जनादेश से विश्वासघात या सियासी रणनीति? टीएमसी बागियों के विलय पर घमासान
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जनादेश से विश्वासघात या सियासी रणनीति? टीएमसी बागियों के विलय पर घमासान

टीएमसी के 20 बागी सांसदों के एनसीपीआई में विलय से राजनीतिक विवाद गहरा गया है। कांग्रेस ने इसे जनादेश और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ विश्वासघात बताया।


पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी सांसदों के नेशनल सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। कांग्रेस नेता और अर्थशास्त्री प्रसेनजीत बोस ने इस कदम को लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ "पूरी तरह निंदनीय और अवसरवादी छेड़छाड़" करार देते हुए मांग की है कि पार्टी छोड़ने वाले सभी सांसद पहले अपने पदों से इस्तीफा दें और उसके बाद किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल हों।

इस मुद्दे पर आयोजित एक विशेष चर्चा में प्रसेनजीत बोस, फ्रंटलाइन की एसोसिएट एडिटर टी.के. राजलक्ष्मी और द फेडरल के वरिष्ठ पत्रकार समीर के. पुरकायस्थ ने इस विलय के कानूनी, राजनीतिक और नैतिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की।

एनसीपीआई अचानक कैसे चर्चा में आया?

एनसीपीआई हाल तक त्रिपुरा आधारित एक पंजीकृत लेकिन लगभग अज्ञात राजनीतिक दल था। यह अचानक राष्ट्रीय चर्चा में तब आया जब टीएमसी के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने सीधे भाजपा में शामिल होने के बजाय इस पार्टी में विलय का रास्ता चुना।समीर पुरकायस्थ के अनुसार, एनसीपीआई ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों पर चुनाव लड़ा था। पार्टी का पंजीकरण पश्चिम बंगाल के हावड़ा में है, लेकिन उसका कोई बड़ा राजनीतिक आधार नहीं है।

दिलचस्प बात यह है कि इस विलय ने एनसीपीआई के भीतर भी विवाद पैदा कर दिया। पार्टी के संस्थापक महासचिव शांतनु डे ने दावा किया कि उनसे इस फैसले पर कोई चर्चा नहीं की गई थी और यदि उनसे राय ली जाती तो वे इसका विरोध करते। वहीं पार्टी अध्यक्ष शिउली कुंडू ने इस विलय का स्वागत करते हुए कहा कि डे अब संगठन का हिस्सा नहीं हैं।

भाजपा में सीधे शामिल क्यों नहीं हुए बागी सांसद?

पुरकायस्थ का कहना है कि बागी सांसदों का सीधे भाजपा में शामिल होना भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदायक हो सकता था। इनमें से कई सांसदों पर भ्रष्टाचार, हिंसा और अन्य मामलों के आरोप हैं। 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमलों को लेकर भी कई नेताओं पर सवाल उठे थे।

उनके अनुसार, मौजूदा रणनीति तीन स्तरों पर काम कर रही है। राज्यसभा के सदस्य इस्तीफा देकर सीधे भाजपा में जा सकते हैं, लोकसभा सांसद फिलहाल एनसीपीआई में रहेंगे, जबकि विधानसभा स्तर पर बागी नेता खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताने की कोशिश कर रहे हैं।

"दिल्ली में लिखी गई पूरी पटकथा"

प्रसेनजीत बोस ने पूरे घटनाक्रम को एक सुनियोजित राजनीतिक अभियान बताया। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के बाद पार्टी के भीतर जवाबदेही की मांग उठी थी, लेकिन ममता बनर्जी ने हार के कारणों पर आत्ममंथन करने के बजाय ईवीएम और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए।

बोस के अनुसार, इसके बाद टीएमसी के दो-तिहाई से अधिक विधायक अलग हो गए और विधानसभा में अलग समूह बनाकर विपक्ष का नया नेता चुन लिया।उन्होंने दावा किया कि यह पूरी रणनीति दिल्ली में तैयार की गई थी। उनके मुताबिक, बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नए नेता ने विभाजन से पहले दिल्ली में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से मुलाकात की थी।बोस ने कहा, "पूरी पटकथा दिल्ली में लिखी गई और उसका मंचन पश्चिम बंगाल विधानसभा में हुआ।"

