
'बॉस स्कैम' ने उड़ाए होश, व्हाट्सएप के एक फर्जी मैसेज से भारतीय कंपनियों के डूबे करोड़ों रुपए
जालसाज कई बार सीधे कंपनी के बड़े अधिकारियों को निशाना बनाते हैं। उन्हें आरबीआई (RBI) या किसी अन्य रेगुलेटर के नाम से एक फर्जी नोटिस भेजा जाता है, जिसमें कोई फाइल अटैच होती है।
कहते हैं कि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। लेकिन साइबर अपराध की दुनिया में अब एक ऐसा नया बवंडर आया है जो लापरवाह लोगों को नहीं, बल्कि बेहद वफादार, समझदार और अपने काम के प्रति मुस्तैद कर्मचारियों को अपना शिकार बना रहा है। इस नए और बेहद शातिर खेल को सरकार ने नाम दिया है 'बॉस स्कैम' (Boss Scam)। इस फ्रॉड में अपराधी किसी कंपनी के सबसे बड़े मालिक, एमडी या सीईओ का मुखौटा पहनते हैं और पलक झपकते ही कंपनी के खातों से करोड़ों रुपए साफ कर देते हैं।
हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल के बेटे और पूर्व राज्यसभा सांसद नरेश गुजराल की दिल्ली स्थित गारमेंट कंपनी इसका शिकार बनी है। ठगों ने उनके नाम का इस्तेमाल कर कंपनी के भरोसेमंद कर्मचारियों को अपनी उंगलियों पर नचाया और देखते ही देखते ₹7.7 करोड़ उड़ा लिए।
नरेश गुजराल केस: कैसे हुआ ₹7.7 करोड़ का महा-घोटाला?
नरेश गुजराल के इस मामले ने जांच एजेंसियों के भी होश उड़ा दिए हैं। ठगों ने सिर्फ नाम का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि 'घाट-घाट का पानी पीकर' एक ऐसी गहरी साजिश रची जिसमें तकनीक का तगड़ा इस्तेमाल था। जांच में सामने आया कि जालसाजों ने सबसे पहले कंपनी के एक कर्मचारी के फोन पर एक खतरनाक 'मालवेयर' (वायरस वाली फाइल) भेजी। जैसे ही वह फाइल खुली, कर्मचारी का पूरा फोन हैक हो गया।
हैकर्स ने फोन का एक्सेस मिलते ही उसकी कांटेक्ट लिस्ट (Contact List) को बदल दिया। उन्होंने फोन में सेव नरेश गुजराल के असली नंबर को हटाकर अपना एक फर्जी नंबर वहां डाल दिया, लेकिन गुजराल साहब की फोटो को वैसे ही रहने दिया। अब जब भी ठगों की तरफ से कोई मैसेज आता, तो कर्मचारी के फोन पर नरेश गुजराल का नाम और उनकी तस्वीर ही चमकती थी। ठगों ने कनिष्ठ कर्मचारी को झांसा दिया कि एक बेहद जरूरी बिजनेस डील के लिए तुरंत फंड ट्रांसफर करना है। चूंकि आदेश सीधे 'मालिक' का दिख रहा था, इसलिए कर्मचारी ने बिना दोबारा सोचे चार बार में आरटीजीएस (RTGS) के जरिए ₹7.7 करोड़ ट्रांसफर कर दिए। कंपनी के सीएफओ ने भी इसे मालिक का ही आदेश समझकर अपनी मंजूरी दे दी। जब तक सच सामने आता, तब तक चिड़िया खेत चुग चुकी थी।
मुंबई में भी हुआ ऐसा ही खेल, उड़े ₹10.4 करोड़
दिल्ली के गुजराल केस जैसा ही एक और बड़ा मामला मुंबई से सामने आया। वहां एक निजी कंपनी के डिप्टी जनरल मैनेजर को एक अनजान नंबर से व्हाट्सएप मैसेज आया। भेजने वाले ने खुद को कंपनी का एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बताया। उसने कर्मचारी से कहा कि वह अभी एक बेहद जरूरी मीटिंग में व्यस्त है और फोन पर बात नहीं कर सकता, इसलिए सारे निर्देश व्हाट्सएप पर ही दिए जाएंगे। उसने कर्मचारी से उस नए नंबर पर डायरेक्टर साहब की प्रोफाइल पिक्चर (DP) लगाने को भी कह दिया।
इसके बाद शुरू हुआ पैसों का खेल। अगले 12 दिनों के भीतर ठग के कहने पर कर्मचारी ने एक के बाद एक कुल 63 बार में ₹10.4 करोड़ अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिए। हैरानी की बात यह है कि कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इस भुगतान को मंजूरी दे दी। इस महा-घोटाले का भंडाफोड़ तब हुआ जब कर्मचारी इन भुगतानों के बिल और इनवॉइस मांगने के लिए असली डायरेक्टर के केबिन में पहुंचा। डायरेक्टर ने साफ कहा कि उन्होंने ऐसा कोई आदेश कभी दिया ही नहीं था।
गृह मंत्रालय की संस्था I4C ने जारी की चेतावनी
