लॉकडाउन का वो खौफनाक मंजर, जब आंकड़ों में छिपाई गई मौतें, कोविड की त्रासदी का सच!
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लॉकडाउन का वो खौफनाक मंजर, जब आंकड़ों में छिपाई गई मौतें, कोविड की त्रासदी का सच!

कोविड-19 महामारी को गुजरे कुछ साल बीत चुके हैं, लेकिन उन यादों का जख्म आज भी ताजा है। जब दुनिया अपने घरों में बंद थी, तब भारत की सड़कों पर एक ऐसी त्रासदी जन्म ले रही थी, जिसने आजादी के बाद के सबसे बड़े विस्थापन को जन्म दिया।


कोविड-19 महामारी को गुजरे कुछ साल बीत चुके हैं, लेकिन उन यादों का जख्म आज भी ताजा है। जब दुनिया अपने घरों में बंद थी, तब भारत की सड़कों पर एक ऐसी त्रासदी जन्म ले रही थी, जिसने आजादी के बाद के सबसे बड़े विस्थापन को जन्म दिया। वरिष्ठ पत्रकार ज्योति यादव की किताब 'Faith and Fury: COVID Dispatches from India’s Hinterland' इसी त्रासदी का एक जीवंत और दर्दनाक दस्तावेज़ है।

7 मई 2020: एक सफर जो इतिहास बन गया

ज्योति यादव ने 7 मई 2020 को दिल्ली की सुरक्षा छोड़कर उत्तर प्रदेश और बिहार के गांवों का रुख किया। उस समय सड़कों पर लाखों प्रवासी मजदूर पैदल, साइकिलों पर या ट्रकों में लदकर अपने घरों की ओर जा रहे थे। ज्योति ने चिलचिलाती धूप, भूख, प्यास और प्रशासनिक बेरुखी के बीच उन लोगों की कहानियों को दर्ज किया, जिन्हें मुख्यधारा के मीडिया ने अक्सर आंकड़ों तक सीमित कर दिया था। अपनी किताब में ज्योति बताती हैं कि कैसे एक पत्रकार के तौर पर उन्हें न केवल शारीरिक थकान और बीमारी का सामना करना पड़ा, बल्कि उन अधिकारियों के गुस्से का भी शिकार होना पड़ा जो हकीकत सामने आने से डरते थे।

पहली लहर बनाम दूसरी लहर: मजदूरों का दोहरा दर्द

ज्योति यादव के अनुसार, पहली लहर प्रवासी मजदूरों के लिए सबसे ज्यादा क्रूर थी। अचानक लगे लॉकडाउन ने उन्हें शहरों में बेघर और बेरोजगार कर दिया। लोग लोहे की छड़ों और पत्थरों से लदे ट्रकों पर चढ़कर घर जाने को मजबूर थे। बिहार के कई परिवारों ने अपने बेटों और पिताओं को घर बुलाने के लिए 15,000 से 20,000 रुपये तक का कर्ज ऊंचे ब्याज पर लिया। ज्योति कहती हैं, "पहली लहर में लोगों ने अपनी पूरी जमापूंजी सिर्फ घर पहुँचने के लिए फूंक दी।"

दूसरी लहर जब आई, तो वह और भी घातक थी। ज्योति ने इस दौरान श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों की खाक छानी ताकि यह साबित किया जा सके कि सरकारी आंकड़े असल मौतों से बहुत कम हैं। उन्होंने लखनऊ जैसे शहरों का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे केवल अस्पतालों में मरने वालों को ही कोविड मौतों में गिना गया, जबकि उन हजारों लोगों का क्या जो अस्पताल पहुँचने से पहले ही दम तोड़ गए?

"हम आज भी तैयार नहीं हैं"

इस किताब की सबसे बड़ी चेतावनी यह है कि भारत ने अपनी गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है। ज्योति यादव का कहना है कि आज भी जब वह ग्रामीण इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) का दौरा करती हैं, तो वहां न डॉक्टर हैं और न ही पर्याप्त उपकरण।

हर्षित श्रीवास्तव जैसे युवाओं की कहानी, जिनके पिता ने अपनी मौत से पहले अपनी ऑक्सीजन लेवल ट्वीट की थी, आज भी सिस्टम की नाकामी की गवाह है। ज्योति कहती हैं, "अगर आज फिर से कोई संकट आता है, तो हम एक बार फिर उतने ही लाचार होंगे जितने 2020-21 में थे। हमने ऑक्सीजन प्लांट और डॉक्टरों की भर्ती जैसे बुनियादी कामों में भी सुस्ती दिखाई है।"

पत्रकारिता का मानवीय चेहरा

ज्योति यादव खुद हरियाणा के एक गांव से ताल्लुक रखती हैं। उनके लिए यह रिपोर्टिंग केवल एक नौकरी नहीं थी, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी थी। उन्होंने उन बच्चों से मुलाकात की जो अनाथ हो गए, उन माता-पिता से बात की जिन्होंने अपने जवान बेटों को खो दिया।

किताब का नाम 'फेथ एंड फ्यूरी' (Faith and Fury) रखने के पीछे भी एक गहरा कारण है। ज्योति कहती हैं, "सड़कों पर गुस्सा (Fury) था। नौकरी जाने का गुस्सा, सम्मान खोने का गुस्सा। लेकिन साथ ही एक विश्वास (Faith) भी था।जिंदा रहने का विश्वास और एक-दूसरे की मदद करने का जज्बा। इसी उम्मीद ने मुझे और उन मजदूरों को सड़क पर टिके रहने की ताकत दी।"

विस्मृति के खिलाफ एक स्टैंड

भारत में अक्सर बड़ी त्रासदियों को भुलाने की प्रवृत्ति रही है। ज्योति की यह किताब 'सामूहिक विस्मृति' (Collective Amnesia) के खिलाफ एक कड़ा विरोध है। वह कहती हैं कि हम अपनी निजी कहानियों को याद रखेंगे, लेकिन उस नंगे पांव चलने वाले मजदूर को भूल जाएंगे जिसने इस देश को बनाया है। कोविड की लाखों वर्जन (Versions) हैं, और हर वर्जन को याद रखना जरूरी है ताकि भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न हो।

'फेथ एंड फ्यूरी' हमें याद दिलाती है कि नीतियां बनाते समय मानवीय संवेदनाओं और देश के सबसे गरीब नागरिक का ध्यान रखना कितना जरूरी है। महज 4-5 घंटों के नोटिस पर करोड़ों लोगों का जीवन अधर में लटका देना एक ऐसा फैसला था, जिसकी जांच होनी चाहिए। यह किताब उन सभी के लिए है जो यह समझना चाहते हैं कि संकट के समय एक राष्ट्र के रूप में हम कहां खड़े थे और हमें कहां होना चाहिए था।

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