
क्या महिला आरक्षण और परिसीमन के बहाने अपना स्थायी मैदान तैयार कर रही है BJP?
क्या महिला आरक्षण का नया दांव केवल परिसीमन को लागू करने का एक बहाना है? जानिए कैसे 850 सीटों वाली नई लोकसभा भारत की राजनीति को उत्तर भारतीय राज्यों के पक्ष में पूरी तरह मोड़ सकती है।
केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण अधिनियम को लागू करने की दिशा में जो ताजा कदम उठाए हैं, उन्होंने देश की राजनीति में एक बड़ा तूफ़ान खड़ा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या महिला आरक्षण को परिसीमन (Delimitation) के साथ जोड़ना एक सोची-समझी रणनीति है, जिसका उद्देश्य 2029 से पहले भारत के राजनीतिक संतुलन को उत्तर भारतीय राज्यों के पक्ष में झुकाना है? विशेष सत्र में आनन-फानन में पेश किए गए तीन विधेयकों ने सरकार की नीयत और समय (Timing) पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। केंद्र सरकार द्वारा विशेष सत्र में आनन-फानन में तीन बिल लाने के फैसले का विपक्ष ने तीखा विरोध किया है। आलोचक इस कदम के समय और इरादे, दोनों को संदिग्ध मान रहे हैं। 'द फेडरल' ने इन बदलावों के पीछे की राजनीति और इसके संभावित असर पर चर्चा करने के लिए अपने पॉलिटिकल एडिटर पुनीत निकोलस यादव से खास बात की।
हड़बड़ी में क्यों है केंद्र सरकार?
सरकार का तर्क है कि वह सितंबर 2023 में किए गए वादे को निभा रही है और किसी भी देरी का मतलब होगा कि महिला आरक्षण 2029 के चुनावों तक भी लागू नहीं हो पाएगा। लेकिन राजनीतिक संपादक पुनीत निकोलस यादव के अनुसार, यह तर्क काफी कमजोर (Specious) लगता है। यदि सरकार इस कानून को 30 महीनों तक अधर में रख सकती थी, तो चर्चा के लिए 15 दिन और इंतजार करने में क्या हर्ज था?
विपक्ष ने मांग की थी कि पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए, लेकिन सरकार ने इसे नजरअंदाज कर दिया। ऐसा लगता है कि सरकार ने यह समय इसलिए चुना क्योंकि उसे पता है कि विपक्ष फिलहाल पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों के चुनावों में व्यस्त है।
विपक्ष का सबसे बड़ा धर्मसंकट
विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे महिला आरक्षण का विरोध नहीं कर सकते। यह आधी आबादी का मुद्दा है। सरकार ने बड़ी चतुराई से महिला आरक्षण को परिसीमन के साथ नत्थी (Tethered) कर दिया है। इसका मतलब यह है कि यदि आप परिसीमन का विरोध करते हैं, तो आप तकनीकी रूप से उस पूरे विधेयक का विरोध कर रहे हैं जिसमें महिला आरक्षण भी शामिल है। अब विपक्षी नेताओं के सामने संकट यह है कि वे जनता को कैसे समझाएंगे कि वे महिलाओं के हक के खिलाफ नहीं, बल्कि उस 'परिसीमन' के खिलाफ हैं जो राज्यों के प्रतिनिधित्व को असंतुलित कर सकता है।
परिसीमन का विवाद: क्या हार जाएगा दक्षिण भारत?
विधेयक में सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें सीटों के पुनर्गठन के लिए किसी निश्चित जनगणना (जैसे 2011) का स्पष्ट उल्लेख मुख्य पाठ में नहीं है। इसका मतलब है कि कोई भी सरकार भविष्य में अपनी पसंद की जनगणना को आधार बना सकती है।
सबसे बड़ा डर दक्षिण भारतीय और छोटे राज्यों को है। यदि परिसीमन पूरी तरह से जनसंख्या के आधार पर होता है, तो उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की सीटें नाटकीय रूप से बढ़ जाएंगी। वहीं, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्य, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्यों को बखूबी हासिल किया है, उन्हें अपनी राजनीतिक ताकत खोनी पड़ सकती है। पहले जो आश्वासन दिए गए थे कि किसी भी राज्य की सीटों का अनुपात कम नहीं होगा, वे इस नए बिल से गायब हैं।
संस्थागत स्वतंत्रता पर सवाल
नए परिसीमन ढांचे में एक और चिंताजनक बात यह है कि इसे पूरी तरह से कार्यपालिका (Executive) के नियंत्रण में रखा गया है। सरकार तय करेगी कि किस जनगणना का उपयोग करना है। परिसीमन आयोग अपनी रिपोर्ट सीधे गजट में प्रकाशित कर देगा, जिसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। पहले इसके लिए संसदीय मंजूरी की आवश्यकता होती थी, लेकिन अब ऐसा लगता है कि उस सुरक्षा कवच (Safeguard) को हटा दिया गया है। इसके अलावा, परिसीमन अब केवल नियमित जनगणना तक सीमित नहीं है; इसे किसी भी समय आदेशित किया जा सकता है, जिससे इसके दुरुपयोग की आशंका बढ़ गई है।
सीटों का गणित और ओबीसी कोटा
लोकसभा में कुल सीटों की संख्या कितनी होगी—650, 750 या अधिकतम 850? यह सब परिसीमन आयोग की सिफारिशों पर निर्भर करेगा। महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें रोटेशन के आधार पर बदलेंगी और यह व्यवस्था 15 साल तक लागू रहेगी। रही बात ओबीसी (OBC) कोटे के भीतर कोटे की, तो इसकी संभावना कम ही नजर आती है क्योंकि इसके लिए जातिगत जनगणना के आंकड़ों की जरूरत होगी, जो इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हैं।
BJP की व्यापक राजनीतिक रणनीति?
इसे पिछले डेढ़ साल के घटनाक्रमों के साथ जोड़कर देखना जरूरी है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव, मतदाता सूची का संशोधन और अब महिला आरक्षण के बहाने परिसीमन—ये सब एक बड़े पैटर्न का हिस्सा लगते हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बीजेपी को जो झटके लगे थे, परिसीमन के जरिए उन चुनावी परिणामों को भविष्य में पलटने की कोशिश की जा सकती है। परिसीमन केवल सीटों की संख्या नहीं बढ़ाता, बल्कि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और जनसांख्यिकी को भी बदल देता है, जिससे चुनावी नतीजे पूरी तरह प्रभावित हो सकते हैं।
विपक्ष के लिए आगे की राह
विपक्ष के लिए चुनौती केवल विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। उन्हें एक स्पष्ट वैकल्पिक मॉडल पेश करना होगा। नई संसद की इमारत का निर्माण पहले ही संकेत दे चुका था कि सीटों की संख्या बढ़ने वाली है। विपक्ष अब इस मुद्दे पर जनता को लामबंद करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन स्पष्टता के अभाव में यह लड़ाई कठिन है।

