राघव तो चेहरा थे, संदीप पाठक ने दिया केजरीवाल को असली जख्म
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राघव तो चेहरा थे, संदीप पाठक ने दिया केजरीवाल को असली जख्म

राघव चड्ढा से ज्यादा संदीप पाठक का जाना 'आप' के लिए बड़ा झटका है। संगठन के चाणक्य कहे जाने वाले पाठक ने महज 22 दिन में पूरी बिसात पलट दी। जानिए बगावत की इनसाइड स्टोरी।


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AAP Route : शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026 की दोपहर आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए सिर्फ एक बुरा सपना नहीं थी। यह उस सियासी इमारत के ढहने की शुरुआत थी, जिसे एक दशक की मेहनत से खड़ा किया गया था। राघव चड्ढा और संदीप पाठक का जाना महज इस्तीफा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित 'तख्तापलट' जैसा था। इस बगावत की पटकथा काफी पहले से लिखनी शुरू कर दी गयी थी लेकिन इस पर अमली जामा 22 दिन पहले पहनाना शुरू किया गया। जब राघव चड्ढा को राज्यसभा के 'डिप्टी लीडर' पद से हटाया गया, तभी उन्होंने अपनी बिसात बिछा दी थी। अरविंद केजरीवाल को अंदाजा भी नहीं था कि उनके सबसे भरोसेमंद सिपहसालार ही उनके खिलाफ मोर्चा खोल देंगे।


संदीप पाठक की खामोश नाराजगी!
संदीप पाठक को आम आदमी पार्टी का 'साइलेंट मास्टरमाइंड' माना जाता था। वे लाइमलाइट से दूर रहकर संगठन की मशीनरी चलाते थे। आईआईटी की प्रोफेसर वाली नौकरी छोड़कर आए पाठक ने ही पंजाब में 'आप' की जीत का फॉर्मूला तैयार किया था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से उनके और शीर्ष नेतृत्व के बीच संवाद लगभग खत्म हो चुका था। पाठक को लगने लगा था कि उनकी रणनीतियों को अब नजरअंदाज किया जा रहा है।

पंजाब की जिम्मेदारी और मान-सम्मान
अंदरुनी सूत्रों का कहना है कि विवाद की जड़ पंजाब की कमान थी। संदीप पाठक ने पंजाब में संगठन को अपने पसीने से सींचा था। लेकिन अचानक केजरीवाल और सिसोदिया ने पंजाब में सीधा दखल बढ़ा दिया। पाठक से पंजाब का प्रभार लेकर मनीष सिसोदिया को सौंप दिया गया। यह पाठक के लिए केवल पद का जाना नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान पर गहरी चोट थी। यहीं से उन्होंने अपने रास्ते अलग करने का मन बना लिया था।

छत्तीसगढ़ का बहाना और असली योजना
पंजाब से हटाए जाने के बाद पाठक को छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी दी गई। वे वहां काफी सक्रिय भी दिखे और कार्यकर्ताओं से बड़ी जीत के वादे किए। लेकिन हकीकत में यह एक ' धुंध ' की चादर जैसी थी। छत्तीसगढ़ के दौरों के बहाने वे उन राज्यसभा सांसदों और नेताओं से मिल रहे थे, जो नेतृत्व से नाराज थे। उन्होंने बेहद गोपनीय तरीके से दो-तिहाई सांसदों को अपने पाले में कर लिया।

राघव और पाठक की 'जुगलबंदी'
राघव चड्ढा और संदीप पाठक की केमिस्ट्री हमेशा से शानदार रही है। 2019 के बाद से दोनों ने पंजाब की राजनीति को करीब से समझा था। राघव जहां पार्टी का युवा चेहरा थे, वहीं पाठक पर्दे के पीछे के दिमाग थे। जब चड्ढा को राज्यसभा में हाशिए पर धकेला गया, तो पाठक ने उनका साथ दिया। दोनों ने मिलकर यह तय किया कि अब 'नई राजनीति' का अगला अध्याय पार्टी के बाहर से लिखा जाएगा।

2017 की हार का वो पुराना जख्म
पार्टी में पुराने और नए नेताओं के बीच की खाई 2017 से ही गहरी थी। उस समय संजय सिंह और दुर्गेश पाठक की रणनीतियों पर सवाल उठे थे। कार्यकर्ताओं ने उन पर गंभीर आरोप लगाए थे, जिन्हें अनसुना कर दिया गया। 2022 की जीत ने इन घावों को कुछ समय के लिए भर दिया था। लेकिन 2025 की दिल्ली हार के बाद पंजाब के समीकरण बदल गए। और यहीं से शुरू हुई इस तथाकथित तख्तापलट की कहानी।

अशोक मित्तल और आर्थिक ताकत का अंत
इस पूरी कहानी में अशोक मित्तल का नाम सबसे महत्वपूर्ण है। लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के संस्थापक मित्तल पार्टी की आर्थिक और सामाजिक रीढ़ थे। गुरूवार रात तक अरविन्द केजरीवाल दिल्ली में उस बंगले में रह रहे थे, जो अशोक मित्तल के नाम पर आवंटित था। यानी कोई दूर से भी नहीं सोच सकता कि अशोक मित्तल एक दम से ऐसा करेंगे। यहाँ पार्टी एक ही बात कह रही है कि मित्तल ईडी के छपे से डर गये। सूत्रों का कहना है कि मित्तल को पार्टी ने राज्यसभा में वो पद दिया, जो राघव चड्ढा के पास था लेकिन अब वही मित्तल राघव चड्ढा के साथ हो लिए, संभव है कि मित्तल ने डर की वजह से ये निर्णय लिया हो। मित्तल का जाना पार्टी के लिए फंड और संसाधनों का बड़ा नुकसान है।

खुफिया तंत्र की सबसे बड़ी विफलता
सवाल यह है कि केजरीवाल का खुफिया तंत्र इतना फेल कैसे हुआ? संदीप पाठक खुद सर्वे करते थे और संगठन के महासचिव थे। जो व्यक्ति खुद रिपोर्ट तैयार करता हो, उसकी गतिविधियों को ट्रैक करना नामुमकिन था। दिल्ली से लेकर पंजाब तक के फीडबैक को इस तरह मैनेज किया गया कि हाईकमान को अंत तक सब कुछ सामान्य लगा।

संजय सिंह का 'ऑपरेशन लोटस' वाला तर्क
संजय सिंह लगातार इसे 'ऑपरेशन लोटस' और जांच एजेंसियों का दबाव बता रहे हैं। वे कह रहे हैं कि डरा-धमकाकर पार्टी को तोड़ा गया है। हालांकि, पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि यह केवल डर नहीं, बल्कि 'वैक्यूम' की कहानी है। जब संवाद खत्म हो जाता है, तो विचारधारा के बजाय विकल्प ज्यादा आकर्षक लगने लगते हैं। पाठक और चड्ढा ने इसी विकल्प को चुना।

पंजाब में अब क्या होगा?
पंजाब की राजनीती से वाकिफ लोगों का कहना है कि पार्टी को सिर्फ और सिर्फ संदीप पाठक के जाने से ज्यादा आघात लगा है, उसकी वजह ये है कि पार्टी ने ऐसा कभी सोचा नहीं था। संदीप पाठक रणनीति तैयार करने वालों में से थे, जिस पर पार्टी पूरी तरह से निर्भर रहती थी लेकिन अब अचानक से ही रणनीतिकार चला जाए तो धक्का लगना वाजिब है।


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