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महंगी गैस और ईंधन संकट का परमानेंट इलाज, भारत को चाहिए नई एनर्जी सर्विस कंपनियां


महंगी गैस और ईंधन संकट का परमानेंट इलाज, भारत को चाहिए नई एनर्जी सर्विस कंपनियां
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भारत रसोई गैस के लिए विदेशी आयात पर निर्भर है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा को खतरा रहता है। खाना पकाने के लिए बिजली और देसी कोयले का उपयोग एक स्थायी समाधान है। हालांकि, घरों की वायरिंग और ग्रिड की क्षमता इसके लिए बड़ी बाधा है।

भारत इस समय भीषण गर्मी की लहर और रसोई गैस (LPG) की किल्लत से जूझ रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए यह सही है कि उसकी रसोई विदेशी ईंधन और वैश्विक बाज़ारों की अस्थिरता पर निर्भर रहे? भारत अपनी ज़रूरत की आधे से ज़्यादा गैस आयात करता है, जिसकी उपलब्धता और कीमत दोनों ही हमारे नियंत्रण से बाहर हैं। अब वक्त आ गया है कि भारत अपनी रसोई को 'इलेक्ट्रिक कुकिंग' की ओर मोड़े, लेकिन यह बदलाव इतना आसान नहीं है। इसके लिए हमें एक नए प्रकार के संगठनों की ज़रूरत है— एनर्जी सर्विस ऑर्गेनाइजेशन (ESO)।

विदेशी गैस बनाम स्वदेशी कोयला: आत्मनिर्भरता की राह

भारत के लिए आयातित ईंधन पर खाना पकाना कभी भी तर्कसंगत नहीं रहा। एलपीजी की कीमतें वैश्विक राजनीति और उत्पादन में कटौती से प्रभावित होती हैं। इसके विपरीत, भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा कोयला भंडार है। अनुमानित 400 बिलियन टन कोयले के साथ, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को खुद पूरा कर सकता है।

यदि हम 'कोल गैसीकरण' (Coal Gasification) और कार्बन कैप्चर जैसी तकनीकों को प्राथमिकता दें, तो कोयले से बनने वाली बिजली आज की तुलना में कहीं अधिक स्वच्छ हो सकती है। वर्तमान में भारत की 70% से अधिक बिजली कोयले से ही आती है। यदि भारतीय रसोई पूरी तरह बिजली पर शिफ्ट हो जाती हैं, तो वे भू-राजनीतिक जोखिमों और विनिमय दर में होने वाले उतार-चढ़ाव से पूरी तरह सुरक्षित हो जाएंगी।

इंडक्शन चूल्हा: सिर्फ टैक्स कटौती काफी क्यों नहीं?

सरकार बिजली से खाना पकाने को बढ़ावा देने के लिए इंडक्शन कुकटॉप्स पर टैक्स कटौती जैसे कदम उठाने पर विचार कर रही है। लेकिन समस्या सिर्फ चूल्हा खरीदने की नहीं है। असली चुनौती हमारे घरों का बुनियादी ढांचा (Infrastructure) है।

ज़्यादातर पुरानी और नई इमारतों की वायरिंग एक सीमित लोड (जैसे 7.5 kW) के लिए डिज़ाइन की गई है। मान लीजिए एक अपार्टमेंट ब्लॉक में 28 फ्लैट हैं। अगर उनमें से 20 फ्लैट एक साथ 2000 वाट का इंडक्शन चूल्हा जलाते हैं, तो पूरी बिल्डिंग के लोड में 20% तक की अचानक बढ़ोतरी होगी। हमारे घरों की मौजूदा वायरिंग इस अतिरिक्त बोझ को झेलने के लिए तैयार नहीं है। इससे बिजली की आग (Electrical Fires) का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, शाम के वक्त जब हर घर में खाना पकता है, तो ग्रिड पर एक साथ भारी दबाव पड़ता है।

एनर्जी सर्विस ऑर्गेनाइजेशन (ESO): समस्या का समाधान

यहीं पर ईएसओ (ESO) की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। ये संगठन अपार्टमेंट मालिकों और मैनेजमेंट कमेटियों को बिना किसी बड़े निवेश के बिजली ढांचे को अपग्रेड करने की सुविधा दे सकते हैं।

ESO कैसे काम करेंगे?

इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड: ये कंपनियाँ इमारतों की वायरिंग बदलने, पुराने और कम कुशल उपकरणों (एसी, फ्रिज, गीजर) को नए और ऊर्जा-कुशल उपकरणों से बदलने की जिम्मेदारी लेंगी।

किराए पर सर्विस: उपभोक्ताओं को महंगे उपकरण खरीदने की ज़रूरत नहीं होगी। वे इन उपकरणों के मालिकाना हक के बजाय इनकी 'सर्विस' के लिए भुगतान कर सकते हैं।

आर्थिक लाभ: बड़े पैमाने पर उपकरणों की खरीद और बिजली की बल्क खरीद (Bulk Purchase) से इन कंपनियों को जो बचत होगी, उसका फायदा ग्राहकों को कम बिल के रूप में मिलेगा।

रखरखाव: उपकरणों के मेंटेनेंस और समय पर मरम्मत की जिम्मेदारी भी इन संगठनों की होगी।

झुग्गी-बस्तियों और गरीबों के लिए वरदान

अक्सर देखा गया है कि शहरी झुग्गी-बस्तियों में गरीबों को बिजली की रियायती दरों का लाभ नहीं मिल पाता क्योंकि वहां व्यक्तिगत मीटर नहीं होते। मकान मालिक बल्क में बिजली का उपयोग करता है और कमर्शियल रेट पर बिल वसूलता है। एनर्जी सर्विस कंपनियाँ इन बस्तियों में हर यूनिट के लिए अलग मीटर लगा सकती हैं। इससे गरीब परिवारों को सरकार की रियायती दरों का सीधा लाभ मिल सकेगा। शहरी झुग्गियां अपने स्वयं के 'को-ऑपरेटिव ईएसओ' भी बना सकती हैं, जिन्हें स्थानीय सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं का सहयोग मिल सकता है।

प्रतिस्पर्धा और रेगुलेशन

जैसे मोबाइल नेटवर्क के लिए आपके पास कई विकल्प होते हैं, वैसे ही एक ही मोहल्ले में कई ईएसओ (ESO) काम कर सकते हैं। इससे सेवा की गुणवत्ता बनी रहेगी और कीमतें प्रतिस्पर्धी होंगी। इन कंपनियों को बिजली नियामक निकायों (Electricity Regulatory Body) के साथ पंजीकृत होना चाहिए और उपभोक्ता अदालतों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।

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