यूज़रनेम से चैट, बिना नंबर पहचान! कितना सुरक्षित है WhatsApp का नया फीचर?
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यूज़रनेम से चैट, बिना नंबर पहचान! कितना सुरक्षित है WhatsApp का नया फीचर?

WhatsApp का नया यूज़रनेम फीचर मोबाइल नंबर छिपाने की सुविधा देगा, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे फर्जी पहचान, ऑनलाइन ठगी और डेटा प्रोफाइलिंग का खतरा भी बढ़ सकता है।


क्या व्हाट्सऐप का नया यूज़रनेम फीचर, जो लोगों को अपना मोबाइल नंबर साझा किए बिना ऐप इस्तेमाल करने की सुविधा देगा, वास्तव में उनकी निजता की रक्षा करेगा या फिर यह डिजिटल पहचान की चोरी और ऑनलाइन धोखाधड़ी करने वालों के लिए एक नया हथियार साबित होगा?इसी विषय पर 'एआई विद संकेत' के इस एपिसोड में चर्चा हुई।

द फेडरल ने इस मुद्दे पर साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ जितेंद्र जैन, इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के संस्थापक निदेशक और वकील अपर गुप्ता, तथा एथेनियन टेक के सीईओ कनिष्क गौर से बातचीत की। विशेषज्ञों ने बताया कि मोबाइल नंबर से अलग पहचान (डिकपलिंग) देने वाला यह फीचर सार्वजनिक सुरक्षा और निजता दोनों पर किस तरह असर डाल सकता है।जहां कंपनी इसे निजता की सुरक्षा के तौर पर पेश कर रही है, वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि यह डिजिटल ठगों के लिए आम लोगों को निशाना बनाने का नया रास्ता भी खोल सकता है।



मोबाइल नंबर से अलग होगी पहचान

यह फीचर व्हाट्सऐप पर लोगों के बातचीत करने के तरीके में बड़ा बदलाव लाएगा। अब उपयोगकर्ता मोबाइल नंबर की जगह अल्फ़ान्यूमेरिक (अक्षर और अंकों से बने) यूज़रनेम का इस्तेमाल कर सकेंगे।अपर गुप्ता के अनुसार, इस व्यवस्था से लोग अपना मोबाइल नंबर बताए बिना संवाद कर सकेंगे। यह पहचान छिपाने का एक बुनियादी सुरक्षा कवच जरूर देगा, लेकिन इसकी सुरक्षा सीमित होगी।

उन्होंने कहा कि यह प्रणाली मेटा समूह की कंपनियों द्वारा उपयोगकर्ताओं की प्रोफाइलिंग को नहीं रोकती। उल्टा, यह लोगों को अपने इंस्टाग्राम अकाउंट को जोड़ने के लिए प्रेरित करती है। इससे अलग-अलग सोशल मीडिया प्रोफाइल एक ही कॉरपोरेट डेटाबेस में जुड़ जाती हैं।गुप्ता का कहना है कि आज व्हाट्सऐप इतना व्यापक हो चुका है कि आम नागरिकों के लिए इसे छोड़ना लगभग असंभव है।परिवार, कारोबार और जरूरी सेवाएं—सभी वन टाइम पासवर्ड (OTP), बैंकिंग अलर्ट और लेनदेन संबंधी संदेशों के लिए इस प्लेटफॉर्म पर निर्भर हैं।इसी वजह से किसी भी तकनीकी बदलाव पर कड़ी नियामकीय निगरानी जरूरी हो जाती है।

मैसेजिंग ऐप से डेटा कारोबार तक का सफर

विशेषज्ञों का मानना है कि व्हाट्सऐप अब केवल मैसेजिंग ऐप नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे एक ऐसे व्यावसायिक प्लेटफॉर्म में बदल चुका है, जहां उपयोगकर्ताओं के डेटा का आर्थिक इस्तेमाल किया जा रहा है।जब मेटा ने व्हाट्सऐप का अधिग्रहण किया था, तब कंपनी ने भरोसा दिलाया था कि उपयोगकर्ताओं का डेटा पूरी तरह सुरक्षित और गोपनीय रहेगा। लेकिन बाद की नीतियों में बदलाव के बाद कंपनी ने साइन-अप नाम, मोबाइल नंबर, ग्रुप की जानकारी और अन्य मेटाडेटा को अपनी अन्य सेवाओं के साथ साझा करना शुरू कर दिया।

यह मेटाडेटा, आउटबाउंड लिंक और सर्वर बैकअप के साथ मिलकर उपयोगकर्ताओं की प्रोफाइल तैयार करने और व्यावसायिक विश्लेषण के लिए इस्तेमाल किया जाता है।विशेषज्ञों का कहना है कि नया यूज़रनेम फीचर इस डेटा संग्रह और व्यावसायिक इस्तेमाल की प्रक्रिया को और तेज करेगा।

