओं को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं. कपूर के अनुसार, यह साफ तौर पर दिखाई देता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंटरनेट की इस मांग को पूरा करना चाहते हैं और अब नेताओं के बीच की बातचीत का नैरेटिव खुद इंटरनेट तय कर रहा है. उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि पीएम मोदी और मेलोनी की मुलाकातों के जितने भी दृश्य सामने आ रहे हैं—चाहे वह कार की सवारी हो, कोलोसियम का दौरा हो या अनौपचारिक बातचीत—उन्हें इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे कि वही इस दौरे की सबसे बड़ी उपलब्धि हों. इसका नुकसान यह हो रहा है कि दोनों देशों के बीच व्यापार विस्तार और 'भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर' (IMEC) जैसे बेहद गंभीर और रणनीतिक मुद्दों पर कोई बात ही नहीं कर रहा है, क्योंकि वे सब इस एक मेलोडी टॉफी के पीछे पूरी तरह छिप गए हैं. उन्होंने राज्यसभा सांसद मनोज झा के एक व्यंग्य का भी जिक्र किया, जिन्होंने इस पूरे मामले को 'कैरमल डिप्लोमेसी' का नाम दिया है.
कूटनीति के नाम पर इमेज बिल्डिंग करने का आरोप
चर्चा में शामिल कांग्रेस नेता अंशुल त्रिवेदी ने दावा किया कि यह 'मेलोडी मोमेंट' कुछ और नहीं बल्कि सोशल मीडिया के जरिए पीएम मोदी की राजनीतिक छवि को दोबारा से रीपैकेज करने का एक सुनियोजित प्रयास है. त्रिवेदी ने कहा कि यह प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से अपना एक अनौपचारिक और दोस्ताना पक्ष दिखाने की सोची-समझी कोशिश है. ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि देश की जनता अब उनके पुराने भाषणों और दावों को उस तरह से स्वीकार नहीं कर रही है जैसे वह पहले किया करती थी. उन्होंने आरोप लगाया कि आर्थिक मोर्चे पर बढ़ती दिक्कतों और जनता के भीतर पनप रहे असंतोष के कारण प्रधानमंत्री की जो 'लार्जर दैन लाइफ' वाली छवि थी, उसे अब बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. इसी वजह से अपनी नीतियों में मजबूती की कमी को छिपाने के लिए अब सोशल मीडिया पर केवल 'वाइरलिटी' का सहारा लिया जा रहा है. त्रिवेदी ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री के ये विदेशी दौरे अब देश के हितों के लिए कम और अपनी लोकप्रियता का प्रचार करने के लिए चुनावी अभियान जैसे ज्यादा दिखाई देते हैं.
देश की मुख्य आर्थिक चुनौतियों से ध्यान भटकाने की कोशिश
पैनल में मौजूद दोनों ही विश्लेषकों ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि इस वायरल कूटनीति का देश की आर्थिक वास्तविकताओं से कोई मेल नहीं है. संजय कपूर ने देश के मध्यमवर्गीय परिवारों की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि आज आम लोग बढ़ती कीमतों और आर्थिक तंगी के कारण भारी संघर्ष कर रहे हैं और चारों तरफ हालात बहुत चिंताजनक दिख रहे हैं. ऐसे गंभीर माहौल में जब प्रधानमंत्री विदेश में किसी अन्य नेता के साथ इस तरह के वीडियो बनाते हैं, तो वह देश की जनता की पीड़ा के प्रति पूरी तरह से असंवेदनशील और कटे हुए महसूस होते हैं. अंशुल त्रिवेदी ने भी इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि देश को इस समय बेहद गंभीर नीतिगत चर्चाओं की जरूरत है, लेकिन सरकार का पूरा तंत्र केवल सोशल मीडिया नैरेटिव को कंट्रोल करने और कृत्रिम रूप से वायरल पल पैदा करने में लगा हुआ है. उन्होंने पीएम मोदी द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने की बात भी उठाई और कहा कि वह संसद के प्रति जवाबदेह होने के बजाय एक्स (ट्विटर) और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर प्रासंगिक बने रहने की कोशिश कर रहे हैं.
क्या सोशल मीडिया के दौर में कूटनीति का स्तर गिर रहा है?
