
कोटा में छात्रों से संवाद फिर सिग्नेचर कैंपेन, क्या है राहुल गांधी का अगला लक्ष्य ?
कोटा में छात्रों से संवाद के बाद राहुल गांधी ने ‘छात्रों की गूंज’ अभियान शुरू किया। उनका फोकस पेपर लीक रोकने और शिक्षा व्यवस्था में सुधार पर है।
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी इन दिनों एक नए मिशन पर दिखाई दे रहे हैं। उनका उद्देश्य बार-बार होने वाले प्रश्नपत्र लीक और उससे छात्रों के समय तथा धन की बर्बादी के कारण परीक्षा प्रणाली पर डगमगा रहे छात्रों के विश्वास को फिर से मजबूत करना है।
18 जून की सुबह दिल्ली लौटने के तुरंत बाद, राहुल गांधी ने अपने सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से एक हस्ताक्षर अभियान शुरू किया। इससे एक दिन पहले उन्होंने कोटा में छात्रों की एक बड़ी और संवादात्मक सभा को संबोधित किया था, जहाँ उन्होंने पेपर लीक के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की।
"छात्रों की गूंज" नामक इस अभियान का उद्देश्य छात्रों की चिंताओं को केंद्र सरकार तक पहुँचाना और शिक्षा तथा परीक्षा प्रणाली में आवश्यक सुधारों की मांग करना है। कोटा में हजारों छात्रों से मुलाकात के कुछ ही घंटों बाद राहुल गांधी ने इस हस्ताक्षर अभियान के माध्यम से उनके संघर्ष को एक नया आयाम दिया।
कांग्रेस के भीतर भी मतभेद
हालाँकि, उनकी पार्टी के सभी नेता और कार्यकर्ता उनके इस दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत नहीं हैं।कोटा में राहुल गांधी का भाषण समाप्त होने के बाद कांग्रेस के एक मध्यम स्तर के पदाधिकारी ने गोपनीय रूप से अपनी निराशा व्यक्त की। उनका मानना था कि राजस्थान के इस व्यस्त शहर में हजारों उत्साही छात्रों को संबोधित करते समय राहुल गांधी का भाषण पर्याप्त रूप से राजनीतिक नहीं था।
उनका तर्क था कि NEET पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दे पर राहुल गांधी अनावश्यक रूप से "अराजनीतिक और अत्यधिक दार्शनिक" दिखाई दिए। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 8 जून को दिल्ली में विपक्षी गठबंधन की बैठक में राहुल गांधी ने भाजपा के खिलाफ "प्रतिरोध" की बात की थी। लेकिन कोटा में छात्रों को संबोधित करते समय उन्होंने प्रतिरोध या राजनीतिक संघर्ष की चर्चा नहीं की।
व्यवस्था परिवर्तन पर जोर
इसके बजाय राहुल गांधी ने पेपर लीक संकट को एक बड़े नैतिक और सामाजिक मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया। उनका कहना था कि यह समस्या उन लोगों की ईमानदारी और जवाबदेही से जुड़ी है जो पूरी व्यवस्था का संचालन कर रहे हैं।उन्होंने छात्रों के साथ होने वाले विभिन्न प्रकार के अन्यायों का उल्लेख किया, विशेष रूप से शिक्षा पर होने वाले खर्च को लेकर। राहुल गांधी ने बताया कि केंद्र सरकार शिक्षा पर जितना खर्च करती है, लगभग उतनी ही राशि परिवारों को अपनी जेब से खर्च करनी पड़ती है।
उन्होंने इस असंतुलन को "उगाही" (Extortion) जैसा बताया और कहा कि इसमें एक प्रकार की संस्थागत अनैतिकता दिखाई देती है। हालांकि उन्होंने त्वरित समाधान की बजाय पूरी व्यवस्था में सुधार और परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया।
यह दृष्टिकोण कांग्रेस के कुछ नेताओं को पसंद नहीं आया, जो मानते हैं कि पार्टी को सीधे सत्तारूढ़ सरकार पर अधिक आक्रामक तरीके से हमला करना चाहिए।
शिक्षा पर भारी आर्थिक बोझ
राहुल गांधी ने कहा कि लगभग 22 लाख छात्र सरकारी मेडिकल कॉलेजों की लगभग 80,000 सीटों के लिए परीक्षाएँ देते हैं। इन छात्रों के परिवार हर वर्ष लगभग 3.2 लाख करोड़ रुपये खर्च करते हैं। यह राशि केंद्र सरकार के वार्षिक शिक्षा बजट के लगभग बराबर है।उन्होंने कहा कि समस्या केवल मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं और नौकरी भर्ती प्रक्रियाओं में भी छात्रों और उनके परिवारों को भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है।
