Nilanjan Mukhopadhyay

सत्यजीत रे का डिस्टोपिया और आज की राजनीति: कॉकरोच जनता पार्टी के व्यंग्य ने उड़ाई सत्ता की नींद


सत्यजीत रे का डिस्टोपिया और आज की राजनीति: कॉकरोच जनता पार्टी के व्यंग्य ने उड़ाई सत्ता की नींद
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दुनिया के कई देशों के इतिहास ने यह साबित किया है कि सोशल मीडिया केवल लोगों को इकट्ठा करने और अपनी आवाज़ बुलंद करने का एक शुरुआती जरिया हो सकता है। असली और अंतिम राजनीतिक लड़ाई हमेशा जमीन पर, यानी 'वास्तविक दुनिया' में ही लड़ी जाती है।

भारत के स्वाभिमानी और बेरोजगार युवाओं की कहानी शायद सत्यजीत रे की 1980 की प्रसिद्ध डिस्टोपियन फिल्म 'हीरक राजार देशे' ('हीरक राजा के देश में') के अंतिम दृश्यों की तरह भले ही समाप्त न हो। लेकिन, आज की वास्तविक भारतीय राजनीति और उस क्लासिक फिल्म की कहानी के बीच कई ऐसी कड़ियाँ हैं जो आपस में हूबहू मिलती हैं। ये कड़ियाँ हैं राजनीतिक असहमति को दबाना, संवैधानिक संस्थाओं का अहंकार और तानाशाही रवैया। फर्क सिर्फ इतना है कि फिल्म में एक पारंपरिक किस्म की तानाशाही थी, और आज के दौर में यह डिजिटल और अत्याधुनिक रूप ले चुकी है।

सत्यजीत रे की बाकी फिल्मों से अलग, 'हीरक राजार देशे' एक ऐसे दमनकारी राज्य के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका राजा सिर्फ 'हां में हां' मिलाने वाले लोगों को ही अपने दरबार में रखता है। दिग्गज अभिनेता उत्पल दत्त द्वारा निभाए गए उस क्रूर राजा का चरित्र, असल में आपातकाल (Emergency) के दौरान और उससे पहले की इंदिरा गांधी के शासन का एक रूपक था। आज के समकालीन भारत में भी स्थिति बहुत अलग नहीं दिखती। केंद्रीय मंत्री हर भाषण, हर बयान और हर बातचीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम का जाप करते नहीं थकते। यह चाटुकारिता देवकांत बरुआ के उस मशहूर नारे की याद दिलाती है, जिसमें उन्होंने कहा था— "इन्दिरा ही इंडिया है, और इंडिया ही इन्दिरा है।"

रील और रीयल: जब राजा की मूर्ति ढहती है

सत्यजीत रे की इस क्लासिक फिल्म का अंत एक बेहद प्रभावशाली दृश्य के साथ होता है। राजा की एक बहुत विशालकाय मूर्ति को जनता की भीड़ मिलकर रस्सियों से खींचकर गिरा देती है। इस भीड़ का नेतृत्व एक आदर्शवादी स्कूल शिक्षक और उसके युवा छात्र करते हैं। ये वे बच्चे थे जिन्हें समझ आ गया था कि राजा ने उनके स्कूल इसलिए बंद करवाए हैं ताकि लोग अज्ञानता के अंधेरे में कैद रहें और कभी अपने अधिकार न मांग सकें। इस बगावत में न केवल जागरूक नागरिक, बल्कि राजा के अपने सैनिक, पहरेदार और सरकारी कर्मचारी भी शामिल हो जाते हैं।

व्यंग्य (Satire) को हमेशा से उन लोगों का सबसे बड़ा हथियार माना गया है, जो सीधे विरोध नहीं कर सकते— खासकर तब, जब शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को भी अपराध घोषित कर दिया जाए। फिल्म के अंत में, राजा और उसके दरबारी भी अपनी ही मूर्ति को गिराने वाली भीड़ में शामिल हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे खुद उसी 'मगज़ धुलाई' (Brainwashing) मशीन के शिकार हो जाते हैं, जिसे राजा ने जनता को गुलाम बनाए रखने के लिए बनवाया था।

आज की 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) की कहानी शायद अखबारों के पन्नों या बड़ी वेबसाइटों की मुख्य खबरों से धीरे-धीरे गायब हो रही हो। लेकिन इसके बावजूद, हीरक राजा की कहानी और आज के इस डिजिटल आंदोलन को एक साथ रखकर देखना बेहद जरूरी है। यह तुलना हमें यह समझने में मदद करती है कि तानाशाह और अहंकारी सरकारें कैसे अपने ही नागरिकों को कीड़े-मकौड़े समझने लगती हैं, जैसे ही वे सरकार से जवाबदेही और नौकरियों का हिसाब मांगना शुरू करते हैं।

