
मिन आंग ह्लाइंग के भारत दौरे के क्या हैं मायने हैं, क्या बदलेगी नई दिल्ली की म्यांमार रणनीति?
भारत के पास म्यांमार की सेना, वहां के बागी गुटों और लोकतंत्र समर्थक नेताओं तीनों के साथ अच्छे संबंध रहे हैं। भारत चाहता तो म्यांमार में शांति स्थापना के लिए एक बड़ी मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता था।
पड़ोसी देश म्यांमार पिछले पांच सालों से एक भीषण और खूनी गृहयुद्ध की आग में जल रहा है। इसी महा-संकट के बीच, म्यांमार के सैन्य शासक और वर्तमान राष्ट्रपति जनरल मिन आंग ह्लाइंग भारत के आधिकारिक दौरे पर आए। उन्होंने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और भरोसा दिया कि म्यांमार की धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा।
कागज पर सुनने में यह बात बहुत अच्छी लगती है, लेकिन क्या जमीनी हकीकत भी यही है? मशहूर रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार सुबीर भौमिक का मानना है कि म्यांमार को लेकर भारत की नीति 'रणनीतिक निष्क्रियता' यानी "Strategic Inaction" का शिकार है। आइए 'द फेडरल' के इस विशेष विश्लेषण के जरिए समझते हैं कि आखिर म्यांमार का पूरा सच क्या है और भारत कहाँ बड़ी चूक कर रहा है।
1. चुनावी ढोंग और सिर्फ 35% हिस्से पर सेना का राज
सबसे पहला सवाल यह उठता है कि म्यांमार के भीतर लोकतंत्र समर्थकों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचनाओं के बावजूद भारत ने मिन आंग ह्लाइंग को नई दिल्ली क्यों बुलाया?
सुबीर भौमिक बताते हैं कि मिन आंग ह्लाइंग एक ऐसी चुनावी प्रक्रिया के जरिए राष्ट्रपति बने हैं जो खुद भारी विवादों में है। ठीक वैसे ही जैसे बांग्लादेश में अवामी लीग के अलावा मुख्य विपक्षी दलों को मौका नहीं मिला, म्यांमार में भी आंग सान सू की की पार्टी 'नेशनल लीग फॉर Democracy' (NLD) को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया और सू की आज भी जेल में हैं।
"अंतरराष्ट्रीय क्राइसिस ग्रुप (ICG) समेत कई वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्ट कहती है कि 5 साल के गृहयुद्ध के बाद म्यांमार की सेना और वहां की केंद्र सरकार का देश के केवल 35 प्रतिशत हिस्से पर ही नियंत्रण रह गया है।"
— सुबीर भौमिक, वरिष्ठ पत्रकार
अब सवाल यह है कि जब म्यांमार के राष्ट्रपति कहते हैं कि वे भारत विरोधी तत्वों को अपनी जमीन इस्तेमाल नहीं करने देंगे, तो क्या वह जमीन वाकई उनके नियंत्रण में है? जवाब है—बिल्कुल नहीं।
भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा है। इस सीमा का एक बहुत बड़ा हिस्सा 'काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी' (KIA), 'अराकान आर्मी', 'चिन नेशनल फ्रंट' और 'पीपुल्स डिफेंस फोर्सेस' (PDF) जैसे ताकतवर विद्रोही समूहों के कब्जे में है। म्यांमार की सेना का नियंत्रण केवल मोरे (Moreh) के सामने तामू (Tamu) के एक बेहद छोटे से इलाके पर है। इसलिए म्यांमार सरकार का यह वादा जमीनी तौर पर खोखला साबित होता है।
2. सीमा पर गोलाबारी और चीन का 'डबल गेम'