"एनसीपीआई कोई पार्टी नहीं, एक पार्किंग स्थल है"

बोस ने एनसीपीआई को एक "पार्किंग लॉट" बताया। उनका कहना है कि यह बागी नेताओं के लिए एक अस्थायी मंच है, जहां वे फिलहाल ठहरकर अंततः एनडीए के साथ खड़े हो सकते हैं।उन्होंने कहा कि बागी सांसदों ने एक लगभग निष्क्रिय पार्टी को अपने राजनीतिक ठिकाने में बदल दिया है, ताकि वे संसद में एनडीए का समर्थन कर सकें और विपक्ष उन्हें दलबदल कानून के तहत तुरंत चुनौती न दे सके।

टी.के. राजलक्ष्मी ने भी इस आकलन से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि बागी सांसद काकोली दस्तिदार सार्वजनिक रूप से एनडीए के साथ काम करने की इच्छा जता चुकी हैं, जिससे उनकी राजनीतिक दिशा स्पष्ट हो जाती है।हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा के लिए इन नेताओं को अपने संगठन में समाहित करना आसान नहीं होगा, क्योंकि भाजपा ने वर्षों तक टीएमसी के खिलाफ भ्रष्टाचार और हिंसा के मुद्दों पर अभियान चलाया है।

नैतिकता और जनादेश पर सवाल

बोस ने सबसे कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि बागी सांसदों ने जनता द्वारा दिए गए जनादेश के साथ विश्वासघात किया है।उन्होंने कहा कि इनमें से कई सांसद फिल्म, खेल और अन्य क्षेत्रों से आए हुए चेहरे हैं, जिन्होंने राजनीति को जनसेवा के बजाय करियर विकल्प के रूप में देखा।

बोस ने कहा, "जब तक चुनावी नतीजे नहीं आए थे, तब तक उन्हें तृणमूल कांग्रेस एक मजबूत ब्रांड लग रही थी। अब जब वह ब्रांड कमजोर पड़ गया है, तो वे नए राजनीतिक ठिकाने की तलाश कर रहे हैं।"उन्होंने पूर्व टीएमसी सांसद सुखेंदु शेखर रॉय का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने पार्टी से दूरी बनाने का फैसला किया तो संसद सदस्यता से भी इस्तीफा दिया था। यही लोकतांत्रिक और नैतिक तरीका है।

राजलक्ष्मी ने इस पूरे घटनाक्रम को स्पष्ट राजनीतिक अनैतिकता बताया। उन्होंने कहा कि बागी सांसद ममता बनर्जी के नाम और चुनाव चिन्ह पर जीतकर संसद पहुंचे, लेकिन अब उसी नेतृत्व से दूरी बना रहे हैं।

सुधार की मांग तेज

बोस और राजलक्ष्मी दोनों ने दलबदल विरोधी कानून में व्यापक सुधार की मांग की है।बोस ने कहा कि भारत में "राइट टू रिकॉल" यानी मतदाताओं को अपने निर्वाचित प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार दिया जाना चाहिए। यदि कोई सांसद उस पार्टी को छोड़ देता है जिसके टिकट पर वह चुना गया था, तो मतदाताओं को उसके खिलाफ कार्रवाई का अधिकार मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा, "यह जनता के जनादेश के साथ खुला विश्वासघात है। ऐसे सभी सांसदों को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए।"कांग्रेस ने भी आधिकारिक रूप से सभी बागी सांसदों से इस्तीफा देने की मांग की है।

कानूनी चुनौती की संभावना

समीर पुरकायस्थ ने बताया कि कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि टीएमसी अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है और एनसीपीआई में हुए इस विलय को चुनौती दे सकती है।उनके अनुसार, कानूनी जटिलताओं के कारण ही बागी सांसदों ने अलग संसदीय समूह बनाने या मूल टीएमसी नाम और चुनाव चिन्ह पर दावा करने की अपनी प्रारंभिक योजना छोड़ दी।

विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला सिर्फ राजनीतिक दल-बदल का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, जनादेश और दलबदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता की भी बड़ी परीक्षा बन सकता है।

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