जब न्यायपालिका ने बदला अपना रुख

साल 2014 के बाद से, देश की शीर्ष अदालतों के न्यायाधीशों का रुख उन याचिकाओं पर बेहद कड़ा या यूं कहें कि टालमटोल वाला रहा है, जिनमें सरकार से सीधे और स्पष्ट स्टैंड लेने की मांग की गई थी। न्यायपालिका ने अक्सर सरकारी फैसलों पर अपनी मुहर लगाने में ही तत्परता दिखाई है। इसका ताजा उदाहरण 27 मई को देखने को मिला, जब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने आधिकारिक फैसलों को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए सही ठहराया।

दिलचस्प बात यह है कि इस सोशल मीडिया आंदोलन यानी 'कॉकरोच आंदोलन' की शुरुआत भी मुख्य न्यायाधीश के एक बेहद तीखे और विवादित बयान से ही हुई थी। एक मामले की सुनवाई के दौरान उन्होंने कथित तौर पर बेरोजगार युवाओं की तुलना 'कॉकरोच' (तिलचट्टों) या 'परजीवियों' से कर दी थी। इस बयान पर जब देश भर के युवाओं में भारी आक्रोश फैला, तो उन्होंने एक 'स्पष्टीकरण' तो जारी किया, लेकिन इस बात पर कोई पछतावा या खेद नहीं जताया कि देश की गलत नीतियों के कारण बेरोजगार हुए युवाओं को उन्होंने एक घृणित कीड़े का नाम क्यों दिया।

लेकिन, देश के युवाओं ने इस बार गुस्से में आकर सड़कें जाम करने या हिंसा करने के बजाय एक अनोखा रास्ता चुना। उन्होंने इस अपमान को ही अपना हथियार बना लिया। युवाओं ने खुद को 'कॉकरोच' कहना शुरू किया और इसी नाम से डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार कर लिया। देखते ही देखते इंटरनेट पर इन 'कॉकरोच' की संख्या इतनी बढ़ गई और उनके मीम्स इतने वायरल होने लगे कि सरकार ने ठीक वही कदम उठाया जो हीरक राजा ने उठाया था— फर्क सिर्फ इतना था कि हीरक राजा ने स्कूल बंद किए थे, और इस सरकार ने युवाओं के सोशल मीडिया हैंडल्स को ब्लॉक करना शुरू कर दिया।

आधुनिक भारत की 'मगज़ धुलाई' मशीन

सत्यजीत रे की फिल्म में, हीरक राजा के पास एक विशाल और जादुई 'मगज़ धुलाई' मशीन थी। इस मशीन के जरिए लोगों के दिमाग को इस तरह प्रोग्राम किया जाता था कि वे राजा की तारीफों के कसीदे और कविताएं हमेशा याद रखें। इसके बाद जनता भोजन, कपड़े या अपने अधिकारों की मांग करने के बजाय चौबीसों घंटे राजा की जय-जयकार करने लगती थी।

आज के भारत में इस मशीन का विकल्प सरकार की विशाल सोशल मीडिया सेना (IT Cell) है, जो दिन-रात झूठी सूचनाएं और प्रोपेगैंडा फैलाने का काम करती है। इसके साथ ही, स्कूलों और कॉलेजों के लिए नई टेक्स्ट बुक्स (पाठ्यपुस्तकें) तैयार करने वाले विभाग, सरकार के नैरेटिव के पक्ष में फिल्में बनाने वाले निर्देशकों की पूरी फौज और 'अप्राकृतिक जनसांख्यिकीय परिवर्तन' जैसे मुद्दों पर जांच बिठाने वाली तरह-तरह की कमेटियां— ये सब मिलकर आज की 'मगज़ धुलाई' मशीन का काम कर रही हैं।

इन सबका उद्देश्य हीरक राजा की मशीन जैसा ही है: जनता के दिमाग में एक ऐसी 'वैकल्पिक सच्चाई' भर देना, जिससे उनकी तार्किक और स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता पूरी तरह खत्म हो जाए। जब लोग सोचेंगे ही नहीं, तो वे सरकार के खिलाफ कभी खड़े भी नहीं होंगे।

