
आयकर विभाग ने नेताओं पर कसी नकेल, अब चुनाव के बाद उम्मीदवारों के हलफनामों की होगी जांच
अब तक हमारे देश में व्यवस्था यह थी कि चुनाव आयोग हलफनामे तो लेता था, लेकिन उनकी सच्चाई जांचने की कोई ऑटोमेटिक मशीनरी नहीं थी। जब कोई विपक्षी नेता या कोई एक्टिविस्ट कोर्ट जाता था, तब जाकर जांच शुरू होती थी।
कहते हैं राजनीति में जो दिखता है, वो होता नहीं, और जो होता है वो दिखता नहीं। लेकिन अब आयकर विभाग ने नेताओं की इस 'दिखावे' वाली सियासत पर नकेल कसने का मन बना लिया है। भारत की चुनावी राजनीति में एक नया युग शुरू होने जा रहा है, जहाँ उम्मीदवार चुनाव जीतकर चैन की नींद नहीं सो पाएंगे, क्योंकि नतीजों के बाद आयकर विभाग उनकी संपत्ति का 'कच्चा-चिट्ठा' खोलने के लिए तैयार खड़ा होगा।
एक याचिका, जिसने हिला दी पूरी व्यवस्था
इस कहानी की शुरुआत होती है तमिलनाडु के सियासी गलियारों से। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के बेटे और उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन के हलफनामे में एक जागरूक मतदाता ने कुछ ऐसी कमियां ढूंढ निकालीं, जिसने पूरे देश के लिए नजीर पेश कर दी। चपॉक-तिरुवल्लिकेनी के मतदाता आर. कुमारवेल ने मद्रास हाईकोर्ट में अर्जी लगाई कि साल 2021 और 2026 के बीच उदयनिधि की संपत्ति के आंकड़े आपस में मेल नहीं खा रहे। 'रेड जाइंट मूवीज' में करोड़ों का निवेश कभी दिखता है, तो कभी गायब हो जाता है।
इस एक मामले ने मद्रास हाईकोर्ट को इतना सख्त कर दिया कि आयकर विभाग को कोर्ट में आकर अपनी सफाई देनी पड़ी। इसी गहमागहमी के बीच विभाग ने वह 'ब्रह्मास्त्र' पेश किया जिसे अब SOP (Standard Operating Procedure) कहा जा रहा है।
क्या है यह नया SOP? (सिस्टम का नया अवतार)
अब तक हमारे देश में व्यवस्था यह थी कि चुनाव आयोग हलफनामे तो लेता था, लेकिन उनकी सच्चाई जांचने की कोई ऑटोमेटिक मशीनरी नहीं थी। जब कोई विपक्षी नेता या कोई एक्टिविस्ट कोर्ट जाता था, तब जाकर जांच शुरू होती थी। लेकिन अब आयकर विभाग किसी की शिकायत का इंतज़ार नहीं करेगा। चुनाव खत्म होते ही विभाग खुद-ब-खुद (Proactively) सक्रिय हो जाएगा।
150 दिनों की 'डेडलाइन': विभाग ने खुद को 150 दिनों का वक्त दिया है। यानी परिणाम आने के 5 महीने के भीतर उम्मीदवार की संपत्ति का पूरा वेरिफिकेशन पूरा करना होगा।
क्रॉस-वेरिफिकेशन का जाल: उम्मीदवार के हलफनामे को केवल ITR (Income Tax Return) से ही नहीं, बल्कि उनकी कंपनियों की ROC फाइलिंग, बैंक ट्रांजेक्शन और बेनामी संपत्ति के डेटाबेस से भी मिलाया जाएगा।
चुनाव के बाद ही क्यों?: यह विभाग की समझदारी है। चुनाव के दौरान जांच करने से अक्सर 'राजनीतिक प्रतिशोध' (Political Vendetta) के आरोप लगते हैं। इसलिए विभाग ने तय किया है कि खेल खत्म होने के बाद, हिसाब शुरू होगा ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कोई बाधा न आए।
उदयनिधि स्टालिन केस: वो विसंगतियां जो रडार पर आईं
उदयनिधि के मामले ने दिखाया कि कैसे कॉर्पोरेट निवेश और पारिवारिक संपत्तियों के जरिए डेटा को धुंधला किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने साफ़ कहा कि आयकर विभाग को यह देखना होगा कि अगर 2021 में एक निवेश था, तो 2026 में वह कहाँ गया? क्या वह बेचा गया? क्या उस पर टैक्स दिया गया? इन्हीं पेचीदगियों को सुलझाने के लिए अब राष्ट्रीय स्तर पर SOP लागू की गई है।
भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता जयराम वेंकटेशन कहते हैं, "यह लोकतंत्र के लिए 'ऑक्सीजन' जैसा है। अब तक नेता सोचते थे कि एक बार हलफनामा जमा हो गया और नामांकन मंजूर हो गया, तो गंगा नहा लिए। लेकिन अब उन्हें पता होगा कि आयकर विभाग की तीसरी आंख उन पर हर वक्त टिकी है।"
आयकर विभाग का यह कदम केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक संदेश है कि "चुनावी शपथ पत्र अब सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि एक कानूनी प्रतिबद्धता है।" अगर नेता अपनी आय और संपत्ति को लेकर ईमानदार नहीं हो सकते, तो वे जनता के प्रति ईमानदार कैसे होंगे? यह नया नियम आने वाले 2027 के चुनावों और उसके बाद की राजनीति को पूरी तरह पारदर्शी बनाने की क्षमता रखता है।

