क्रूड ऑयल नहीं, नीतियों की कमजोरी है भारत के आर्थिक संकट की असली वजह: सुरजीत भल्ला
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क्रूड ऑयल नहीं, नीतियों की कमजोरी है भारत के आर्थिक संकट की असली वजह: सुरजीत भल्ला

भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा चुनौतियां सिर्फ पश्चिम एशिया के युद्ध या कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों तक सीमित नहीं हैं। देश की असली समस्या संरचनात्मक (Structural) है, जैसे विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) का अचानक गिरना, निवेशकों के भरोसे में कमी और नीतियों में अनिश्चितता।


पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देश की जनता से सोने की खरीद कम करने, ईंधन की बचत करने और विदेशी यात्राओं को टालने की अपील की है। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री ने खुद के काफिले की गाड़ियों को आधा कर दिया और साल की शुरुआत में ही चार घंटे लंबी कैबिनेट बैठक कर मंत्रियों को 'ईज ऑफ लिविंग' और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' पर कड़े निर्देश दिए। इस तरह के कदम किसी भी आम नागरिक और निवेशक के मन में यह सवाल पैदा करने के लिए काफी हैं कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था किसी बड़े संकट की तरफ बढ़ रही है?

लेकिन जाने-माने अर्थशास्त्री और नीति विशेषज्ञ सुरजीत भल्ला का मानना इससे बिल्कुल अलग है। 'द फेडरल' को दिए एक विशेष इंटरव्यू में उन्होंने साफ तौर पर कहा कि भारत के व्यापक आर्थिक संकेतक (Macroeconomic Indicators) जैसे महंगाई और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) अभी भी नियंत्रण में हैं। भारत 1991 के भुगतान संकट या 2013 के 'टेपर टेंट्रम' जैसे हालातों के आसपास भी नहीं है। असली समस्या मौजूदा तेल का झटका नहीं है, बल्कि समस्या इससे कहीं ज्यादा गहरी और संरचनात्मक है।

विदेशी निवेश का अचानक ढह जाना: एक बड़ा पहेली

सुरजीत भल्ला के अनुसार, साल 2024 तक के वैश्विक आंकड़ों को देखें तो भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता यह रही है कि देश में शुद्ध विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (Net FDI) पूरी तरह से ढह चुका है। एक समय भारत का FDI देश की जीडीपी का लगभग 2.5 प्रतिशत हुआ करता था, जो अब गिरकर 1 प्रतिशत से भी कम और कुछ तिमाहियों में तो महज 0.2 से 0.3 प्रतिशत के स्तर पर आ गया है।

यहाँ समझने वाली बात यह है कि विदेशी निवेशक तो भारत में पैसा लगाने से हिचक ही रहे हैं, साथ ही भारतीय निवेशक और कंपनियां भी देश में नया प्लांट लगाने या विस्तार करने के बजाय अपना पैसा विदेशों में निवेश कर रहे हैं। भारतीय कंपनियां अपनी कुल संपत्ति का लगभग 11 प्रतिशत हिस्सा रिजर्व (नकद) के रूप में दबाकर बैठी हैं, लेकिन वे घरेलू बाजार में निवेश करने से डर रही हैं। यह डर और संकोच आर्थिक सिद्धांतों के विपरीत है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि साल 2015 के बाद से यह स्थिति पैदा होने लगी?

2015 की वो 'ऐतिहासिक भूल' जिसने निवेशकों को डराया

सुरजीत भल्ला ने इस पहेली को सुलझाते हुए साल 2015 में भारत सरकार द्वारा पारित की गई नई द्विपक्षीय निवेश संधि (Bilateral Investment Treaty - BIT) के ढांचे को जिम्मेदार ठहराया। 2015 से पहले भारत का यह कानून दुनिया के अन्य विकासशील देशों जैसा ही था जो निवेशकों का स्वागत करता था। लेकिन नए कानून ने सब कुछ बदल दिया।

नए BIT कानून में एक बेहद जटिल नियम जोड़ा गया: यदि किसी विदेशी निवेशक का अपने भारतीय पार्टनर या सरकार के साथ कोई विवाद होता है, तो वह सीधे अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत (International Arbitration) नहीं जा सकता। उसे कम से कम पांच साल तक रुकना होगा, घरेलू स्तर पर बातचीत करनी होगी और अंत में भारतीय अदालतों के चक्कर काटने होंगे। भल्ला कहते हैं, "मैंने खुद प्रधानमंत्री को यह बात समझाई थी कि कोई भी विदेशी निवेशक भारत की धीमी और बोझिल न्यायिक प्रणाली के सामने नहीं जाना चाहता। यह दुनिया के किसी भी देश द्वारा बनाया गया सबसे दमनकारी निवेश कानून था।"

चूंकि विदेशी निवेश पुराने समझौतों (जो 10 से 15 साल के लिए होते हैं) के तहत आ रहा था, इसलिए शुरुआत में इसका असर नहीं दिखा। लेकिन जैसे ही वे पुराने कॉन्ट्रैक्ट खत्म हुए, निवेशकों ने भारत से दूरी बना ली। हालांकि सरकार को अपनी गलती का अहसास साल 2025 के बजट में हुआ जब वित्त मंत्री ने नए BIT ढांचे और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की समीक्षा की बात कही, लेकिन आज भी इसकी कोई स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आई है।

