
हेट स्पीच के मुद्दे से निपटने के लिए मौजूदा कानून पर्याप्त: SC
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि आपराधिक अपराधों का निर्माण और सजा का निर्धारण पूरी तरह से विधायी दायरे में आता है...
बुधवार (29 अप्रैल) को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नफरत फैलाने वाले भाषणों (हेट स्पीच) के मुद्दे से निपटने के लिए मौजूदा कानून पर्याप्त हैं और हस्तक्षेप की आवश्यकता वाली कोई "विधायी शून्यता" (legislative vacuum) मौजूद नहीं है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि आपराधिक अपराधों का निर्माण और सजा का निर्धारण पूरी तरह से विधायी दायरे में आता है।
'शक्तियों का पृथक्करण'
न्यायमूर्ति नाथ ने फैसला सुनाते हुए कहा, "शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत (doctrine of separation of powers) पर आधारित संवैधानिक योजना न्यायपालिका को न्यायिक निर्देशों के माध्यम से नए अपराध बनाने या आपराधिक दायित्व की रूपरेखा का विस्तार करने की अनुमति नहीं देती है।"
याचिकाओं में मांगे गए निर्देश जारी करने से इनकार करते हुए, पीठ ने मौजूदा आपराधिक कानून का हवाला दिया और कहा कि यह हेट स्पीच के अपराध से भी निपटता है।
पीठ ने कहा, "इस अदालत की मिसाल (precedents) लगातार पुष्टि करती हैं कि हालांकि संवैधानिक अदालतें कानून की व्याख्या कर सकती हैं और मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन को सुरक्षित करने के लिए निर्देश जारी कर सकती हैं। लेकिन वे कानून नहीं बना सकतीं या कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं।"
पीठ ने कहा कि यह केंद्र और सक्षम विधायी अधिकारियों के लिए खुला होगा कि वे अपने विवेक से विचार करें कि क्या विकसित होती सामाजिक चुनौतियों के आलोक में किसी और विधायी या नीतिगत उपायों की आवश्यकता है या मार्च 2017 की विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट द्वारा सुझाए गए उपयुक्त संशोधन लाए जाने चाहिए।
(एजेंसी इनपुट के साथ)