सोशल मीडिया पर डिजिटल जवाबी हमला

फिल्म में राजा का मानना था कि दिमाग धोने वाली यह मशीन हमेशा सिर्फ उसके इशारों पर ही काम करेगी। लेकिन अंत में वह हार गया, क्योंकि फिल्म के दो मुख्य जादुई किरदार (गूपी और बाघा) एक आदर्शवादी शिक्षक के साथ मिलकर उस वैज्ञानिक को अपने पाले में कर लेते हैं जिसने इस मशीन का एल्गोरिदम बनाया था।

डिजिटल स्पेस में भी कुछ ऐसा ही हुआ। जब सरकार ने सोशल मीडिया पर किसी एक 'कॉकरोच' हैंडल को ब्लॉक करने का आदेश दिया, तो उसकी जगह तुरंत 10 नए हैंडल खड़े हो गए। इनमें से कई हैंडल्स का तो मुख्य संचालक से कोई सीधा संबंध भी नहीं था, लेकिन वे सभी 'कॉकरोच' की पहचान के साथ एकजुट हो गए थे।

यह बात जगजाहिर है कि साल 2014 के चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राजनीतिक विरोधियों के मुकाबले सोशल मीडिया का सबसे पहले और सबसे बेहतरीन इस्तेमाल किया था। कई सालों तक उनके विरोधियों को सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा नहीं था, इसलिए मोदी और उनकी पार्टी को लगा कि सोशल मीडिया हमेशा 'वन-वे ट्रैफिक' की तरह काम करेगा— जहां केवल एनआरआई प्रशंसकों, देसी समर्थकों और सरकारी विज्ञापनों के वीडियो ही चलते रहेंगे। लेकिन इंटरनेट के ये टूल्स स्वायत्त (Autonomous) होते हैं। आज वही तकनीक और वही रणनीतियाँ खुद सरकार और उसकी नीतियों के खिलाफ मुड़ चुकी हैं। 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने ठीक यही किया, और यही वजह है कि सत्ता के गलियारों में आज इस आंदोलन को लेकर भारी नाराजगी और बेचैनी है।

सरकार के पास इस डिजिटल विद्रोह को रोकने का एक ही रास्ता बचा था कि वह उन सख्त कानूनों का इस्तेमाल करे जो सोशल मीडिया कंपनियों को हैंडल्स ब्लॉक करने का आदेश देते हैं। लेकिन हीरक राजा की तरह ही सरकार का यह दमनकारी प्रयास भी विफल साबित हुआ।

व्यंग्य: दबे-कुचले लोगों का अंतिम हथियार

फिल्म 'हीरक राजार देशे' में गूपी और बाघा दो ऐसे गायक हैं, जिन्हें भूतों के राजा से तीन जादुई वरदान मिले हैं। वे जब भी देखते हैं कि आम जनता पर अत्याचार हो रहा है, तो वे राक्षसों और क्रूर राजाओं का संहार करने निकल पड़ते हैं। ऐसा करते समय वे एक ऐसी सरल और सुरीली भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जिसे समाज का सबसे आम और अनपढ़ व्यक्ति भी आसानी से समझ सके।

ठीक इसी तरह, 'कॉकरोच ब्रिगेड' के जिन युवाओं ने एक्स (ट्विटर) और इंस्टाग्राम पर अनगिनत हैंडल्स की कमान संभाली, उन्होंने भारत के आम युवाओं की भाषा को चुना। भारत में इस समय 15 से 29 वर्ष की आयु के करीब 36.7 करोड़ युवा हैं, जो दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि इनमें से अधिकांश युवाओं के पास कोई सम्मानजनक रोजगार नहीं है। वे सिर्फ एक दिन से दूसरे दिन तक किसी तरह गुजर-बसर कर रहे हैं। उनके जीवन में सम्मान कैसे आ सकता है, जब देश के सबसे शक्तिशाली पदों पर बैठे लोग उन्हें पकौड़े तलने जैसी सलाह देते हैं?

जब शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर भी लाठियां बरसाई जाएं और केस दर्ज किए जाएं, तो व्यंग्य ही असहमति का एकमात्र जरिया बचता है। पिछले कई सालों से सरकार ने एक नया तरीका अपनाया है— जो भी उसकी नीतियों से असहमत होता है, उस पर तुरंत 'एन्टी-नेशनल' (देशद्रोही) का ठप्पा लगा दिया जाता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर मीम्स से डरती सरकार

