UAPA केसों में राहत का नया रास्ता, सुप्रीम कोर्ट ने साफ की तस्वीर
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UAPA केसों में राहत का नया रास्ता, सुप्रीम कोर्ट ने साफ की तस्वीर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि UAPA में जमानत नियम है। लंबी हिरासत में अनुच्छेद 21 सर्वोपरि होगा और छोटी पीठ बड़ी पीठ का फैसला नहीं बदल सकती।


एक संवैधानिक अदालत से अपेक्षा की जाती है कि वह एक ही स्वर में बोले। लेकिन भारत का सर्वोच्च न्यायालय, जहाँ 32 न्यायाधीश अलग-अलग शक्ति वाली पीठों में बैठते हैं, अक्सर ऐसा नहीं करता। एक ही कानून, स्वतंत्रता से जुड़ा एक ही प्रश्न, अलग-अलग अदालत कक्षों में अलग-अलग दिनों पर भिन्न उत्तर दे सकता है। उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि मामले की सुनवाई किन दो या तीन न्यायाधीशों की पीठ कर रही है।

विद्वानों के पास ऐसे संस्थान के लिए एक शब्द है जो एक साथ कई स्वरों में बोलता है — “पॉलीवोकल”। दुर्भाग्य से यह पॉलीवोकल समस्या परिचित है: गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) जैसे कठोर जमानत कानून में, यदि अलग-अलग पीठें एक ही प्रावधान की अलग-अलग व्याख्या करें, तो इसका मतलब किसी व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता और अनिश्चितकालीन हिरासत के बीच का अंतर हो सकता है।

पॉलीवोकल समस्या

18 मई को सर्वोच्च न्यायालय ने 100 पन्नों के एक जमानत आदेश के माध्यम से इस विचलन और अपनी ही दो पूर्व आवाज़ों के खिलाफ प्रतिक्रिया दी। इस आदेश के तहत सैयद इफ्तिखार अंद्राबी, जो कश्मीर के एक सरकारी क्लर्क हैं और लगभग छह वर्षों से हिरासत में थे, को रिहा किया गया। लेकिन इस आदेश का व्यापक महत्व न्यायिक सिद्धांतों से जुड़ा था। इसने उस प्रश्न को संबोधित किया जो पिछले चार वर्षों से धीरे-धीरे उभर रहा था।

यूएपीए में जमानत नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की स्पष्टता

♦ जमानत नियम है, जेल अपवाद

♦ छोटी पीठें बड़ी पीठों के फैसलों को गुप्त रूप से कमजोर नहीं कर सकतीं

♦ लंबी हिरासत के मामलों में संवैधानिक अधिकार वैधानिक प्रतिबंधों पर भारी पड़ते हैं

♦ तीन-न्यायाधीशों की पीठ का फैसला बाध्यकारी कानून बना रहता है

♦ आँकड़ों के अनुसार अधिकांश यूएपीए आरोपी अंततः बरी हो जाते हैं

♦ मुकदमे से पहले की हिरासत दंडात्मक कैद में नहीं बदलनी चाहिए

जब सर्वोच्च न्यायालय की छोटी पीठें बड़ी पीठों द्वारा स्थापित कानून को कमजोर कर देती हैं तो क्या होता है? और जब वे ऐसा बिना स्पष्ट असहमति जताए या मामला बड़ी पीठ को भेजे, केवल पुनर्व्याख्या के जरिए करती हैं, तब क्या स्थिति बनती है? न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और उज्जल भुइयाँ ने एक ही फैसले में इन दोनों प्रश्नों का उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि यूएपीए के तहत जमानत नियम है और जेल अपवाद। साथ ही, दो-न्यायाधीशों की पीठ चुपचाप किसी तीन-न्यायाधीशों की पीठ के फैसले को बदल नहीं सकती।

संघर्ष की स्थिति

यूएपीए की धारा 43-डी(5) जमानत पर रोक लगाने वाला प्रावधान है। यदि पुलिस रिपोर्ट या केस डायरी में प्रथमदृष्टया मामला दिखाई देता है, तो अदालत को जमानत से इनकार करना होता है। “प्रथमदृष्टया” का अर्थ है ऐसा मामला जो सतही तौर पर सही प्रतीत हो, बिना गहन साक्ष्य परीक्षण के।

यह प्रावधान एक “नॉन-ऑब्स्टेंटे क्लॉज” से शुरू होता है, अर्थात ऐसा अधिभावी प्रावधान जो “दंड प्रक्रिया संहिता में निहित किसी भी बात के बावजूद” शब्दों से शुरू होता है। सरल शब्दों में, यह सामान्य जमानत नियमों को पीछे हटने के लिए कहता है। व्यवहार में विशेष अदालतों और उच्च न्यायालयों ने इसे लगभग एकतरफा व्यवस्था की तरह पढ़ा है — आरोप गंभीर है, आरोपपत्र प्रारंभिक परीक्षण में टिक जाता है, और आरोपी जेल में बना रहता है।

