
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम, कोर्ट में AI के इस्तेमाल के लिए जारी हुए ड्राफ्ट नियम
सुप्रीम कोर्ट ने AI के इस्तेमाल को रेगुलेट करने के लिए 2026 के ड्राफ्ट नियम जारी किए हैं, वकीलों को AI टूल्स का उपयोग करने पर कोर्ट को सूचित करना अनिवार्य होगा।
देश भर की अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल्स के बढ़ते उपयोग को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने कानूनी प्रक्रियाओं में AI के इस्तेमाल को नियंत्रित और रेगुलेट करने के लिए एक मसौदा विनियमन (Draft Regulation) जारी किया है, जिसका शीर्षक 'न्यायालयों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल के लिए नियम, 2026' रखा गया है।
इस मसौदे को सुप्रीम कोर्ट की AI समिति द्वारा तैयार किया गया है और इसे 20 जून तक जनता और विशेषज्ञों की टिप्पणियों व सुझावों के लिए पब्लिक डोमेन में रखा गया है।
वकील और मुकदमेबाज दलीलें तैयार करने और कानूनी रिसर्च के लिए AI टूल्स का इस्तेमाल तो कर सकते हैं, लेकिन उनके लिए अदालत को यह सूचित करना (Mandatory Disclosure) अनिवार्य होगा कि उन्होंने AI की मदद ली है।
कहां-कहां लागू होंगे ये नियम?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तैयार किए गए ये नियम सिर्फ बड़े कोर्ट तक सीमित नहीं रहेंगे। यह मसौदा देश के पूरे न्यायिक ढांचे पर लागू होगा, जिसमें शामिल हैं:
1.सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)
2.सभी राज्यों के उच्च न्यायालय (High Courts)
3.अधीनस्थ न्यायालय (Subordinate Courts/Lower Courts)
4.सभी न्यायाधिकरण (Tribunals) और वैधानिक आयोग (Statutory Commissions)
AI के उपयोग की कहाँ है अनुमति (Permitted Uses)
मसौदा नियमों के अनुसार, अदालतों और वकीलों को कुछ खास कामों के लिए AI के इस्तेमाल की मंजूरी दी गई है, लेकिन इसमें 'ह्यूमन-इन-द-लूप' (Human-in-the-loop)*यानी इंसानी समीक्षा का होना अनिवार्य है:
1.केस मैनेजमेंट: नई फाइलिंग में कमियों की पहचान करना, कॉज लिस्ट तैयार करना और सुनवाई की शेड्यूलिंग।
2. ट्रांसक्रिप्शन और अनुवाद:अदालती कार्यवाही का ऑटोमेटेड प्रतिलेखन (Transcription) और फैसलों/आदेशों का दूसरी भाषाओं में अनुवाद। हालांकि, एक 3. नामित अधिकारी द्वारा इसका वेरिफिकेशन जरूरी होगा।
4. लीगल रिसर्च: पुराने फैसलों को खोजना (Precedent Retrieval), साइटेशन (उद्धरण) का वेरिफिकेशन करना और लंबे दस्तावेजों का सारांश (Summary) तैयार करना।
5. असिस्टेंस और चैटबॉट: मुकदमों से जुड़े लोगों (Litigants) की मदद के लिए गाइडेड चैटबॉट और संवादी AI असिस्टेंट की सुविधा देना।
6. धोखाधड़ी की पहचान:प्रशासनिक स्तर पर दस्तावेजों की असलियत जांचना और फ्रॉड का पता लगाना।
7. डॉक्यूमेंट जनरेशन: तय फॉर्मेट में नोटिस और समन का ऑटो-जनरेशन करना।
8. गोपनीयता (Anonymization): पब्लिक डोमेन में पब्लिश करने से पहले फैसलों और कोर्ट रिकॉर्ड्स में से जरूरी डेटा को गुमनाम बनाना।
AI के इस्तेमाल पर कड़े प्रतिबंध (Restrictions)
तकनीक के दुरुपयोग को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ बेहद सख्त पाबंदियां भी लगाई हैं:
1. डेटा की सुरक्षा:किसी भी व्यक्ति के पर्सनल डेटा का इस्तेमाल सही अथॉरिटी की मंजूरी और डेटा प्रोटेक्शन कानून के बिना AI को ट्रेन या टेस्ट करने के लिए नहीं किया जा सकता।
2. न्याय पर फैसला सिर्फ इंसान का:कोई भी अदालती फैसला, आदेश या सजा सिर्फ AI के एनालिसिस या एल्गोरिदम के आधार पर नहीं दी जा सकती। अंतिम फैसला हमेशा न्यायाधीश का ही होगा। AI का आउटपुट सिर्फ एक 'सलाह' माना जाएगा।
3. रिस्क स्कोरिंग पर रोक:जमानत की पात्रता तय करने, दोबारा अपराध के अनुमान (Recidivism), या गवाहों की विश्वसनीयता जांचने के लिए किसी भी रिस्क स्कोरिंग AI टूल का इस्तेमाल नहीं होगा।
4. अस्पष्ट AI पर बैन:किसी भी ऐसे 'ब्लैक-बॉक्स' या अपारदर्शी AI सिस्टम का इस्तेमाल कोर्ट में नहीं होगा, जो किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकारों या स्वतंत्रता पर असर डालता हो।
5. प्रोफाइलिंग पर रोक:आरोपी, गवाह या वकीलों के भविष्य के व्यवहार का अनुमान लगाने या उनकी प्रोफाइलिंग करने के लिए AI का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित है।
जिम्मेदारी से भाग नहीं पाएंगे वकील
इस मसौदे में यह साफ कर दिया गया है कि तकनीक की आड़ में गलतियां छुपाने की अनुमति नहीं होगी।
1. अदालत मांग सकती है जवाब (Rule 43(4)): कोर्ट वकीलों से इस्तेमाल किए गए AI टूल का विवरण, उसके उपयोग की सीमा और सामग्री की सच्चाई को सत्यापित करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांग सकता है।
2. गलती पर वकीलों की होगी जवाबदेही: यदि अदालत में पेश किया गया कोई भी दस्तावेज, सबूत या दलील AI की गलती के कारण झूठी या भ्रामक पाई जाती है, तो इसके लिए उसे जमा करने वाले व्यक्ति (वकील या मुकदमेबाज) को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। आप AI प्रणाली पर दोष मढ़कर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।

