ग्रीनविच बनाम उज्जैन: क्या सच में बदल सकता है दुनिया का टाइमजोन? देखें
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"उज्जैन गहरा सांस्कृतिक महत्व रखने वाला एक स्थल और हमारी सभ्यता की जीवंत स्मृति बना हुआ है। लेकिन दुनिया की घड़ियाँ..." फोटो: iStock

ग्रीनविच बनाम उज्जैन: क्या सच में बदल सकता है दुनिया का टाइमजोन? देखें

उज्जैन सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण और सभ्यता की स्मृति है। लेकिन इसकी संभावना बहुत कम है कि दुनिया की घड़ियां खुद को इसके इर्द-गिर्द फिर से सेट करेंगी..


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इस महीने की शुरुआत में उज्जैन में आयोजित एक सम्मेलन में, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सवाल उठाया कि वैश्विक समय-निर्धारण (Timekeeping) का केंद्र ग्रीनविच से हटाकर उज्जैन क्यों नहीं स्थानांतरित किया जाना चाहिए। इस दो-भागों वाली श्रृंखला के पहले हिस्से में हम यह देखेंगे कि कैसे मंत्री जी का तर्क, जो उज्जैन की कथित विशिष्ट भौगोलिक स्थिति पर आधारित है। ये न केवल बुनियादी भूगोल के स्तर पर धराशायी हो जाता है बल्कि यह तथ्य भी सामने आता है कि 1972 के बाद से 'ग्रीनविच मीन टाइम' (GMT) वैश्विक मानक रहा ही नहीं है।

धर्मेंद्र प्रधान का तर्क और भौगोलिक त्रुटि

उज्जैन में भारत की ज्ञान परंपराओं पर आयोजित एक सम्मेलन में एक साहसिक विचार रखा गया: दुनिया को ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) का पालन क्यों जारी रखना चाहिए? वैश्विक समय-निर्धारण का केंद्र भारत, विशेष रूप से उज्जैन को क्यों न बनाया जाए? शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने तर्क दिया कि उज्जैन उस विशिष्ट बिंदु पर स्थित है, जहां पृथ्वी की भूमध्य रेखा (Equator) और कर्क रेखा (Tropic of Cancer) एक-दूसरे को काटती हैं। इसलिए दुनिया को 'महाकाल मानक समय' (MST) अपनाना चाहिए।

यह सुझाव प्रतीकात्मक है और राष्ट्रीय गौरव की भावना जगाता है। आखिरकार, उज्जैन का भारत के बौद्धिक और सांस्कृतिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। हालांकि, यहां दो मुख्य समस्याएं हैं- उज्जैन की भौगोलिक स्थिति के बारे में मंत्री जी का दावा गलत है और दूसरी बात यह कि दुनिया अब GMT का पालन नहीं करती है। साल 1972 में 'समन्वित सार्वभौमिक समय' (UTC) ने इसकी जगह ले ली थी।



"अधिकांश भारतीय खगोलीय ग्रंथों ने उज्जैन से गुजरने वाले देशांतर, जिसे 'मध्यरेखा' कहा जाता है, का उपयोग संदर्भ मेरिडियन (Reference Meridian) के रूप में किया और खगोलीय पिंडों की स्थितियों की गणना उस काल्पनिक बिंदु के आधार पर की जहाँ यह रेखा भूमध्य रेखा को काटती थी, जिसे 'लंका' के नाम से जाना जाता है।"


बुनियादी भूगोल की विफलता

पृथ्वी अपनी धुरी (उत्तर और दक्षिण ध्रुव) पर घूमती है। भूमध्य रेखा इनके बीच की काल्पनिक रेखा है। कर्क रेखा भूमध्य रेखा से लगभग 23.5 डिग्री उत्तर में स्थित है। वास्तव में, ये दोनों रेखाएं समानांतर वृत्त (Parallel circles) हैं। ये कभी नहीं मिलतीं, ये मिल ही नहीं सकतीं। रेलवे की पटरियों की तरह ये एक-दूसरे के साथ चलती हैं और कभी एक-दूसरे को नहीं काटतीं। इस प्रकार, मंत्री जी का दावा बुनियादी भूगोल के स्तर पर ही विफल हो जाता है।

उज्जैन का वास्तविक ऐतिहासिक महत्व

अक्षांश और देशांतर की अवधारणा को समझना जरूरी है। देशांतर (Longitudes) उत्तरी ध्रुव को दक्षिणी ध्रुव से जोड़ने वाली काल्पनिक रेखाएं हैं। इन्हें मेरिडियन रेखाएं भी कहा जाता है।

प्राचीन भारतीय खगोलविदों ने उज्जैन से गुजरने वाले देशांतर को 'मध्यरेखा' के रूप में पहचाना था। वह बिंदु जहाँ यह रेखा भूमध्य रेखा को काटती थी, उसे 'लंका' नाम दिया गया था (इसका आधुनिक श्रीलंका से कोई संबंध नहीं है)। अधिकांश भारतीय खगोलशास्त्रीय ग्रंथों ने इस मध्यरेखा को संदर्भ मेरिडियन के रूप में इस्तेमाल किया और खगोलीय स्थितियों की गणना इसी काल्पनिक बिंदु 'लंका' के आधार पर की।

क्या उज्जैन का समय कभी मानक था?

