
सपा की मुस्लिम कोटा वाली गुगली पर कांग्रेस हुई क्लीन बोल्ड? फंस गया INDIA गठबंधन?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले महिला आरक्षण में मुस्लिम सब-कोटा की मांग ने 'INDIA' गठबंधन के भीतर नई हलचल पैदा कर दी है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा उठाई गई इस मांग को भाजपा ने 'असंवैधानिक' करार दिया है।
जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, राज्य की राजनीति एक बार फिर उन मुद्दों की ओर मुड़ रही है जो गठबंधन की गांठों को ढीला कर सकते हैं। महिला आरक्षण विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) पर चर्चा के दौरान समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव ने लोकसभा में 'मुस्लिम महिलाओं के लिए सब-कोटा' की मांग उठाकर एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। यह मांग कांग्रेस के लिए एक ऐसी पहेली बन गई है, जिसे सुलझाना उसके लिए किसी 'अग्निपरीक्षा' से कम नहीं है।
अखिलेश का दांव और भाजपा का पलटवार
पिछले सप्ताह लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पर चर्चा के दौरान अखिलेश यादव और उनके भाई धर्मेंद्र यादव ने पिछड़ों (OBC) के भीतर कोटा की मांग के साथ-साथ विशेष रूप से मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण का मुद्दा उठाया। सपा का तर्क है कि जब तक सबसे पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं को प्रतिनिधित्व नहीं मिलता, तब तक आरक्षण का वास्तविक लाभ उन तक नहीं पहुंचेगा।
हालांकि, भाजपा ने इस मांग को तुरंत 'असंवैधानिक' बताकर खारिज कर दिया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सदन में ही अखिलेश यादव को टोकते हुए कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण का संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। इसके बाद, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी मोर्चा संभालते हुए कहा कि सपा संविधान की दुहाई तो देती है, लेकिन बाबा साहब अंबेडकर की दृष्टि के खिलाफ काम करती है।
कांग्रेस के लिए 'दोधारी तलवार'
कांग्रेस के लिए यह स्थिति सबसे अधिक जटिल है। एक समय था जब कांग्रेस खुद ओबीसी कोटा के भीतर कोटा का विरोध करती थी, लेकिन 2023 के बाद से राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी 'जितनी आबादी, उतना हक' के नारे के साथ सबसे मुखर पैरोकार बनकर उभरी है। लेकिन जब बात 'मुस्लिम सब-कोटा' की आती है, तो कांग्रेस के कदम ठिठक जाते हैं।
शनिवार को वायनाड की सांसद प्रियंका गांधी से जब सीधा सवाल पूछा गया कि क्या कांग्रेस सपा की इस मांग का समर्थन करती है, तो उनकी असहजता साफ दिखी। उन्होंने सवाल का सीधा जवाब देने के बजाय केवल इतना कहा कि आरक्षण ओबीसी की आबादी के अनुपात में होना चाहिए। प्रियंका की यह 'रणनीतिक चुप्पी' दिखाती है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर भाजपा को कोई ऐसा मौका नहीं देना चाहती जिससे उसे 'मुस्लिम तुष्टीकरण' के कटघरे में खड़ा किया जा सके।
यूपी की चुनावी गणित और अखिलेश की मजबूरी