'डीप स्टेट' और नौकरशाही का रोड़ा

इंटरव्यू के दौरान जब सुरजीत भल्ला से पूछा गया कि क्या संस्थानों की कमजोरी और डर का माहौल निवेशकों को पीछे धकेल रहा है? तो उन्होंने बेबाकी से जवाब दिया। उन्होंने 'रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स' (पुरानी तारीखों से लगने वाले टैक्स) और अचानक लगाए जाने वाले एक्सपोर्ट बैन (निर्यात प्रतिबंधों) का जिक्र किया। इन कदमों ने व्यापार के माहौल को अनिश्चित बना दिया है।

इसके पीछे एक मनोवैज्ञानिक कारण भी था। सरकार को लगता था कि भारत इतना बड़ा बाजार है कि विदेशी निवेशक मजबूर होकर यहाँ आएंगे ही आएंगे। लेकिन वैश्विक दुनिया में निवेशकों के पास वियतनाम और बांग्लादेश जैसे अन्य विकल्प मौजूद थे, जो देखते ही देखते 'चाइना प्लस वन' का हब बन गए और भारत हाथ मलता रह गया।

भल्ला ने नीतियों के रुकने के पीछे 'डीप स्टेट' यानी निहित स्वार्थ वाले समूहों (Vested Interests) और नौकरशाही (Bureaucracy) को जिम्मेदार ठहराया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण साल 2022 के कृषि कानून थे। प्रधानमंत्री ने खुद मोंटेक सिंह अहलूवालिया से कृषि सुधारों पर रिपोर्ट तैयार करवाई थी क्योंकि वे जानते थे कि खेती में सुधार के बिना भारत विकसित नहीं हो सकता। लेकिन विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक नफा-नुकसान के चक्कर में सरकार पीछे हट गई। 1991 के आर्थिक सुधारों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि तब संसद में बिना किसी लंबी बहस के कड़े फैसले लिए गए थे क्योंकि देश को आगे बढ़ाना था, लेकिन आज मजबूत बहुमत के बावजूद सरकार निहित स्वार्थों के आगे झुक जाती है।

संतुष्टि का भाव (Complacency) सबसे बड़ा दुश्मन

आज की तारीख में प्रधानमंत्री मोदी राजनीतिक रूप से बेहद मजबूत हैं। वे लगातार राज्यों के चुनाव जीत रहे हैं। आलोचक भले कुछ भी कहें, लेकिन देश की सत्ता पर उनकी पकड़ अटूट है। अर्थव्यवस्था भी करीब 6 प्रतिशत की सम्मानजनक दर से बढ़ रही है।

सुरजीत भल्ला कहते हैं कि यही 'सम्मानजनक ग्रोथ' और लगातार चुनावी जीतें सरकार के भीतर एक खतरनाक 'संतुष्टि का भाव' (Complacency) ले आई हैं। जब आप हर तरफ 'विकसित भारत' और 'दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था' के नारे सुनते हैं, तो आपको लगता है कि सब कुछ ठीक है। लेकिन प्रधानमंत्री के अपने बड़े सपनों (भारत को विकसित राष्ट्र बनाने) के मुकाबले हम अभी कहीं नहीं टिकते। अगर इस माहौल में भी सुधार नहीं हुए, तो फिर कभी नहीं होंगे।

करेंसी मार्केट: ₹97 के पार रुपया और आरबीआई की भूमिका

इंटरव्यू का एक और मुख्य बिंदु था डॉलर के मुकाबले रुपये का लगातार कमजोर होना, जो इस समय लगभग ₹97 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि रिजर्व बैंक (RBI) को रुपये को बचाने के लिए दखल नहीं देना चाहिए और इसे अपने बाजार स्तर पर आने देना चाहिए।

सुरजीत भल्ला ने इस विचार को पूरी तरह से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि जो लोग 2013 के संकट से इसकी तुलना कर रहे हैं, वे गलत हैं। रुपया इसलिए कमजोर नहीं है कि हमारे पास विदेशी मुद्रा भंडार की कमी है। रुपया इसलिए कमजोर है क्योंकि हमारे निवेश कानूनों की वजह से बाजार में डॉलर की सप्लाई घट गई है। यह सामान्य अर्थशास्त्र है—मांग और आपूर्ति का नियम। अगर आप संरचनात्मक सुधार नहीं करेंगे और केवल रुपये को गिरने देंगे, तो भारत की 85% तेल आयात निर्भरता के कारण देश में महंगाई का एक ऐसा चक्रव्यूह शुरू हो जाएगा जिससे आम जनता त्रस्त हो जाएगी। भल्ला ने दावा किया कि यदि सरकार केवल 2015 से पहले के BIT ढांचे को वापस ले आए और रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स को हमेशा के लिए खत्म कर दे, तो रुपया बिना किसी हस्तक्षेप के खुद-ब-खुद मजबूत हो जाएगा।


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