सबरीमाला केस की सुनवाई कर रही 9 जजों की बेंच में हर धर्म के जज, वजह?
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सबरीमाला केस की सुनवाई कर रही 9 जजों की बेंच में हर धर्म के जज, वजह?

क्या आपको पता है कि सुप्रीम कोर्ट में चल रहे सबरीमाला मंदिर केस की सुनवाई करने वाली 9 जजों की बेंच में हर धर्म के जज शामिल हैं। जजों को यह तय करना होगा कि...


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7 अप्रैल को, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सबरीमाला संदर्भ (reference) पर सुनवाई शुरू की। दलीलों को समाप्त करने के लिए 22 अप्रैल तक का समय तय किया गया था। लेकिन सुनवाई पहले ही उस समय सीमा को पार कर चुकी है। इस साल 23 अप्रैल को आठवीं सुनवाई हुई, जिसमें वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इस बात पर बहस की कि क्या संविधान-पूर्व की प्रथाएं (pre-constitutional customs) स्वयं अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित हैं या नहीं।

अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, यह 'इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य' (2018) के फैसले की समीक्षा है। उस फैसले ने केरल के अयप्पा मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी। लेकिन अब इस मामले का विवरण मात्र इतना कहना इसके महत्व को पूरी तरह स्पष्ट नहीं करता। इस समीक्षा याचिका के साथ 66 अन्य याचिकाएं भी जोड़ी गई हैं। वे मस्जिदों में प्रवेश से वंचित मुस्लिम महिलाओं, समुदाय के बाहर शादी करने के कारण बेदखल की गई पारसी महिलाओं और दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित महिला खतना (female genital cutting) की प्रथा से संबंधित हैं। ये नौ न्यायाधीश जो कुछ भी कहेंगे, उसका असर इन सभी मामलों पर पड़ेगा।

जुड़े हुए विवादों का मानचित्र

इन याचिकाओं में सबसे प्रमुख 'यासमीन जुबेर अहमद पीरजादे बनाम भारत संघ' है। पुणे के एक दंपति ने मार्च 2019 में अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जब एक मस्जिद प्रशासन ने पत्नी को भीतर नमाज अदा करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। उनकी याचिका यह घोषणा करने की मांग करती है कि मस्जिदों से मुस्लिम महिलाओं का बहिष्कार असंवैधानिक है। यह याचिका 2018 के सबरीमाला फैसले और अनुच्छेद 14, 15, 21, 25 और 29 पर आधारित है।

केंद्र सरकार की ओर से सबसे प्रभावी तर्क 'सती प्रथा' का उल्लेख रहा है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक प्रतीकात्मक प्रश्न पूछा है। उन्होंने तर्क दिया कि जो अदालत धार्मिक प्रथाओं को संवैधानिक अधिकारों की कसौटी पर परखने से इनकार करती है, वह सती प्रथा को भी बरकरार रखती।

वरिष्ठ अधिवक्ता एम.आर. शमशाद 23 अप्रैल को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से पेश हुए। उन्होंने पीठ को बताया कि मुस्लिम महिलाएं वास्तव में प्रार्थना के लिए मस्जिदों में प्रवेश की हकदार हैं। उन्होंने कहा कि इस बिंदु पर 'हदीस' की परंपरा 12 शताब्दियों से स्थिर रही है। यह स्वीकारोक्ति कानूनी क्षेत्र को सीमित कर देती है। याचिकाकर्ता, वास्तव में, अदालत से एक धार्मिक स्थिति (theological position) को मस्जिद प्रशासनों के खिलाफ एक लागू करने योग्य अधिकार (enforceable right) में बदलने के लिए कह रहा है।

दूसरा जुड़ा हुआ मामला 'गुलरोख एम. गुप्ता बनाम बुर्जोर पारदीवाला' है। एक पारसी महिला ने हिंदू पुरुष से शादी की थी। गुजरात उच्च न्यायालय ने 2012 में माना था कि समुदाय के बाहर शादी करने से उसकी पारसी पहचान समाप्त हो गई। इस कारण उसने अग्नि मंदिर (fire temple) में प्रवेश करने और अपने माता-पिता का अंतिम संस्कार करने का अधिकार खो दिया।

शीर्ष अदालत में उनकी अपील को सबरीमाला के साथ एक साझा प्रश्न के कारण जोड़ा गया था, किसी धार्मिक संप्रदाय की स्वायत्तता (autonomy) किसी व्यक्ति के अपने धर्म को मानने के अधिकार से टकराने से पहले कितनी दूर तक जा सकती है?