संविधान का अनुच्छेद 21 यह वादा करता है कि किसी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय लंबे समय से मानता रहा है कि शीघ्र सुनवाई का अधिकार इसी वादे में निहित है। जहाँ एक प्रावधान वैधानिक है और दूसरा संवैधानिक, वहाँ संवैधानिक प्रावधान को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। प्रश्न केवल यह है कि कब और कैसे।

2021 में “यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब” मामले में तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने इसका उत्तर दिया। अदालत ने कहा कि धारा 43-डी(5) की कठोरता दो परिस्थितियों में “पिघल जाती है”।

पहला, जब मुकदमे के उचित समय में समाप्त होने की कोई संभावना न हो।

दूसरा, जब आरोपी पहले ही संभावित सजा का बड़ा हिस्सा हिरासत में काट चुका हो।

ऐसी परिस्थितियों में संवैधानिक अदालत “सामान्यतः बाध्य” होती है कि वह आरोपी को रिहा करे।

छोटी पीठों द्वारा क्षरण

बाद में दो अलग-अलग दो-न्यायाधीशीय पीठों ने नजीब फैसले की अलग व्याख्या की। “गुरविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य” (2024) में अदालत ने तथाकथित “दो-स्तरीय परीक्षण” तैयार किया। आरोपी को पहले धारा 43-डी(5) के प्रथमदृष्टया अवरोध को पार करना होगा। उसके बाद ही सामान्य जमानत कारकों पर विचार होगा, जैसे कि आरोपी के फरार होने, गवाहों को डराने या साक्ष्य नष्ट करने की संभावना। नजीब फैसले को उसके तथ्यों तक सीमित कर दिया गया और उसे एक अपवाद बना दिया गया।

जनवरी में यही दृष्टिकोण “गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य” मामले में भी सामने आया, जो दिल्ली दंगा षड्यंत्र मामले से संबंधित था। उस पीठ ने पाँच आरोपियों को जमानत दी लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम को हिरासत में रखा। अदालत ने कहा कि नजीब ने ऐसा कोई “यांत्रिक नियम” स्थापित नहीं किया कि केवल समय बीतने से जमानत मिल जाए। संवैधानिक जाँच, अदालत के अनुसार, परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

अलग-अलग पढ़ने पर इनमें से कोई भी दृष्टिकोण अनुचित नहीं लगता। लेकिन साथ पढ़ने पर वे कुछ और कर रहे थे। वे संवैधानिक सुरक्षा को वैधानिक रोक के अधीन बना रहे थे।फैसले में स्पष्ट कहा गया कि कोई छोटी पीठ बड़ी पीठ द्वारा स्थापित बाध्यकारी सिद्धांत को “कमजोर, दरकिनार या अनदेखा” नहीं कर सकती। तीन-न्यायाधीशीय पीठ ने नजीब मामले में कहा था कि जब हिरासत दमनकारी हो जाए तो वैधानिक रोक अनुच्छेद 21 के आगे झुक जाती है। लेकिन गुरविंदर सिंह और गुलफिशा फातिमा मामलों ने कहा कि अनुच्छेद 21 तक पहुँचने से पहले वैधानिक रोक पार करनी होगी।

सुधारात्मक फैसला

न्यायमूर्ति भुइयाँ के अंद्राबी फैसले ने इन दोनों निर्णयों को चुनौती दी। अदालत ने कहा कि इनका तर्क “ऐसी बात गढ़ने और फिर उसे नष्ट करने” जैसा है। नजीब ने कभी नहीं कहा था कि केवल समय बीतने से स्वतः जमानत मिल जाएगी। उसने केवल इतना कहा था कि अनिश्चितकालीन हिरासत का एकमात्र आधार वैधानिक प्रतिबंध नहीं हो सकता।

न्यायिक अनुशासन का मुद्दा भी उतना ही महत्वपूर्ण था। दो-न्यायाधीशों की पीठ तीन-न्यायाधीशों की पीठ से बंधी होती है। यदि उसे असहमति है, तो ईमानदार रास्ता यही है कि मामला मुख्य न्यायाधीश को भेजा जाए ताकि बड़ी पीठ के समक्ष रखा जा सके। पुनर्व्याख्या के माध्यम से फैसले को कमजोर करना स्वीकार्य विकल्प नहीं है।

सिद्धांत के पीछे की संरचना

“स्टेयर डिसीसिस” वह सिद्धांत है जिसके अनुसार अदालतों को समान कानूनी प्रश्नों पर उच्च और पूर्व पीठों के फैसलों का पालन करना होता है। जब छोटी पीठें असुविधाजनक पूर्वनिर्णयों को संकुचित व्याख्या से कमजोर करती हैं, तब न्यायिक ढाँचा कमजोर पड़ने लगता है। उचित रास्ता यही है कि मामला बड़ी पीठ के पास भेजा जाए। अन्यथा समान मामलों में अलग-अलग पीठों से अलग-अलग सिद्धांत लागू होते हैं और कानून एक तरह से “लिस्टिंग के आधार पर पंचायत” बन जाता है।

