
मिशन कोलंबो: क्या उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन श्रीलंका पर बनाएंगे प्रांतीय चुनावों का दबाव?
भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन 19 अप्रैल 2026 को श्रीलंका की दो दिवसीय यात्रा पर जा रहे हैं। इस यात्रा के दौरान वह राष्ट्रपति अनुरा दिसानायके और अन्य शीर्ष नेताओं से मुलाकात करेंगे।
भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन रविवार, 19 अप्रैल 2026 को जब श्रीलंका की धरती पर कदम रखेंगे, तो उनके स्वागत के साथ-साथ मांगों और उम्मीदों का एक लंबा पुलिंदा भी तैयार मिलेगा। पिछले साल सितंबर में पदभार संभालने के बाद उपराष्ट्रपति की यह महत्वपूर्ण पड़ोसी देश की यात्रा कई मायनों में ऐतिहासिक होने वाली है।
इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू श्रीलंका के तमिल राजनीतिक नेतृत्व के साथ उनकी मुलाकात है। श्रीलंकाई तमिल नेता इस मौके का इस्तेमाल नई दिल्ली से यह अपील करने के लिए करेंगे कि वह कोलंबो सरकार पर 1987 के भारत-श्रीलंका समझौते को पूरी तरह लागू करने और लंबे समय से लंबित प्रांतीय परिषद चुनाव कराने के लिए दबाव डाले।
1987 का समझौता और अधूरी स्वायत्तता
श्रीलंका की मुख्य तमिल राजनीतिक पार्टी, 'इलंकाइ तमिल अरासु कच्ची' (ITAK) के वरिष्ठ नेता एम.ए. सुमंथिंरन का कहना है कि सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन दोनों देशों को 1987 में हस्ताक्षरित समझौते का सम्मान करना चाहिए। इस समझौते का एक बड़ा हिस्सा तमिल समुदाय को सीमित स्वायत्तता प्रदान करने से जुड़ा था।
सुमंथिंरन ने एक साक्षात्कार में निराशा व्यक्त करते हुए कहा, "चार दशक बीत जाने के बावजूद समझौता पूरी तरह लागू नहीं हुआ है। प्रांतीय परिषदें कार्यात्मक नहीं हैं और चुनाव लगातार टाले जा रहे हैं। पहले कदम के रूप में, ये चुनाव तुरंत कराए जाने चाहिए।" सुमंथिंरन श्रीलंका के जाने-माने वकील भी हैं और उनका मानना है कि उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन, जो खुद तमिलनाडु की राजनीति से निकले हैं, उनकी आकांक्षाओं को बेहतर समझ पाएंगे।
भारतीय मूल के तमिलों की अलग मांगें
एक तरफ जहाँ उत्तर और पूर्व के श्रीलंकाई तमिल राजनीतिक स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ लगभग 15 लाख की आबादी वाले भारतीय मूल के तमिलों (जो चाय बागानों में काम करते हैं) की अपनी अलग समस्याएं हैं। इन लोगों के पूर्वज अंग्रेजों के समय में बंधुआ मजदूर के रूप में भारत से श्रीलंका आए थे।
तमिल प्रोग्रेसिव अलायंस (TPA) के उपाध्यक्ष भरत अरुलसामी के अनुसार, वे उपराष्ट्रपति से अनुरोध करेंगे कि इस समुदाय के पात्र लोगों को 'ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया' (OCI) का दर्जा दिया जाए, जैसा कि मॉरीशस में भारतीय प्रवासियों को दिया गया है। इसके अलावा, वे भारत सरकार से विशेष सहायता की मांग करेंगे, जिसमें शिक्षकों का प्रशिक्षण, व्यावसायिक प्रशिक्षण और शिक्षित युवाओं के लिए इंटर्नशिप जैसे कार्यक्रम शामिल हैं।
वर्तमान में, भारत सरकार चाय बागान समुदाय के छात्रों के लिए छात्रवृत्ति प्रदान करती है, लेकिन नेताओं का मानना है कि इस समुदाय की गरीबी को देखते हुए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
रणनीतिक वार्ता और विकास परियोजनाएं
उपराष्ट्रपति की यह दो दिवसीय यात्रा केवल तमिल मुद्दों तक सीमित नहीं है। श्रीलंकाई सरकार के निमंत्रण पर जा रहे राधाकृष्णन राष्ट्रपति अनुरा दिसानायके, प्रधानमंत्री हरिनी अमरसूर्या और विपक्ष के नेता सजित प्रेमदासा से भी मुलाकात करेंगे।
श्रीलंका के विदेश मंत्री विजीता हेराथ के अनुसार, भारतीय नेता स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और सामुदायिक विकास के क्षेत्रों में भारत समर्थित परियोजनाओं का व्यापक मूल्यांकन करेंगे। उम्मीद है कि इस यात्रा के दौरान द्विपक्षीय संबंधों को विस्तार देने के लिए कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए जाएंगे।
हालांकि मीडिया में चर्चा थी कि उपराष्ट्रपति उत्तर और पूर्वी प्रांतों का दौरा करेंगे, लेकिन आधिकारिक सूचना के अनुसार वे कोलंबो में ही रुकेंगे। कोलंबो खुद हजारों तमिलों का घर है और यहीं पर विभिन्न तमिल दलों के नेता उनसे मुलाकात करेंगे।
क्या तमिलनाडु चुनाव का है असर?
राजनीतिक गलियारों में एक चर्चा यह भी है कि उपराष्ट्रपति की इस यात्रा को 23 अप्रैल को तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर मंजूरी दी गई है। तमिलनाडु में श्रीलंकाई तमिलों के प्रति सहानुभूति हमेशा से एक बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है।
तमिल भाषी राधाकृष्णन को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के प्रतिनिधि के रूप में भेजना एक सोची-समझी कूटनीति मानी जा रही है। श्रीलंकाई तमिल नेताओं को लगता है कि वे अपनी चिंताओं को प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय नेतृत्व तक पहुंचाने के लिए सबसे सही व्यक्ति हैं।
नई सरकार और तमिलों की चिंता
मार्क्सवादी विचारधारा वाले राष्ट्रपति अनुरा दिसानायके की सरकार (JVP) को लेकर तमिल नेता थोड़े आशंकित हैं। डेमोक्रेटिक तमिल नेशनल अलायंस (DTNA) के सांसद सिद्धार्थन का कहना है कि नई सरकार भी तमिल मुद्दों को लेकर पिछली सरकारों की तरह ही उदासीन दिख रही है।
उन्होंने याद दिलाया कि दिसानायके की पार्टी JVP, 1987 के समझौते की सबसे कट्टर आलोचक रही है। सिद्धार्थन ने कहा, "तमिल लोग महसूस कर रहे हैं कि JVP कभी भी तमिल समुदाय को कोई सार्थक रियायत नहीं देगी। तमिल प्रश्न पर वे सबसे चरमपंथी रुख रखते हैं।"
स्वायत्तता पर कोई समझौता नहीं
ITAK नेता सुमंथिंरन, जो वर्तमान राष्ट्रपति के पुराने मित्र भी रहे हैं, ने स्पष्ट कर दिया है कि तमिल क्षेत्रों में स्वशासन की मांग में कोई बदलाव नहीं आया है। उन्होंने कहा, "स्वायत्तता के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता।"
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन के सामने चुनौती यह होगी कि वे श्रीलंका के साथ भारत के सामरिक और आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के साथ-साथ वहां के तमिल अल्पसंख्यकों की भावनाओं और अधिकारों के बीच एक कूटनीतिक संतुलन कैसे बिठाते हैं।

