सुपर एल नीनो की आहट से बढ़ी चिंता, क्या कमजोर पड़ेगा मानसून?
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सुपर एल नीनो की आहट से बढ़ी चिंता, क्या कमजोर पड़ेगा मानसून?

वैश्विक एजेंसियों ने सुपर एल नीनो की आशंका जताई है। इससे भारत में कमजोर मानसून, सूखा और गर्मी बढ़ने की चिंता गहरा गई है।


दुनियाभर की मौसम एजेंसियों और जलवायु वैज्ञानिकों की नजरें इन दिनों असामान्य रूप से प्रशांत महासागर पर टिकी हुई हैं। वजह है संभावित “सुपर एल नीनो” का खतरा, जिसे लेकर लगातार चेतावनियां सामने आ रही हैं। अमेरिका की राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन संस्था (NOAA) के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर ने अपनी हालिया एडवाइजरी में मई-जुलाई अवधि के दौरान सुपर एल नीनो बनने की 82 प्रतिशत संभावना जताई है।

क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर का अनुमान है कि यह घटना उत्तरी गोलार्ध की सर्दियों यानी नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच अपने चरम पर पहुंच सकती है और 2027 की शुरुआत तक बनी रह सकती है। यही कारण है कि दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिक और सरकारें सतर्क हो गई हैं।यूरोपीय मौसम एजेंसी ECMWF, विश्व मौसम संगठन (WMO) और इंटरनेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट एंड सोसाइटी (IRI) जैसी संस्थाओं का भी मानना है कि इस बार प्रशांत महासागर का तापमान असाधारण रूप से बढ़ सकता है और यह एक “सुपर एल नीनो” का रूप ले सकता है।

क्यों डराता है एल नीनो?

मजबूत एल नीनो घटनाएं अक्सर दुनिया के कई हिस्सों में सूखा, फसल संकट, बारिश के पैटर्न में बदलाव, भीषण गर्मी और जंगलों में आग की घटनाओं को बढ़ा देती हैं। इसके अलावा समुद्र के गर्म होने से प्रवाल भित्तियों (कोरल रीफ) को भी भारी नुकसान पहुंचता है।

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर है। एल नीनो के दौरान अक्सर मानसूनी बारिश कमजोर पड़ जाती है, जिससे कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। हालांकि वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि केवल एल नीनो के आधार पर भारत के मानसून का भविष्य तय नहीं होता।

आखिर एल नीनो है क्या?

“एल नीनो” नाम सबसे पहले पेरू के मछुआरों ने दिया था। उन्होंने देखा कि कुछ वर्षों में समुद्र का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है, जिससे मछलियों की संख्या प्रभावित होती है। उन्होंने इस घटना को “एल नीनो” यानी “बालक” कहा, जो ईसा मसीह के बाल रूप का संदर्भ था। इसके उलट जब समुद्र का पानी सामान्य से ठंडा हो जाता है तो उसे “ला नीना” यानी “बालिका” कहा जाता है।ये घटनाएं हर साल नहीं होतीं, बल्कि आमतौर पर दो से सात साल के अंतराल पर सामने आती हैं।

प्रशांत महासागर और मौसम का संबंध

एल नीनो के दौरान पूर्वी और मध्य प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। वहीं ला नीना के दौरान यही क्षेत्र सामान्य से ठंडा हो जाता है।लेकिन यह केवल समुद्र की कहानी नहीं है। वैज्ञानिकों ने पाया कि प्रशांत महासागर के ऊपर वायुदाब भी लगातार बदलता रहता है। जब एक हिस्से में दबाव कम होता है, तो दूसरे हिस्से में बढ़ जाता है। इस प्रक्रिया को “सदर्न ऑस्सिलेशन” कहा गया।

बाद में वैज्ञानिकों ने समझा कि समुद्र और वातावरण की ये दोनों प्रक्रियाएं आपस में जुड़ी हुई हैं। समुद्र का तापमान बढ़ने से वाष्पीकरण बढ़ता है, बादल बनते हैं, हवाओं की दिशा बदलती है और फिर वही हवाएं समुद्र के पानी को प्रभावित करती हैं। इसी संयुक्त प्रक्रिया को ENSO यानी “एल नीनो सदर्न ऑस्सिलेशन” कहा जाता है।

हर एल नीनो एक जैसा नहीं होता

वैज्ञानिक बताते हैं कि सभी एल नीनो घटनाएं समान नहीं होतीं। कुछ कमजोर होती हैं, कुछ मध्यम और कुछ बेहद शक्तिशाली।2018-19 का एल नीनो कमजोर माना गया था, जबकि 2015-16 का एल नीनो अब तक के सबसे ताकतवर एल नीनो में गिना जाता है।इसकी ताकत मापने के लिए वैज्ञानिक “ओशन नीनो इंडेक्स” (ONI) का इस्तेमाल करते हैं। यह बताता है कि समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से कितना ज्यादा या कम है।

अगर ONI +0.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाए तो एल नीनो की स्थिति मानी जाती है। +0.5°C से +1°C के बीच इसे कमजोर, +1°C से +1.5°C के बीच मध्यम और उससे ऊपर मजबूत एल नीनो माना जाता है।

अभी स्थिति क्या है?