छात्रों के लिए राहुल गांधी का संदेश
राहुल गांधी ने इस बात पर जोर दिया कि एक कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी है कि वह छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, करियर मार्गदर्शन और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए। उन्होंने कहा कि प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाएँ छात्रों के भविष्य को बाधित करती हैं और सरकार को इन्हें रोकने के लिए गंभीर प्रयास करने चाहिए।
एक विशाल स्क्रीन पर प्रस्तुत किए गए ग्राफिक्स और स्लाइडों के माध्यम से उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि अधिकांश छात्रों के लिए करियर बनाना कितना कठिन होता जा रहा है, जबकि सरकार के पास इस चुनौती से निपटने के लिए पर्याप्त विचार, इच्छाशक्ति और योजना का अभाव दिखाई देता है।
उन्होंने छात्रों से आग्रह किया कि वे केवल पारंपरिक और सीमित करियर विकल्पों के पीछे अंधाधुंध न भागें, बल्कि अपनी वास्तविक रुचियों और क्षमताओं की खोज करें।
छात्रों से बना विशेष जुड़ाव
राहुल गांधी का संवाद केवल राजनीतिक भाषण नहीं था। उन्होंने छात्रों के साथ ऐसा भावनात्मक और बौद्धिक जुड़ाव स्थापित किया जिसने कार्यक्रम को अलग पहचान दी।उनकी प्रस्तुति शैली नई और ताज़गी भरी थी। कई लोगों के अनुसार, उन्होंने अपने युवा श्रोताओं को उसी तरह आकर्षित किया जैसे कोई लोकप्रिय रॉक स्टार अपने प्रशंसकों को प्रभावित करता है।उन्होंने केवल मेधावी छात्रों से नहीं, बल्कि उन छात्रों से भी संवाद किया जो स्वयं को औसत या संघर्षरत मानते हैं। इससे उनका संदेश अधिक व्यापक बना।
छात्र आक्रोश और नए आंदोलन
पेपर लीक की घटनाओं के कारण छात्रों का असंतोष लगातार बढ़ रहा है। इसी पृष्ठभूमि में सामाजिक कार्यकर्ता Abhijeet Dipke ने Cockroach Janta Party (CJP) नामक संगठन के माध्यम से 6 जून को दिल्ली में एक आंदोलन शुरू किया।कांग्रेस की तरह उन्होंने भी केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan के इस्तीफे की मांग की। लेकिन राहुल गांधी ने कोटा में अपने भाषण के दौरान ऐसी कोई मांग नहीं उठाई।
फिर भी छात्रों के साथ उनकी बातचीत ने यह स्पष्ट किया कि वे शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में जनता का कम होता भरोसा बहाल करने के लिए एक व्यापक रोडमैप प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।
क्या यह एक और भारत जोड़ो यात्रा की शुरुआत है?
राहुल गांधी की कोटा शैली को लेकर कुछ लोगों को भले ही संदेह हो, लेकिन भारतीय राजनीति में ऐसे प्रयोग नए नहीं हैं। प्रधानमंत्रीनरेंद्र मोदी भी अतीत में सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से सीधे संवाद करते रहे हैं और उनकी पार्टी प्रस्तुतियों तथा दृश्य माध्यमों का उपयोग करती रही है।
कोटा कार्यक्रम में राहुल गांधी अपने पारंपरिक सफेद टी-शर्ट की बजाय औपचारिक शर्ट में दिखाई दिए। उनका अंदाज सहज और आत्मविश्वासपूर्ण था, जबकि वे अत्यंत गंभीर विषयों पर बात कर रहे थे।आने वाले समय में वे प्रयागराज, पटना दिल्ली में भी परीक्षा एवं शिक्षा संबंधी मुद्दों पर कार्यक्रम करने वाले हैं। धीरे-धीरे उनका शिक्षा-केंद्रित अभियान गति पकड़ता दिखाई दे रहा है।
पिछले महीने National Students' Union of India (NSUI) और Indian Youth Congress ने भी कई शहरों में प्रदर्शन किए थे, हालांकि पार्टी के भीतर अभी भी कुछ लोग इस रणनीति को लेकर संशय में हैं।रायबरेली से सांसद राहुल गांधी एक बार फिर लोगों के बीच वैसी ही छाप छोड़ते दिखाई दे रहे हैं जैसी उनकी Bharat Jodo Yatra के दौरान बनी थी। अब यह देखना बाकी है कि क्या उनका यह शिक्षा अभियान भी उतना ही व्यापक प्रभाव छोड़ पाता है।