कांग्रेस के मुस्लिम नेता दबी जुबान में स्वीकार करते हैं कि अखिलेश यादव की यह मांग पूरी तरह राजनीतिक है। यूपी में एक साल के भीतर चुनाव होने वाले हैं। राज्य में लगभग 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। अखिलेश को डर है कि यह वोट बैंक सपा, बसपा, कांग्रेस और ओवैसी की AIMIM के बीच न बंट जाए। ओवैसी पहले से ही यूपी में अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में अखिलेश खुद को मुसलमानों के सबसे बड़े रहनुमा के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।
लेकिन कांग्रेस के लिए समस्या यह है कि वह एक राष्ट्रीय पार्टी है। एक पूर्व मुस्लिम सांसद के अनुसार, "अगर हम अखिलेश की मांग का समर्थन करते हैं, तो भाजपा इसे पूरे देश में मुद्दा बनाएगी। वे कहेंगे कि हम एससी/एसटी का हक छीनकर अल्पसंख्यकों को दे रहे हैं। इसका नुकसान हमें केवल यूपी में ही नहीं, बल्कि उन राज्यों में भी होगा जहां सपा का कोई अस्तित्व नहीं है।"
'संविधान बचाओ' बनाम 'मुस्लिम कोटा'
राहुल गांधी पिछले कई वर्षों से 'संविधान बचाओ' अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं। कांग्रेस के भीतर एक धड़ा मानता है कि ऐसी मांग का समर्थन करना जो संविधान (अनुच्छेद 15 और 16) के सीधे खिलाफ हो, उनके अभियान की विश्वसनीयता को खत्म कर सकता है। अमित शाह ने संसद में यही तर्क दिया था कि धर्म के आधार पर भेदभाव संविधान में वर्जित है।
कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने स्पष्ट रूप से कहा, "आप एक तरफ संविधान बचाने की बात नहीं कर सकते और दूसरी तरफ ऐसी मांग नहीं उठा सकते जो संविधान सम्मत न हो। यह हमारे लिए एक 'सेल्फ गोल' (आत्मघाती गोल) जैसा होगा।"
सिकुड़ता 'सेकुलर' स्पेस और भाजपा का दबाव
पिछले 12 वर्षों में भाजपा ने भारतीय राजनीति का व्याकरण बदल दिया है। कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की छवि को भाजपा ने सफलतापूर्वक 'तुष्टीकरण' के पर्यायवाची के रूप में प्रचारित किया है। यही कारण है कि कांग्रेस अब उन मुद्दों पर चुप रहना पसंद करती है जो विशेष रूप से मुसलमानों से जुड़े हैं। चाहे वह मॉब लिंचिंग का मुद्दा हो या पूजा स्थलों को निशाना बनाने का, कांग्रेस नेतृत्व अब केवल 'औपचारिक विरोध' तक सीमित रहता है।
कांग्रेस कार्य समिति (CWC) के एक सदस्य और पूर्व मुख्यमंत्री के अनुसार, "सपा या राजद जैसी क्षेत्रीय पार्टियां सामाजिक न्याय और जातिगत गौरव के साथ धर्मनिरपेक्षता को जोड़ सकती हैं क्योंकि उनका दायरा सीमित है। लेकिन कांग्रेस के पास कोई एक जातिगत वोट बैंक (जैसे यादव या जाटव) नहीं है। हम धर्मनिरपेक्षता पर निर्भर हैं, और भाजपा ने इस हथियार को ही हमारे खिलाफ मोड़ दिया है।"
आगे की राह कठिन है
यूपी में कांग्रेस आज भी संगठन और नेतृत्व के मामले में सपा के भरोसे है। 2024 के लोकसभा चुनावों में मुस्लिम समुदाय ने भाजपा को हराने के लिए 'INDIA' गठबंधन का साथ दिया था, लेकिन विधानसभा चुनावों में समीकरण अलग होंगे। यदि कांग्रेस अखिलेश की मांग से पूरी तरह दूरी बनाती है, तो उसे मुस्लिम वोट छिटकने का डर है। और यदि वह समर्थन करती है, तो वह भाजपा की 'ध्रुवीकरण की पिच' पर खेलने को मजबूर हो जाएगी।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी इस 'दोधारी तलवार' से कैसे निपटते हैं। क्या वे अखिलेश को शांत कर पाएंगे या फिर यूपी चुनाव से पहले 'INDIA' गठबंधन के भीतर दरार और गहरी होगी? एक बात साफ है—मुस्लिम सब-कोटा का मुद्दा केवल महिलाओं के आरक्षण का नहीं, बल्कि 2027 के सत्ता संघर्ष का लिटमस टेस्ट बन गया है।