हालांकि चेतावनियां गंभीर हैं, लेकिन मई 2026 तक आधिकारिक रूप से एल नीनो घोषित नहीं किया गया है।जनवरी-मार्च 2026 के दौरान ONI करीब -0.2°C से -0.3°C के बीच था। फरवरी-अप्रैल 2026 में यह लगभग 0.0°C रहा। मार्च-मई 2026 के लिए इसका अनुमान +0.1°C से +0.3°C के बीच है।लेकिन NOAA के अनुसार मई 2026 के दूसरे सप्ताह तक साप्ताहिक तापमान बढ़कर +0.9°C तक पहुंच गया था। इसका मतलब है कि महासागर तेजी से गर्म हो रहा है और एल नीनो की स्थिति बन सकती है।वैज्ञानिकों के अनुसार फिलहाल यह चेतावनी की स्थिति है, घबराहट की नहीं।

क्या भारत का मानसून जरूर कमजोर होगा?

जरूरी नहीं। वैज्ञानिकों ने 1997 में यह बात समझी, जब इतिहास के सबसे शक्तिशाली एल नीनो में से एक होने के बावजूद भारत का मानसून पूरी तरह विफल नहीं हुआ। बाद में वैज्ञानिकों ने इसके पीछे “इंडियन ओशन डाइपोल” (IOD) नाम की एक दूसरी जलवायु प्रक्रिया की भूमिका खोजी।

क्या है इंडियन ओशन डाइपोल?

हिंद महासागर में भी तापमान का एक पूर्व-पश्चिम झुकाव बनता है।जब अफ्रीका के पास पश्चिमी हिंद महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म और इंडोनेशिया के पास पूर्वी हिस्सा ठंडा हो जाता है, तो इसे “पॉजिटिव IOD” कहा जाता है।गर्म पानी हवा को गर्म करता है, जिससे बादल और बारिश बनने में मदद मिलती है। इसलिए पॉजिटिव IOD भारत में मानसूनी बारिश को मजबूत करने में मदद कर सकता है।इसके विपरीत “नेगेटिव IOD” मानसून को कमजोर कर सकता है।

एल नीनो बनाम IOD: एक खींचतान

वैज्ञानिक अब इसे एक तरह की खींचतान मानते हैं।एल नीनो भारतीय मानसून को कमजोर करने की कोशिश करता है, जबकि पॉजिटिव IOD उसकी भरपाई कर सकता है।1997 में पॉजिटिव IOD इतना मजबूत था कि उसने एल नीनो के असर को काफी हद तक संतुलित कर दिया।अब 2026-27 में भी मौसम वैज्ञानिक इसी बात पर नजर रख रहे हैं कि क्या पॉजिटिव IOD फिर से भारत को राहत देगा।

आगे क्या हो सकता है?

ऑस्ट्रेलियाई मौसम विभाग के मुताबिक मई 2026 की शुरुआत में IOD न्यूट्रल स्थिति में था और इसका इंडेक्स -0.04°C था। हालांकि आने वाले महीनों में पॉजिटिव IOD बनने की संभावना जताई गई है।अगर एल नीनो मजबूत होता है तो मानसून कमजोर पड़ सकता है। लेकिन अगर उसी समय पॉजिटिव IOD भी विकसित हो जाता है तो वह मानसून को कुछ हद तक बचा सकता है।हालांकि वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि IOD का बहुत पहले से सटीक अनुमान लगाना आसान नहीं होता। हिंद महासागर की परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं।

अभी घबराने की नहीं, सतर्क रहने की जरूरत

फिलहाल दुनिया भर में “सुपर एल नीनो” को लेकर चिंता जरूर बढ़ी है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।मौसम और महासागरों की यह जटिल प्रणाली लगातार बदलती रहती है। इसलिए भारत समेत दुनिया भर के देश आने वाले महीनों में प्रशांत और हिंद महासागर दोनों की गतिविधियों पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।

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