तीसरा मामला दाऊदी बोहरा समुदाय से संबंधित है। सुनीता तिवारी की 2017 की रिट याचिका समुदाय के भीतर महिला खतना पर प्रतिबंध लगाने की मांग करती है। 2023 में, 'सेंट्रल बोर्ड ऑफ दाऊदी बोहरा कम्युनिटी बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में एक अलग संविधान पीठ ने समुदाय की 'बहिष्कार' (excommunication) की प्रथा को इस नौ-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेज दिया था। दोनों ही मामले पूछते हैं कि क्या किसी संप्रदाय की स्वायत्तता उन प्रथाओं तक विस्तारित हो सकती है जो अपने ही सदस्यों को शारीरिक चोट पहुंचाती हैं या सामाजिक रूप से निष्कासित करती हैं।

इनमें से प्रत्येक याचिका सबरीमाला के समान ही धुरी पर टिकी है: क्या अदालत मौलिक अधिकारों के अनुरूप होने के लिए किसी धार्मिक प्रथा की जांच कर सकती है? यदि हां तो किस परीक्षण (test) के आधार पर?

अयोध्या की छाया

इस सुनवाई में एक 'अनदेखा मेहमान' भी मौजूद है। 'डॉ. एम. इस्माइल फारूकी बनाम भारत संघ' (1994) मामले में, एक संविधान पीठ ने अयोध्या स्थल के राज्य द्वारा अधिग्रहण को बरकरार रखा था। दिसंबर 1992 में विध्वंस होने तक वहां बाबरी मस्जिद खड़ी थी। उस पीठ ने टिप्पणी की थी कि मस्जिद इस्लाम के अभ्यास का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। क्योंकि नमाज कहीं भी पढ़ी जा सकती है।

यह टिप्पणी उस निर्णय के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक नहीं थी। इसके बावजूद, यह एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत (doctrinal landmark) बन गई। मुस्लिम पक्षों ने 2018 में इस पर पुनर्विचार करने की मांग की थी। एक तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने 2:1 के बहुमत से इससे इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नज़ीर ने इसमें असहमति जताई थी। उन्होंने माना था कि किसी धार्मिक प्रथा की 'अनिवार्यता' का निर्धारण धर्म के अपने सिद्धांत और विश्वास के भीतर से किया जाना चाहिए, न कि न्यायिक आदेश (judicial fiat) द्वारा।

फारूकी मामला, किसी भी समकालीन तर्क की तुलना में अधिक स्पष्ट रूप से यह दर्शाता है कि जब धर्मनिरपेक्ष अदालतें धार्मिक प्रश्नों का निर्णय करती हैं, तो क्या गलत हो सकता है। इसके पीछे छोड़ी गई विषमता (asymmetry) ध्यान देने योग्य है। हिंदू पक्ष का यह दावा कि अयप्पा के ब्रह्मचारी देवता को महिलाओं के बहिष्कार की आवश्यकता है, आज 'अनिवार्यता' के पैमाने पर तौला जा रहा है। वहीं, हिंदू पक्ष का यह दावा कि भगवान राम का जन्मस्थान विध्वंस स्थल पर स्थित है, उसे कभी उसी पैमाने पर नहीं परखा गया। 2019 के मालिकाना हक के फैसले (title judgment) में इसे "विशेष महत्व" (particular significance) के एक धार्मिक सिद्धांत के माध्यम से रिकॉर्ड में दर्ज किया गया था।

यदि 'अनिवार्य धार्मिक प्रथा' (ERP) का सिद्धांत इस पीठ के बाद भी जीवित रहता है, तो इसे एक ऐसे परीक्षण के रूप में जीवित रहना चाहिए जो सभी धर्मों पर समान रूप से लागू हो।