आँकड़े क्या कहते हैं

फैसले ने संवैधानिक तर्क को सरकारी आँकड़ों के आधार पर और मजबूत किया। संसद में प्रस्तुत राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आँकड़े एक चौंकाने वाली तस्वीर पेश करते हैं।2019 से 2023 के बीच यूएपीए मामलों में दोषसिद्धि दर राष्ट्रीय स्तर पर केवल 1.56 से 6.06 प्रतिशत के बीच रही। जम्मू-कश्मीर में यह दर पूरे समय 1 प्रतिशत से भी कम रही। अभियोजन पक्ष के अपने आँकड़ों के अनुसार, 100 में से 94 से अधिक यूएपीए आरोपी अंततः बरी हो जाते हैं। कश्मीर में यह संख्या 99 प्रतिशत से भी अधिक है।

अदालत ने यह नहीं कहा कि कम दोषसिद्धि दर अपने आप जमानत का आधार है। लेकिन उसने यह अवश्य कहा कि ऐसे आँकड़ों के बीच मुकदमे से पहले की लंबी हिरासत को गैर-दंडात्मक बताना कठिन हो जाता है। जब बरी होना सांख्यिकीय रूप से सामान्य स्थिति हो, तब बिना मुकदमे के लंबी कैद सजा भुगतने के समान हो जाती है।

अंद्राबी का मामला

अंद्राबी कुपवाड़ा में ग्रामीण विकास विभाग में गाँव-स्तरीय कर्मचारी थे। उन्हें पहली बार 7 अगस्त 2019 को, अनुच्छेद 370 हटाए जाने के दो दिन बाद, हिरासत में लिया गया। उनके खिलाफ जम्मू-कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम, 1978 के तहत आदेश जारी हुआ था। बाद में उच्च न्यायालय ने उस हिरासत को रद्द कर दिया।

जून 2020 में उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने हंदवाड़ा के पास एक वाहन रोका और नकदी तथा हेरोइन बरामद की। आरोपपत्र में उनका नाम पुलिस के समक्ष दिए गए कथित बयान और मोबाइल फोन की सामग्री के आधार पर जोड़ा गया। उनके पास या उनके परिसर से कुछ भी बरामद नहीं हुआ।

पुलिस के समक्ष दिया गया बयान साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के तहत अस्वीकार्य है, क्योंकि यह पुलिस के समक्ष स्वीकारोक्ति को मान्यता नहीं देता। इसके अलावा, जिस फोन नंबर को सीमा पार के एक उग्रवादी ऑपरेटिव से जोड़ने का दावा किया गया था, वह भी जाँच में सही नहीं निकला। अपीलकर्ता के अनुसार, वह वास्तव में एक पाकिस्तानी टेलीकॉम कंपनी की ग्राहक सेवा लाइन थी।

चार सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी थी। अंद्राबी, जिन्होंने सबसे लंबी हिरासत काटी थी, अब भी जेल में थे। अभियोजन के अनुसार 350 से अधिक गवाहों की गवाही अभी बाकी थी। अदालत ने माना कि निकट भविष्य में मुकदमे का समाप्त होना “लगभग असंभव” है। इसलिए नजीब फैसला पूरी तरह लागू होता था।

और उमर खालिद?

फैसले में “गंभीर आपत्ति” व्यक्त किए गए हैं उस गुलफिशा फातिमा आदेश पर, जिसके कारण उमर खालिद और शरजील इमाम अब भी हिरासत में हैं। यह फैसला औपचारिक रूप से उस आदेश को पलट नहीं सकता था, क्योंकि यह भी दो-न्यायाधीशों की पीठ थी। लेकिन इसमें स्पष्ट कहा गया कि नजीब, जो तीन-न्यायाधीशों का फैसला है, “बाध्यकारी कानून” है और उसे “स्टेयर डिसीसिस” का संरक्षण प्राप्त है। यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय की छोटी पीठें भी उसे अनदेखा नहीं कर सकतीं।

यही वह रास्ता है जिसके माध्यम से अब उमर खालिद और शरजील इमाम फिर से जमानत की मांग कर सकते हैं। लेकिन दरवाजा खुलेगा या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि अगली बार मामला किस पीठ के सामने जाता है और कब।

छोटी पीठ, बड़ा सबक

अंद्राबी फैसला एक स्पष्ट संदेश देता है: जहाँ सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी पीठें बोल चुकी हैं, वहाँ छोटी पीठों को या तो उनका पालन करना चाहिए या मामला बड़ी पीठ को भेजना चाहिए।पिछले चार वर्षों में इसका उल्टा देखने को मिला। यह सिलसिला “एनआईए बनाम ज़हूर अहमद शाह वटाली” (2019) से शुरू हुआ, जिसने धारा 43-डी(5) की आरोपी-विरोधी व्याख्या की। फिर “गुरविंदर सिंह” (2024) ने उसी व्याख्या को पुनर्जीवित करने की कोशिश की। और फिलहाल इसका नवीनतम रूप जनवरी के “गुलफिशा फातिमा” फैसले में दिखाई दिया।

लेकिन संविधान किसी कानून के नीचे नहीं बैठता। और तीन-न्यायाधीशों की पीठ दो-न्यायाधीशों की पीठ की दया पर नहीं होती।

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