
नाबालिग की इच्छा सर्वोपरि, सुप्रीम कोर्ट ने दी गर्भपात की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग को 7 महीने की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देते हुए कहा कि महिला की इच्छा सर्वोपरि है और उसे मजबूर नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 अप्रैल) को एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि किसी भी महिला, खासकर नाबालिग, को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने शुरुआती किशोरावस्था की एक लड़की को, जिसकी गर्भावस्था सात महीने से अधिक हो चुकी थी, मेडिकल टर्मिनेशन (गर्भपात) की अनुमति दे दी।
महिला की इच्छा सबसे महत्वपूर्ण
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि गर्भवती महिला का निर्णय अजन्मे बच्चे के हित से अधिक महत्वपूर्ण है। अदालत ने यह भी माना कि ऐसी गर्भावस्था को जारी रखना नाबालिग के मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक स्थिति और समग्र विकास पर गंभीर और स्थायी असर डाल सकता है।
प्रजनन स्वायत्तता को सर्वोच्च प्राथमिकता
अदालत ने कहा कि महिला की प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए। यदि किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।
पीठ ने कहा कि अपने शरीर से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार, विशेष रूप से प्रजनन से जुड़े मामलों में, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गोपनीयता का अभिन्न हिस्सा है। ऐसे मामलों में, खासकर नाबालिगों और अवांछित गर्भावस्था के मामलों में, इस अधिकार पर अनुचित प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकते।
‘किसी महिला को मजबूर नहीं किया जा सकता’
अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “कोई भी अदालत किसी महिला, और विशेष रूप से नाबालिग को, उसकी स्पष्ट इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था पूरी अवधि तक जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। ऐसा करना न केवल उसकी स्वायत्तता का उल्लंघन होगा, बल्कि उसे मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक रूप से गंभीर आघात पहुंचाएगा।”
गोद देने का विकल्प पर्याप्त नहीं
पीठ ने यह भी कहा कि यह तर्क देना आसान है कि यदि महिला बच्चे को नहीं पालना चाहती, तो उसे गोद दे सकती है। लेकिन यह दृष्टिकोण उचित नहीं है, खासकर तब जब गर्भावस्था ही अवांछित हो।अदालत के अनुसार, महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करना, उसके हितों को नजरअंदाज करना है और अजन्मे बच्चे के हित को उससे ऊपर रखना है।
अवैध गर्भपात के खतरे पर चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि अदालतें अवांछित गर्भावस्था को जारी रखने के लिए मजबूर करेंगी, तो लोग अवैध गर्भपात केंद्रों की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे महिलाओं की जान को और अधिक खतरा होगा। अदालत ने कुहा कि इस मामले में शामिल लड़की 15 वर्ष की है और यह गर्भावस्था अवांछित है। रिपोर्ट के अनुसार, वह पहले भी आत्महत्या का प्रयास कर चुकी है, इसलिए गर्भावस्था को जारी रखना उसके हित में नहीं है।