सती और सबरीमाला

केंद्र सरकार की ओर से सबसे प्रभावशाली तर्क 'सती प्रथा' का उल्लेख रहा है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक प्रतीकात्मक प्रश्न पूछा है। उन्होंने तर्क दिया कि जो अदालत धार्मिक प्रथाओं को संवैधानिक अधिकारों की कसौटी पर परखने से इनकार करती है, वह सती प्रथा को भी बरकरार रखती।

यह प्रश्न एक कानूनी भ्रम पर आधारित है। सती प्रथा को अनिवार्य धार्मिक प्रथा की न्यायिक समीक्षा के माध्यम से समाप्त नहीं किया गया था। इसे कानून (statute) द्वारा समाप्त किया गया था। सती (निवारण) अधिनियम, 1987 की प्रस्तावना घोषणा करती है कि सती प्रथा "भारत के किसी भी धर्म द्वारा एक अनिवार्य कर्तव्य के रूप में कहीं भी निर्धारित नहीं है।"

संसद ने 'अनिवार्यता' की जांच में प्रवेश करने से इनकार कर दिया था। उसने बस इस प्रथा को धर्म से बाहर रख दिया। अनुच्छेद 25(2)(b), जो हिंदू संस्थानों को प्रभावित करने वाले सामाजिक सुधार कानून के लिए जगह बनाता है, इसका मुख्य आधार है। इस कानून का एक लिखित संवैधानिक आधार है। 'अनिवार्यता' का प्रश्न कभी वह हथियार नहीं था जिस पर सती प्रथा का अंत टिका हो।

इसके विपरीत, सबरीमाला में रजस्वला आयु की महिलाओं के बहिष्कार का बचाव यह कहकर किया गया था कि यह देवता की 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' (शाश्वत ब्रह्मचारी) के रूप में पहचान का अभिन्न हिस्सा है। 2018 के बहुमत वाले फैसले ने, न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की असहमति के बावजूद, उस दावे की जांच की और उसे खारिज कर दिया। यही वह न्यायिक कदम है जिसकी अब समीक्षा की जा रही है। एक कानून (statute) किसी प्रथा को 'गैर-धार्मिक' घोषित करके उसे हटा सकता है। एक अदालत को भी वही करने के लिए, या तो उस प्रथा को परिभाषित करने के अधिकार का दावा करना होगा, या उसे छोड़ना होगा।

चार मुख्य धुरी (Four Pivots)

चार प्रमुख प्रश्न इस मामले के परिणाम को तय करेंगे। पहला है 'अनिवार्य धार्मिक प्रथा' (ERP) सिद्धांत का भविष्य। सॉलिसिटर जनरल सहित इसके आलोचकों ने अदालत से इसे पूरी तरह से छोड़ने का आग्रह किया है। वे इसकी वंशावली को 'दरगाह कमेटी, अजमेर बनाम सैयद हुसैन अली' (1961) के एक गलत मोड़ से जोड़ते हैं। हालांकि, इसे पूरी तरह से त्याग देने से न्यायपालिका निहत्थी हो जाएगी। फिर किसी भी प्रथा को, जिसे कोई संप्रदाय निष्ठापूर्वक अपना बताता है, समीक्षा के दायरे से बाहर कर दिया जाएगा।

एक अधिक अनुशासित परीक्षण आस्था और अधिकारों, दोनों के लिए जगह सुरक्षित रखेगा। यह किसी प्रथा को स्वयं को अनिवार्य साबित करने के बजाय, विनियमन (regulation) को न्यायोचित ठहराने का बोझ राज्य पर डालेगा।

दूसरा है, संवैधानिक नैतिकता बनाम सामाजिक नैतिकता। केंद्र सरकार ने तर्क दिया है कि अनुच्छेद 25 और 26 के तहत "नैतिकता" का अर्थ वही है जो समाज किसी भी क्षण विशेष में मानता है। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने बहस के दौरान वकील को याद दिलाया कि 1950 के दशक के मानक आज संग्रहालय की वस्तु होंगे और समाज विकसित होता है।