दिलचस्प बात यह है कि जब मिन आंग ह्लाइंग नई दिल्ली में थे, तभी भारत-म्यांमार सीमा पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच गोलीबारी की खबरें आईं। म्यांमार की सेना ने दावा किया कि वे भारतीय सैनिकों पर नहीं, बल्कि उन बागी लड़ाकों पर गोलियां चला रहे थे जो भारतीय सीमा की तरफ भाग रहे थे। म्यांमार का भारत को सीधा संदेश था—अगर आप चाहते हैं कि हम आपकी जमीन सुरक्षित रखें, तो आपको भी हमारे विरोधियों को अपने यहां शरण देने से रोकना होगा।
लेकिन सुबीर भौमिक का कहना है कि भारत को इस मामले में चीन की रणनीति से सीखने की जरूरत है। चीन म्यांमार की सैन्य सरकार यानी 'जुंटा' (Junta) को हथियारों की सप्लाई भी करता है और साथ ही साथ म्यांमार सीमा पर सक्रिय सभी बड़े बागी और विद्रोही समूहों के साथ सीधे संपर्क और मजबूत रिश्ते भी रखता है।
2021 के तख्तापलट (Coup) के बाद म्यांमार के जनरल को अपनी सत्ता बचाने के लिए चीन के हथियारों की जरूरत थी। लेकिन आज उन्हें जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है, वह है 'वैधानिकता' (Legitimacy)। चीन उन्हें बंदूकें देता है, और भारत उन्हें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंच से राजनीतिक सम्मान देता है। लेकिन भारत को यह समझना होगा कि बिना बागियों से बात किए सीमा सुरक्षित नहीं हो सकती।
3. मणिपुर संकट और म्यांमार का गहरा कनेक्शन
क्या मणिपुर में चल रही हिंसा भारत को म्यांमार की सैन्य सरकार के करीब जाने के लिए मजबूर कर रही है? निश्चित रूप से, भारत के पास वहां की मौजूदा सरकार से बात करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत ने हमेशा दोनों पक्षों को साधा है। इंदिरा गांधी के समय भारत ने जनरल ने विन (General Ne Win) की मेजबानी की थी क्योंकि उत्तर पूर्व के कई विद्रोही गुट म्यांमार के जंगलों में शरण लेते थे। हालांकि, राजीव गांधी के समय 1988 के जनआंदोलन के दौरान भारत ने म्यांमार के लोकतंत्र आंदोलन का खुलकर समर्थन किया था। उस दौर में भारत की खुफिया एजेंसी 'रॉ' (RAW) के वरिष्ठ अधिकारी बी.बी. नंदी ने 'काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी' (KIA) के साथ एक गुप्त समझौता किया था कि वे भारत विरोधी उग्रवादियों को अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं करने देंगे। उस एक रणनीतिक कदम ने उग्रवाद को काफी हद तक काबू कर लिया था।
आज की बात करें, तो मणिपुर का घाटी आधारित उग्रवादी संगठन पीएलए (PLA) आज भी म्यांमार के भीतर अपने बेस चला रहा है। दूसरी तरफ, मणिपुर के कुकी उग्रवादी समूहों के तार म्यांमार के 'चिन' (Chin) विद्रोहियों से जुड़े हुए हैं। यह समस्या इसलिए भी जटिल है क्योंकि म्यांमार के 'चिन', मिजोरम के 'मिजो' और मणिपुर के 'कुकी'—ये सभी एक ही 'जोमी' (Zomi) नस्लीय परिवार का हिस्सा हैं। इनके बीच गहरा भावनात्मक और सामाजिक रिश्ता है। यही वजह है कि जब भारत सरकार ने फ्री मूवमेंट रिजीम (FMR) को खत्म करने और सीमा पर बाड़ (Fencing) लगाने की बात की, तो स्थानीय समुदायों ने इसका कड़ा विरोध किया।
4. चीन की व्यावहारिकता (Pragmatism) से भारत क्या सीखे?