इस पूरी चर्चा का एक बड़ा निष्कर्ष यह भी निकला कि सोशल मीडिया के इस आधुनिक युग में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का मूल स्वरूप ही बदल रहा है. संजय कपूर ने माना कि यह सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर के नेता अब ऐसे पलों की तलाश में रहते हैं जो इंटरनेट पर ट्रेंड कर सकें, भले ही उस पूरी यात्रा का कोई ठोस या वास्तविक कूटनीतिक परिणाम न निकला हो. ये वायरल पल किसी भी सामान्य विदेशी दौरे को सोशल मीडिया पर एक बहुत बड़ी सफलता के रूप में पेश करने में मदद करते हैं. लेकिन उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ऐसा करके हम कूटनीति जैसे गंभीर विषय का स्तर नहीं गिरा रहे हैं? यह सब सोशल मीडिया के फॉलोअर्स को कुछ देर का आनंद जरूर दे सकता है, लेकिन यह वास्तविक और गंभीर कूटनीति नहीं है. त्रिवेदी ने अंत में कहा कि जानकारी को नियंत्रित करना और अपनी एक खास छवि का निर्माण करना ही मोदी की राजनीति का मुख्य केंद्र रहा है, और जब पुराने तरीके काम नहीं कर रहे हैं, तो इन नए अनौपचारिक रास्तों का इस्तेमाल किया जा रहा है.
विदेश मंत्रालय के अधिकारियों पर बढ़ता मानसिक दबाव
चर्चा के दौरान संजय कपूर ने एक और बेहद चौंकाने वाला दावा किया. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के इन विदेशी दौरों के दौरान विदेश मंत्रालय (MEA) के अधिकारियों पर एक अलग ही तरह का भारी दबाव रहता है. हाल के दिनों में विदेशी धरती पर पत्रकारों द्वारा पूछे गए कुछ तीखे और असहज करने वाले सवालों के बाद से भारतीय अधिकारी काफी सहमे हुए हैं. कपूर ने आरोप लगाया कि विदेश मंत्रालय के अधिकारी इस बात को लेकर बेहद डरे रहते हैं कि प्रधानमंत्री के दौरे के समय कुछ भी गलत न हो जाए या कोई असहज स्थिति न बन जाए. यही वजह है कि मेलोडी टॉफी जैसे पहले से तय और पूरी तरह से कोरियोग्राफ किए गए हल्के-फुल्के पलों को खुद आगे बढ़कर बढ़ावा दिया जाता है, ताकि मीडिया और सोशल मीडिया पर केवल सकारात्मक सुर्खियां ही छाई रहें और कोई गंभीर सवाल न पूछा जा सके.
क्या कूटनीति का अंत सिर्फ एक टॉफी का पैकेट है?
तमाम तीखी आलोचनाओं और राजनीतिक बयानों के बावजूद सोशल मीडिया पर 'मेलोडी' का यह ट्रेंड लगातार शीर्ष पर बना हुआ है और प्रधानमंत्री के समर्थक दोनों नेताओं के बीच की इस केमिस्ट्री की जमकर तारीफ कर रहे हैं. इस पूरे विवाद ने अंततः एक बहुत बड़ा वैचारिक सवाल छोड़ दिया है कि क्या सोशल मीडिया के इस दौर में अंतरराष्ट्रीय संबंध सिर्फ बाहरी दिखावे, इंटरनेट रीच और लाइक्स के दम पर चलेंगे या फिर पारंपरिक रणनीतिक परिणामों और संधियों के आधार पर? जहां एक तरफ सरकार के समर्थक इसे भारत के एक लोकल ब्रांड को वैश्विक स्तर पर प्रमोट करने और सॉफ्ट-पावर के प्रदर्शन के रूप में देख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विश्लेषक इसके भविष्य को लेकर काफी आशंकित हैं. संजय कपूर ने इस पूरी स्थिति पर गहरी निराशा जताते हुए अपनी बात खत्म की और कहा कि इस पूरे मामले की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि देश के प्रधानमंत्री के इतने बड़े और महत्वपूर्ण विदेशी दौरे का सबसे बड़ा हासिल अंत में केवल एक मेलोडी टॉफी का पैकेट हवा में लहराना बनकर रह गया है.
(ऊपर दिया गया कंटेंट एक फाइन-ट्यून्ड AI मॉडल का इस्तेमाल करके वीडियो से ट्रांसक्राइब किया गया है। एक्यूरेसी, क्वालिटी और एडिटोरियल इंटीग्रिटी पक्का करने के लिए, हम ह्यूमन-इन-द-लूप (HITL) प्रोसेस का इस्तेमाल करते हैं। AI शुरुआती ड्राफ्ट बनाने में मदद करता है, जबकि हमारी अनुभवी एडिटोरियल टीम पब्लिकेशन से पहले कंटेंट को ध्यान से रिव्यू, एडिट और बेहतर बनाती है। द फेडरल में, हम भरोसेमंद और इनसाइटफुल जर्नलिज़्म देने के लिए AI की एफिशिएंसी को ह्यूमन एडिटर्स की एक्सपर्टीज़ के साथ मिलाते हैं।)