संवैधानिक नैतिकता इस जांच को संविधान के अपने मूल्यों में बांधे रखती है। इस आधार को छोड़ देने का मतलब है कि यह सवाल उस सामाजिक बहुसंख्यक के हाथों में सौंप देना, जिसके पास सुनवाई के समय 'माइक' (शक्ति) हो। यह समर्पण आस्था के सामने विनम्रता के वेश में सत्ता की सेवा करना है।

तीसरा है, स्वयं अनुच्छेद 25 और 26 में "नैतिकता" शब्द का अर्थ। ये प्रावधान सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर धार्मिक स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने की अनुमति देते हैं। यदि "नैतिकता" का अर्थ सड़कों पर शोर मचाती 'सार्वजनिक नैतिकता' है, तो धार्मिक स्वतंत्रता सबसे मुखर समूह के हाथ का खिलौना बन जाएगी। यदि इसका अर्थ संविधान के अपने अधिकारों के ढांचे में निहित नैतिकता है, तो धार्मिक स्वतंत्रता सिद्धांतों से बंधी रहेगी।

चौथा है जनहित याचिका (PIL) में याचिकाकर्ता की स्थिति (Standing)। 2006 की वह रिट याचिका, जिसके कारण 2018 का फैसला आया, एक वकील संघ द्वारा दायर की गई थी, न कि अयप्पा के भक्तों द्वारा। पीठ इस बात की फिर से जांच कर रही है कि क्या किसी संप्रदाय की आंतरिक प्रथा पर बाहरी व्यक्ति द्वारा दायर जनहित याचिका को बरकरार रखा जा सकता है। एक कड़ा नियम अधिकांश जुड़ी हुई याचिकाओं को (substantive) प्रश्नों तक पहुंचने से पहले ही शुरुआती स्तर पर ही अदालत से बाहर कर देगा।

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सबसे आसान परिणाम ही सबसे बुरा परिणाम भी हो सकता है। एक ऐसा फैसला जो 'अनिवार्य धार्मिक प्रथा' सिद्धांत और 'संवैधानिक नैतिकता', दोनों को ध्वस्त कर दे, वह धार्मिक स्वतंत्रता को बिना तलवार (शक्ति) और बिना म्यान (सुरक्षा) के छोड़ देगा। यह अनुच्छेद 25 और 26 में निहित प्रतिबंधों को एक जनमत संग्रह (plebiscite) में बदल देगा।

जो भी सामाजिक बहुसंख्यक उस समय सार्वजनिक मंच पर काबिज होगा, फिर वही यह तय करेगा कि किसकी प्रथा सहनीय है और किसकी नहीं। यह परिणाम, जो आस्था के सामने विनम्रता के वेश में होगा, वास्तव में केवल शक्तिशाली लोगों की रक्षा करेगा और असंतुष्टों (dissenters) को उनके भाग्य के भरोसे छोड़ देगा।

कठिन परिणाम ही वास्तव में सैद्धांतिक परिणाम है। अदालत 'अनिवार्य धार्मिक प्रथा' (ERP) के सिद्धांत को बरकरार रख सकती है और साथ ही इसका बोझ राज्य पर स्थानांतरित करके इसे अनुशासित कर सकती है। यह 'संवैधानिक नैतिकता' को भी बनाए रख सकती है और साथ ही उन लिखित आधारों (textual anchors) को भी निर्धारित कर सकती है जो इसके उपयोग को अनुशासित करते हैं। यह स्पष्ट कर सकता है कि अनुच्छेद 25 और 26 में "नैतिकता" का अर्थ 'संवैधानिक नैतिकता' है, न कि 'सामाजिक इच्छा' (societal appetite)। यह धार्मिक संप्रदाय की प्रथाओं को समीक्षा के दायरे से बाहर किए बिना, जनहित याचिका (PIL) के नियमों को सख्त कर सकता है।

नौ न्यायाधीशों की बेंच एक बड़ी बेंच होती है। सैद्धांतिक रूप से इसे एक सूत्र में बांधे रखना भी एक कठिन कार्य है। अब एक पूरी पीढ़ी के लिए भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का ढांचा इस बात पर निर्भर करता है कि क्या यह बेंच ऐसा कर पाती है।

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