सुबीर भौमिक के अनुसार, चीन की म्यांमार नीति पूरी तरह से व्यावहारिक और व्यावसायिक लाभ पर आधारित है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण म्यांमार के काचिन राज्य में मिलने वाले 'रेयर अर्थ एलिमेंट्स' (Rare Earth Deposits) यानी दुर्लभ खनिज हैं, जो चीन की आधुनिक इंडस्ट्री के लिए बेहद जरूरी हैं।
जब काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी (KIA) ने उन खदानों वाले इलाकों पर कब्जा कर लिया और चीनी कंपनियों का काम रुक गया, तो चीन ने तुरंत अपनी रणनीति बदली। उन्होंने म्यांमार सरकार की परवाह किए बिना सीधे बागी समूह से बातचीत की और अपने व्यापारिक हितों को सुरक्षित कर लिया। चीन के लिए विचारधारा मायने नहीं रखती, उसके लिए उसके राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर हैं। भारत को भी अपनी पुरानी कूटनीतिक झिझक छोड़कर इसी तरह की व्यावहारिक नीति अपनानी होगी।
5. कालादान और त्रिपक्षीय हाईवे प्रोजेक्ट्स का क्या होगा?
भारत के दो बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स—कालादान मल्टी-मोडल प्रोजेक्ट और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय हाईवे का भविष्य क्या है? सरकार अक्सर दावा करती है कि ये प्रोजेक्ट जल्द शुरू होंगे, लेकिन सुबीर भौमिक इस पर गहरा संदेह जताते हैं।
कालादान प्रोजेक्ट की हकीकत: इस प्रोजेक्ट को चालू करने के लिए भारत को तीन अलग-अलग ताकतों से डील करनी होगी। म्यांमार का 'सिटवे पोर्ट' सेना के कब्जे में है। लेकिन जैसे ही आप नदी के रास्ते पलेतवा (Paletwa) की तरफ बढ़ेंगे, वह पूरा इलाका 'अराकान आर्मी' के नियंत्रण में है। इसके बाद जब सड़क मार्ग मिजोरम के जोरिनपुई की तरफ बढ़ता है, तो वह चिन विद्रोही समूहों के कब्जे में है।
त्रिपक्षीय हाईवे की चुनौती: यह हाईवे जिन जंगलों और पहाड़ी रास्तों से गुजरता है, वहां सुरक्षा के साथ-साथ सड़क निर्माण और रखरखाव की भारी व्यावहारिक चुनौतियाँ हैं।
शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से बांग्लादेश अब भारत के लिए पहले जैसा सहज ट्रांजिट पार्टनर नहीं रहा। बांग्लादेश सीमा पर बढ़ते तनाव के बीच पूर्वोत्तर को जोड़ने के लिए कालादान प्रोजेक्ट भारत के लिए बेहद रणनीतिक हो चुका है। लेकिन बिना शांति समझौते और विद्रोही समूहों की सहमति के इस प्रोजेक्ट का पूरा होना नामुमकिन के बराबर है।
'वेट एंड वॉच' या रणनीतिक कमजोरी?
सुबीर भौमिक का मानना है कि म्यांमार का यह गृहयुद्ध आने वाले कई सालों तक ऐसे ही चलता रहेगा। विद्रोही समूह मजबूत जरूर हुए हैं, लेकिन वे म्यांमार की सेना को पूरी तरह उखाड़ फेंकने की स्थिति में नहीं हैं। इस बीच चीन दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कराकर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है।
भारत के पास म्यांमार की सेना, वहां के बागी गुटों और लोकतंत्र समर्थक नेताओं—तीनों के साथ अच्छे संबंध रहे हैं। भारत चाहता तो म्यांमार में शांति स्थापना के लिए एक बड़े मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता था। लेकिन नई दिल्ली ने खुद को किनारे रखना पसंद किया, जिसे सुबीर भौमिक "Strategic Inaction" कहते हैं। अगर भारत वैश्विक और क्षेत्रीय महाशक्ति बनने का दावा करता है, तो उसे म्यांमार जैसे जलते हुए पड़ोसी देश को मूकदर्शक बनकर देखने की आदत छोड़नी होगी।