इन बढ़ते मामलों को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय के साइबर विंग यानी 'इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर' (I4C) ने बकायदा एक एडवाइजरी जारी कर इस 'बॉस स्कैम' के तौर-तरीकों को उजागर किया है। आई4सी के मुताबिक, यह रैकेट तीन चीजों का एक घातक कॉम्बिनेशन है—पहला मालवेयर, दूसरा सोशल इंजीनियरिंग (बातों में फंसाना) और तीसरा किसी बड़े अधिकारी का रूप धरना (Executive Impersonation)।
जालसाज कई बार सीधे कंपनी के बड़े अधिकारियों को निशाना बनाते हैं। उन्हें आरबीआई (RBI) या किसी अन्य रेगुलेटर के नाम से एक फर्जी नोटिस भेजा जाता है, जिसमें कोई फाइल अटैच होती है। जैसे ही अधिकारी उस फाइल को कंप्यूटर पर खोलता है, उसका व्हाट्सएप वेब (WhatsApp Web) हैकर्स के कब्जे में चला जाता है। इसके बाद ठग अधिकारी के असली व्हाट्सएप अकाउंट से उसके अकाउंट्स डिपार्टमेंट के कर्मचारियों को पैसे भेजने के मैसेज करने लगते हैं। चूंकि मैसेज बिल्कुल असली अकाउंट से आता है, इसलिए किसी को भी दाल में कुछ काला नजर नहीं आता।
डीपफेक वीडियो कॉल: ठगी का सबसे खतरनाक रूप
यह फ्रॉड सिर्फ मैसेज और ईमेल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अब इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डीपफेक तकनीक का भी इस्तेमाल होने लगा है। जनवरी 2024 में हांगकांग की एक मशहूर बहुराष्ट्रीय कंपनी 'अरुप' (Arup) के एक कर्मचारी को कंपनी के ब्रिटेन में बैठे सीएफओ (CFO) के नाम से एक ईमेल मिला, जिसमें एक बेहद सीक्रेट फंड ट्रांसफर करने को कहा गया।
कर्मचारी को शुरुआत में शक हुआ, तो उसने पुष्टि करने के लिए कहा। इसके बाद उसे एक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कॉल पर आमंत्रित किया गया। जब उसने स्क्रीन पर देखा, तो सामने साक्षात कंपनी के सीएफओ और उसके कई अन्य सहकर्मी बैठे थे। वे मूव कर रहे थे, बात कर रहे थे और बकायदा उस कर्मचारी का नाम लेकर निर्देश दे रहे थे। आश्वस्त होने के बाद कर्मचारी ने करीब ₹200 करोड़ ($25.6 Million) ट्रांसफर कर दिए। बाद में पता चला कि उस वीडियो कॉल पर दिखने वाला एक-एक चेहरा और सुनाई देने वाली एक-एक आवाज 'डीपफेक' सॉफ्टवेयर से बनाई गई थी।
अगर खुद किया है ट्रांसफर, तो बैंक नहीं देगा एक भी पैसा!
इस स्कैम का सबसे डरावना कानूनी पहलू यह है कि इसमें डूबा पैसा वापस मिलना नामुमकिन के बराबर होता है। आमतौर पर लोग सोचते हैं कि आरबीआई के 2017 के नियमों के मुताबिक किसी भी साइबर फ्रॉड में ग्राहकों की 'जीरो लायबिलिटी' (शून्य जिम्मेदारी) होती है। लेकिन यहाँ पेंच फंसा हुआ है। अदालतों का मानना है कि यदि कंपनी के कर्मचारी ने खुद अपने होशो-हवाश में, भले ही झांसे में आकर, भुगतान का आदेश दिया है, तो उसे 'अनधिकृत लेनदेन' (Unauthorized Transaction) नहीं माना जा सकता।
दिसंबर 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 'सुरेश चंद्र नेगी बनाम बैंक ऑफ बड़ौदा' मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कहा कि यदि ग्राहक ने खुद चालाकी का शिकार होकर पैसे ट्रांसफर किए हैं, तो बैंक को इसके लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। नुकसान पूरी तरह से पीड़ित को ही उठाना होगा। साल 2025 में भारत को साइबर फ्रॉड के कारण करीब ₹22,495 करोड़ का भारी नुकसान हुआ है।
बचाव का केवल एक ही रास्ता
इस शातिर 'बॉस स्कैम' से बचने का केवल एक ही सीधा और सरल उपाय है—'पहले तोलो फिर बोलो'। जब भी आपके पास आपके किसी सीनियर या बॉस का कोई बेहद जरूरी या पैसों के ट्रांसफर से जुड़ा मैसेज आए, तो तुरंत उस नंबर पर कॉल न करें जो मैसेज में दिया गया है। इसके बजाय, अपनी कंपनी की डायरी या अपने फोन में पहले से सेव उनके पुराने और असली नंबर पर कॉल करके पुष्टि करें। व्हाट्सएप या ईमेल पर आए किसी भी अनजान लिंक या जिप (ZIP) फाइल को कभी न खोलें। किसी के दबाव या जल्दबाजी के झांसे में न आएं, क्योंकि हड़बड़ी ही साइबर अपराधियों की सबसे बड़ी ताकत होती है।

