
गायब होते सरकारी स्कूल, 5 साल में 15,000 पर ताला, कहीं कोर्ट में जंग, तो कहीं सड़क पर संग्राम
बिहार में लगभग 1,773 स्कूल पहले ही बंद हो चुके हैं और 8,500 और स्कूलों की पहचान की गई है। मध्य प्रदेश में 15 किमी के दायरे में स्कूलों के विलय ने ग्रामीण बच्चों के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
भारत में शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत कभी हर पड़ोस में स्कूल होने का सपना देखा गया था। लेकिन पिछले पांच वर्षों के आंकड़े एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2019 और 2024 के बीच देश भर में लगभग 15,000 सरकारी स्कूल नक्शे से गायब हो गए हैं। आधिकारिक तौर पर इन्हें "मर्ज" (विलय) किया गया है, ताकि संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके। लेकिन इस प्रक्रिया ने गांवों और कस्बों में शिक्षा की पहुंच को लेकर एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।
उत्तर प्रदेश: कानूनी लड़ाई और अभिभावकों का गुस्सा
उत्तर प्रदेश में स्कूलों के विलय का प्रयास एक बड़ी कानूनी जंग में बदल गया। शिक्षा विभाग ने 50 से कम छात्रों वाले प्राथमिक स्कूलों को 1 किमी के दायरे में और उच्च प्राथमिक स्कूलों को 3 किमी के दायरे में "जोड़ने" का प्रस्ताव रखा था।
लेकिन स्थानीय स्तर पर इसे इतनी जल्दबाजी में लागू किया गया कि माता-पिता और शिक्षक संघ विरोध में उतर आए। मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने फिलहाल इस पर रोक लगा दी है। सीतापुर के एक अभिभावक धीरज मौर्य कहते हैं, "अगर स्कूल में बच्चे कम हैं, तो यह सरकार की गलती है। अब मेरे छोटे बच्चों को घर से मीलों दूर जाना पड़ता है। क्या सरकार हमारी सुविधाओं के बजाय अपनी बचत देख रही है?"
कर्नाटक: 'मैग्नेट स्कूल' और निजीकरण का डर
कर्नाटक सरकार 'KPS मैग्नेट स्कूल' मॉडल के तहत हर ग्राम पंचायत में एक बड़ा स्कूल बनाना चाहती है। इसके लिए एशियाई विकास बैंक (ADB) से 2,000 करोड़ रुपये का कर्ज लिया गया है। सरकार का तर्क है कि एक छत के नीचे सारी सुविधाएं मिलेंगी।
हालांकि, 'ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन' के कार्यकर्ता सुभाष बेटाडाकोप्पा का आरोप है कि यह 40,000 सरकारी स्कूलों को बंद करने की साजिश है। उन्हें डर है कि भविष्य में इन मैग्नेट स्कूलों को निजी हाथों में सौंप दिया जाएगा, जिससे गरीब बच्चों के लिए शिक्षा महंगी हो जाएगी।
राजस्थान और झारखंड: विफल कार्यान्वयन का सबक
राजस्थान और झारखंड के अनुभव बताते हैं कि स्कूलों का विलय अक्सर नई बाधाएं खड़ी करता है। राजस्थान में 2015-16 के दौरान लगभग 17,000 स्कूलों का विलय किया गया था। लेकिन फील्डवर्क से पता चला कि समुदाय से कोई सलाह नहीं ली गई थी। छोटे बच्चों के लिए पहुंच इतनी मुश्किल हो गई कि एक साल के भीतर ही 4,000 स्कूलों को फिर से खोलना पड़ा।
झारखंड में भी यही कहानी दोहराई गई। 2020 के NCERT अध्ययन के अनुसार, स्कूलों को मर्ज करने से बुनियादी ढांचे या शिक्षकों की कमी दूर नहीं हुई। मर्ज किए गए 55% स्कूलों में विज्ञान और गणित जैसे मुख्य विषयों के शिक्षक ही नहीं थे।
बिहार और मध्य प्रदेश: सुरक्षा और ड्रॉपआउट का खतरा
बिहार में लगभग 1,773 स्कूल पहले ही बंद हो चुके हैं और 8,500 और स्कूलों की पहचान की गई है। मध्य प्रदेश में 15 किमी के दायरे में स्कूलों के विलय ने ग्रामीण बच्चों के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि लंबी दूरी और सुरक्षा चिंताओं के कारण लड़कियों का ड्रॉपआउट रेट बढ़ गया है। जब स्कूल घर से दूर होता है, तो माता-पिता सुरक्षा के डर से बेटियों को स्कूल भेजना बंद कर देते हैं।
हिमाचल और हरियाणा: भौगोलिक बाधाएं और निजी स्कूलों को बढ़ावा
हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी भौगोलिक स्थिति में 1 किमी की दूरी भी तय करना मुश्किल होता है। वहां 1,500 स्कूलों को बंद करने की पहचान की गई है, जिससे पहाड़ी समुदायों की शिक्षा तक पहुंच खत्म होने का खतरा है।
वहीं, हरियाणा में सरकार पर 'चिराग योजना' के माध्यम से बच्चों को निजी स्कूलों की ओर धकेलने का आरोप लग रहा है। कार्यकर्ता प्रमोद गौरी का कहना है कि सरकार निजी स्कूलों में जाने वाले बच्चों को 1,100 रुपये दे रही है, जबकि सरकारी स्कूलों में 50% से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं।
तर्क बनाम हकीकत: क्या वाकई बच रहे हैं संसाधन?
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के प्रोफेसर एस. श्रीनिवास राव के एक अध्ययन के अनुसार, स्कूलों के विलय के बाद वादा किया गया 'परिवहन भत्ता' (Transport Allowance) बच्चों को कभी मिला ही नहीं। कागजों पर यह नीति संसाधनों के "इष्टतम उपयोग" (Optimum Use) की बात करती है, लेकिन हकीकत में यह सबसे गरीब और हाशिए पर खड़े समुदायों के बच्चों को शिक्षा के अधिकार से दूर कर रही है।
सवाल अब केवल स्कूलों के विलय के पीछे के तर्क का नहीं है, बल्कि उसके परिणामों का है। जब पड़ोस का स्कूल गायब हो जाता है, तो क्या बड़ी इमारतों और स्मार्ट क्लासरूम से उस दूरी की भरपाई की जा सकती है जिसे एक नन्हा बच्चा तय नहीं कर पाता? इस 'दक्षता' की दौड़ में कहीं देश का भविष्य तो पीछे नहीं छूट रहा?
जैसे-जैसे अधिक राज्य स्कूलों के विलय (consolidation) और युक्तिकरण (rationalisation) की दिशा में बढ़ रहे हैं, सवाल अब केवल स्कूलों को आपस में मिलाने के तर्क का नहीं रह गया है, बल्कि इसके परिणामों का है। जब पड़ोस के स्कूल गायब हो जाते हैं, तो क्या शिक्षा तक पहुँच के इस नुकसान की भरपाई किसी भी चीज़ से की जा सकती है?
(बेंगलुरु से चंद्रप्पा एम. और लखनऊ से शिल्पी सेन के इनपुट्स के साथ।)
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