हालांकि अधिकांश सिद्धांत (Siddhāntas) उज्जैन को मुख्य मेरिडियन के रूप में उपयोग करते हैं, 'रोमक सिद्धांत' दिन की शुरुआत यवनपुर (आधुनिक अलेक्जेंड्रिया, मिस्र) के सूर्यास्त से मानता है। ऐतिहासिक रूप से इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि उज्जैन के समय को कभी एक एकीकृत मानक के रूप में अपनाया गया था। किसी भी शिलालेख या ताम्रपत्र रिकॉर्ड में उज्जैन समय का उपयोग नहीं मिलता है।

आज कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कोहिमा तक 'दोपहर के 12:00 बजे' का मतलब एक ही है और यह रेलवे, टेलीग्राफी और वैज्ञानिक मौसम विज्ञान का परिणाम है। इसका उज्जैन से कोई लेना-देना नहीं है।



"इस बात का कोई लेशमात्र भी प्रमाण नहीं है कि ऐतिहासिक काल में उज्जैन के समय को कभी एक एकीकृत मानक के रूप में अपनाया गया था। यहाँ तक कि एक भी शिलालेख या ताम्रपत्र रिकॉर्ड ऐसा नहीं मिलता जिसमें उज्जैन के समय का उपयोग किया गया हो।"

आधुनिक समय की आवश्यकताएं बनाम परंपरा

मानक समय (Standard Time) की आवश्यकता आधुनिक जरूरतों, जैसे रेलवे, टेलीग्राफ नेटवर्क और वैश्विक पूंजीवाद के कारण पैदा हुई। जब 19वीं शताब्दी में वैश्विक समय प्रणालियां विकसित हुईं, तब उज्जैन के पास वे उपकरण और डेटा निरंतरता नहीं थी जो उसे एक गंभीर दावेदार बना सके।

सवाई जय सिंह द्वारा 18वीं शताब्दी में बनाई गई जंतर-मंतर वेधशालाएं अपने समय में प्रभावशाली थीं। लेकिन वे आधुनिक वेधशालाओं की सटीकता के सामने टिक नहीं पाईं और अंततः अप्रचलित हो गईं।

भौगोलिक विसंगतियां और व्यावहारिक कठिनाइयां

12वीं शताब्दी के गणितज्ञ-खगोलशास्त्री भास्कराचार्य के 'सिद्धांत शिरोमणि' के अनुसार, मध्यरेखा लंका, उज्जयिनी (उज्जैन), कुरुक्षेत्र से होकर उत्तरी ध्रुव तक जाती है। लेकिन आधुनिक भूगोल के अनुसार, उज्जैन और कुरुक्षेत्र के देशांतर में काफी अंतर है। इसी तरह श्रीपति जैसे अन्य मध्ययुगीन खगोलविदों द्वारा बताए गए स्थान भी विश्व मानचित्र पर एक सीधी रेखा में नहीं आते हैं।

प्रशासनिक चुनौतियां

समय क्षेत्र (Time zones) केवल मानचित्र पर खिंची लकीरें नहीं हैं; वे दैनिक जीवन को प्रभावित करते हैं। यदि भारत उज्जैन-आधारित समय क्षेत्र में स्थानांतरित होता है तो अरुणाचल प्रदेश के छात्रों को स्थानीय सौर समय के अनुसार बहुत जल्दी स्कूल शुरू करना पड़ेगा। सूरज और घड़ी के बीच का यह अंतर पूर्वी भारत में भारी कठिनाइयां पैदा करेगा और अलग समय क्षेत्रों की मांग को और तेज कर देगा।

GMT अब मानक नहीं है

शायद कई लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि GMT 1972 से ही वैश्विक मानक नहीं रहा है। आज दुनिया 'समन्वित सार्वभौमिक समय' (UTC) का पालन करती है। UTC सूर्य के पारगमन पर नहीं, बल्कि 450 से अधिक परमाणु घड़ियों (Atomic Clocks) के वैश्विक नेटवर्क पर आधारित है।

भारत भी इस प्रणाली का हिस्सा है। नई दिल्ली स्थित CSIR-राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (NPL) की परमाणु घड़ियां इस वैश्विक नेटवर्क में योगदान देती हैं। इसलिए UTC कोई थोपी गई पश्चिमी प्रणाली नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय सामूहिक प्रणाली है।

भारत के बौद्धिक अतीत पर गर्व करने में कुछ भी गलत नहीं है। उज्जैन सांस्कृतिक और सभ्यतागत दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन वैज्ञानिक और व्यावहारिक धरातल पर 'महाकाल समय' का विचार केवल एक कल्पना मात्र है। दुनिया की घड़ियां प्रतीकवाद के आधार पर अपनी सुइयां नहीं बदलेंगी।

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