'कॉकरोच जनता पार्टी' के निर्माता ने अपने आंदोलन के लिए जो लोगो (Logo) चुना, वह बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के पहनावे से काफी मिलता-जुलता है। इस लोगो में एक कॉकरोच को कोट, पैंट और टाई पहने हुए दिखाया गया है, जो अपने मुंह में 'कमल के फूल' को चबा रहा है। राजनीतिक रूप से यह प्रतीक भारत के पुराने सामाजिक संघर्ष को दर्शाता है— एक तरफ उच्च जातियों के नियंत्रण वाला सत्ताधारी वर्ग है, तो दूसरी तरफ दलित, पिछड़े और हाशिए पर खड़े समाज के लोग हैं।

भले ही इंटरनेट पर चल रहे इन मीम्स, कार्टून्स और रैप गानों की अपनी कुछ सीमाएं हों, लेकिन इनकी इस स्वतःस्फूर्त (Spontaneous) ताकत ने सरकार को इस कदर चिंतित कर दिया है कि वह अब इंटरनेट मीम्स को 'राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा' बताने लगी है। खुद को एक बेहद 'मजबूत और सख्त सरकार' कहने वाली सत्ता का मीम्स से इस तरह डर जाना बेहद हास्यास्पद है।

सत्यजीत रे का हीरक राजा भी कभी नहीं चाहता था कि कोई उस पर हंसे या उसका मजाक उड़ाए। आज की सरकार भी अपने ऊपर किए जाने वाले किसी भी मज़ाक को बर्दाश्त नहीं कर पाती। ऐसी सरकारें तभी तक फलती-फूलती हैं जब तक जनता सरकारी तंत्र, पुलिस और नेताओं के खौफ में जिए और उनके सामने सिर झुकाए रखे। लेकिन जैसे ही कोई एक अकेला व्यक्ति भी सत्ता के इस अहंकार को देखकर हंस देता है या उसका मजाक उड़ाता है, तो बाकी लोगों के मन से भी वो खौफ गायब होने लगता है। खौफ जब जनता के मन से निकलता है, तो वह सीधे राजा के चेहरे पर दिखाई देने लगता है। सरकार के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि सोशल मीडिया के ये व्यंग्यकार अब इंटरनेट की दुनिया से बाहर निकलकर सड़कों पर उतरने की चेतावनी दे रहे हैं।

सालों का दबा हुआ गुस्सा अब सड़कों पर आने को तैयार

यह मोड़ देश की विपक्षी पार्टियों के लिए भी एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है। राजनीतिक दल इस समय इन 'कॉकरोचों' को कोई सीधा सहारा या मंच नहीं दे पा रहे हैं, क्योंकि पारंपरिक पार्टियों की भाषा और उनके राजनीतिक उद्देश्य इन इंटरनेट युवाओं से बिल्कुल अलग हैं। इसके अलावा, ये युवा किसी स्थापित राजनीतिक छात्र संगठन, मजदूर संघ या किसान यूनियन के जरिए नहीं उभरे हैं, बल्कि वे इस राजनीतिक व्यवस्था से बिल्कुल बाहर रहकर खुद खड़े हुए हैं।

सत्यजीत रे की फिल्म में, हीरक राजा के दमनकारी शासन का अंत उन दो गायकों की मदद से होता है जो राक्षसों का विनाश करने की कसम खाकर आए थे। लेकिन आज का आधुनिक भारत किसी फिल्मी कहानी की तरह नहीं चल सकता। अगर ये 'कॉकरोच' सिर्फ इंटरनेट पर मीम्स बनाने और गाने लिखने के बजाय असल में बदलाव लाना चाहते हैं, तो उन्हें सबसे पहले खुद को जमीन पर एक ठोस और संगठित समूह के रूप में बदलना होगा। इसके बाद उन्हें अपने नेतृत्व के संकट को भी हल करना होगा।

दुनिया के कई देशों के इतिहास ने यह साबित किया है कि सोशल मीडिया केवल लोगों को इकट्ठा करने और अपनी आवाज़ बुलंद करने का एक शुरुआती जरिया हो सकता है। असली और अंतिम राजनीतिक लड़ाई हमेशा जमीन पर, यानी 'वास्तविक दुनिया' में ही लड़ी जाती है। शायद अनजाने में ही सही, लेकिन मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के उस एक बयान ने देश के एक ऐसे बड़े युवा वर्ग के दबे हुए गुस्से को बाहर निकाल दिया है जो अब तक राजनीति से पूरी तरह दूर था। नतीजा यह है कि हालिया चुनावों में पूर्ण बहुमत हासिल करने के बाद भी, सत्तारूढ़ दल के लिए भारतीय राजनीति का यह नया नैरेटिव बेहद अनिश्चित और चुनौतीपूर्ण होने वाला है।


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