
शिवाजी की छवि पर टकराव, इतिहास, सत्ता और विचारधारा की जंग
छत्रपति शिवाजी की विरासत पर बहस तेज है, जहां इतिहासकार उन्हें समावेशी शासक बताते हैं, जबकि कुछ विचारधाराएं उन्हें धार्मिक प्रतीक के रूप में पेश करती हैं।
समकालीन भारत में इतिहास की व्याख्या को लेकर चल रही बहस के केंद्र में छत्रपति शिवाजी की विरासत भी प्रमुख रूप से मौजूद है। “RSS@100” श्रृंखला के एक एपिसोड में लेखक और विश्लेषक Nilanjan Mukhopadhyay ने आरएसएस और संघ परिवार के अध्ययन के लिए जाने जाने वाले विद्वान Ram Puniyani से बातचीत की। इस चर्चा में शिवाजी की छवि, उनके संघर्षों की प्रकृति और इतिहास में उनके वास्तविक स्थान पर विस्तार से विचार किया गया।
शिवाजी की वास्तविक छवि क्या है?
राम पुनियानी के अनुसार, शिवाजी की छवि को समय-समय पर अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत किया गया है, लेकिन कुछ व्याख्याएं ऐतिहासिक सच्चाई से काफी दूर हैं। वह बताते हैं कि शिवाजी का पारिवारिक और सांस्कृतिक संदर्भ काफी विविधतापूर्ण था। उनके दादा मालोजी राव भोसले संतान प्राप्ति के लिए शाह शरीफ की दरगाह गए थे और पुत्र होने पर उनके नाम शाहजी और शरीफजी रखे गए। यह उस समय के सामाजिक-सांस्कृतिक मेलजोल को दर्शाता है।
शिवाजी स्वयं जन्म से राजा नहीं थे। उन्होंने किसानों के शोषण को देखा और एक ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश की, जो आम जनता के हित में हो। उन्होंने अपनी सेना तैयार की और सबसे पहले चंद्रराव मोरे जैसे एक हिंदू शासक को चुनौती देकर अपनी सत्ता की नींव रखी।
क्या शिवाजी के युद्ध धार्मिक थे?
इस सवाल पर पुनियानी स्पष्ट करते हैं कि शिवाजी के युद्ध मूल रूप से राजनीतिक थे, न कि धार्मिक। उनके पहले विरोधी चंद्रराव मोरे एक हिंदू राजा थे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि धर्म युद्ध का आधार नहीं था।बाद में मुगल सम्राट औरंगजेब और बीजापुर के आदिल शाह ने उन्हें अपने लिए खतरा माना। औरंगजेब ने राजा जय सिंह जैसे हिंदू सेनापति को शिवाजी के खिलाफ भेजा। दूसरी ओर, शिवाजी की सेना में सिद्दी संबाल, इब्राहिम और दौलत खान जैसे मुस्लिम सेनापति भी थे। उनकी तोपखाना और नौसेना में भी मुस्लिम अधिकारी अहम भूमिका निभाते थे।
इतना ही नहीं, जब शिवाजी औरंगजेब के दरबार में नजरबंद हुए, तो मदारी मेहतर नामक एक मुस्लिम ने उनकी मदद कर उन्हें वहां से निकलने में सहायता की। ये सभी उदाहरण बताते हैं कि उस समय का संघर्ष हिंदू-मुस्लिम विभाजन पर आधारित नहीं था, बल्कि सत्ता और क्षेत्रीय नियंत्रण पर केंद्रित था।
शिवाजी को हिंदू योद्धा के रूप में क्यों पेश किया गया?
शिवाजी को एक ‘हिंदू योद्धा’ के रूप में प्रस्तुत करने की शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई। इतिहासकार जेम्स मिल ने भारतीय इतिहास को हिंदू, मुस्लिम और ब्रिटिश काल में विभाजित किया। 1857 के विद्रोह के बाद, जब हिंदू और मुस्लिम एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़े, तब अंग्रेजों ने समाज को बांटने के लिए सांप्रदायिक व्याख्याओं को बढ़ावा दिया।
इसी प्रक्रिया में औरंगजेब को मुस्लिम शासक और शिवाजी को हिंदू राजा के रूप में प्रस्तुत किया गया, और उनके संघर्ष को धार्मिक रंग दे दिया गया। बाद में यह दृष्टिकोण विभिन्न सांप्रदायिक समूहों द्वारा अपनाया गया।
शिवाजी बनाम गांधी: बहादुरी और अहिंसा की तुलना
कुछ विचारधाराएं शिवाजी की वीरता को महात्मा गांधी की अहिंसा के मुकाबले खड़ा करती हैं। पुनियानी के अनुसार, यह एक वैचारिक रणनीति है, जिसमें हिंसा को महिमामंडित किया जाता है और अहिंसा को कमजोर दिखाया जाता है। इसी तरह सम्राट अशोक के बारे में भी यह कहा जाता है कि उनकी अहिंसा की नीति ने भारत को कमजोर किया, जबकि उनका साम्राज्य इतिहास के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक था।
‘हिंदवी स्वराज’ का वास्तविक अर्थ
शिवाजी द्वारा इस्तेमाल किया गया ‘हिंदवी स्वराज’ शब्द आज के ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा से अलग है। पुनियानी के अनुसार, ‘हिंदवी’ शब्द मूल रूप से भौगोलिक पहचान को दर्शाता था, न कि धार्मिक। शिवाजी के लिए यह एक ऐसी शासन व्यवस्था थी, जिसमें सभी धर्मों के लोग शामिल हों।
उनकी नीतियों में यह स्पष्ट दिखता है—उन्होंने अपनी सेना में मुस्लिम सैनिकों को शामिल किया, रायगढ़ में मुस्लिम प्रजा के लिए मस्जिद बनवाई और धार्मिक समावेशिता को बढ़ावा दिया।
क्या आज ‘हिंदवी स्वराज’ का इस्तेमाल अलग तरीके से हो रहा है?
पुनियानी का मानना है कि आज इतिहास के कुछ हिस्सों को चुनकर उन्हें वर्तमान राजनीतिक उद्देश्यों के अनुसार प्रस्तुत किया जा रहा है। हालांकि, शिवाजी की वास्तविक नीतियां इस तरह की व्याख्याओं का समर्थन नहीं करतीं।
शिवाजी की विरासत को कैसे समझें?
शिवाजी की विरासत को सही संदर्भ में समझने की जरूरत है। समाज सुधारक ज्योतिराव फुले ने उन्हें “लोक कल्याणकारी राजा” बताया था, जो किसानों, पिछड़े वर्गों और आम जनता के हितों के लिए काम करते थे।आज भी महाराष्ट्र में मुस्लिम समुदाय के लोग शिवाजी का सम्मान करते हैं, और उनकी कई प्रसिद्ध चित्रकारी मुस्लिम कलाकारों द्वारा बनाई गई है।
छत्रपति शिवाजी को केवल एक धार्मिक प्रतीक के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व और योगदान को सीमित करना होगा। वे एक समावेशी शासक थे, जिन्होंने सभी समुदायों के हित में काम किया। उनकी नीतियां और दृष्टिकोण यह दिखाते हैं कि उनका शासन धार्मिक पहचान से परे था।इसलिए, उनकी विरासत को सही ऐतिहासिक संदर्भ में समझना और उसे सांप्रदायिक नजरिए से मुक्त रखना आज के समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