बढ़ सकता है फर्जी पहचान का खतरा

विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता नाम की नकल (नेम स्क्वाटिंग) और फर्जी पहचान (इम्पर्सनेशन) को लेकर है।जितेंद्र जैन ने कहा कि टेलीग्राम और सिग्नल जैसे प्लेटफॉर्म पहले से यूज़रनेम सुविधा देते हैं, लेकिन उनकी पहुंच व्हाट्सऐप जितनी व्यापक नहीं है।व्हाट्सऐप पर कोई भी व्यक्ति किसी मंत्री, अधिकारी, अभिनेता या किसी बड़ी कंपनी से मिलता-जुलता यूज़रनेम बनाकर लोगों को आसानी से धोखा दे सकता है।इससे ऑनलाइन ठगी, फर्जी निवेश योजनाएं और वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में बढ़ोतरी हो सकती है।सबसे ज्यादा खतरा बुजुर्गों और तकनीक की कम जानकारी रखने वाले लोगों को होगा, जो पहले से ही डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराधों का शिकार बन रहे हैं।

पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले

विशेषज्ञों ने कहा कि फर्जी विज्ञापनों और नकली प्रमोशन को रोकने में मेटा का रिकॉर्ड बहुत मजबूत नहीं रहा है।ठग अक्सर किसी मशहूर व्यक्ति के नाम में एक-दो अक्षर बदलकर या अंडरस्कोर जोड़कर नकली अकाउंट बना लेते हैं और लोगों को गुमराह करते हैं।उद्यमी अंकुर वारिकू जैसे कई चर्चित लोगों के नाम पर पहले भी ऐसे फर्जी अकाउंट बन चुके हैं।जितेंद्र जैन का कहना है कि प्लेटफॉर्म के लिए यह एक व्यावसायिक मॉडल भी बन सकता है।पहले पहचान संबंधी समस्याएं बढ़ने दी जाएं और बाद में उनकी रोकथाम के लिए ब्लू टिक, प्रीमियम वेरिफिकेशन और उन्नत स्पैम फ़िल्टर जैसी सेवाएं पैसे लेकर उपलब्ध कराई जाएं।

भारत के कानून अभी पर्याप्त नहीं

विशेषज्ञों के मुताबिक भारत का मौजूदा कानूनी ढांचा इतनी तेजी से बदलती डिजिटल तकनीकों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है।पुराने कानूनों के तहत वेबसाइट या अकाउंट ब्लॉक कर देना केवल अस्थायी समाधान है।इससे डिजिटल प्लेटफॉर्म की मूल संरचनात्मक समस्याएं खत्म नहीं होतीं।उन्होंने कहा कि भारत के पास अभी यूरोपीय संघ के डिजिटल मार्केट्स एक्ट (DMA) और डिजिटल सर्विसेज एक्ट (DSA) जैसे व्यापक कानून नहीं हैं।जब तक स्वतंत्र और शक्तिशाली नियामक संस्थाएं नहीं बनेंगी, तब तक बड़ी तकनीकी कंपनियां ऐसे जोखिम भरे बदलाव लागू करती रहेंगी।

स्थायी समाधान क्या हो सकता है?

कनिष्क गौर का मानना है कि फर्जी पहचान की समस्या का समाधान केवल यूज़रनेम बदलने से नहीं होगा।इसके लिए मजबूत डिजिटल सत्यापन व्यवस्था जरूरी है।उन्होंने कहा कि दुनिया के कई उन्नत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ताओं की पहचान पासपोर्ट और लाइव फेस बायोमेट्रिक से सत्यापित की जाती है।सिर्फ यूज़रनेम आरक्षित करने से लोगों का भरोसा नहीं जीता जा सकता।ऐसी कमजोर व्यवस्था पहले भी कई हाई-प्रोफाइल ठगी के मामलों में नाकाम साबित हुई है।

व्हाट्सऐप पर धोखा ज्यादा असरदार क्यों?

विशेषज्ञों का कहना है कि व्हाट्सऐप पर आने वाले संदेश सामान्य एसएमएस की तुलना में कहीं अधिक प्रभाव डालते हैं।लोग अपने व्हाट्सऐप इनबॉक्स को निजी बातचीत का माध्यम मानते हैं।यही कारण है कि वे अनजान संदेशों को भी ज्यादा भरोसे के साथ खोल लेते हैं।इससे साइबर अपराधियों के लिए लोगों को फंसाना आसान हो जाता है।जितेंद्र जैन ने सुझाव दिया कि व्हाट्सऐप को ऐसा फीचर देना चाहिए, जिससे हर यूज़रनेम के साथ जुड़े मोबाइल नंबर का देश दिखाई दे।इससे लोगों को तुरंत पता चल जाएगा कि कोई कथित बैंक, कंपनी या ग्राहक सेवा खाता वास्तव में भारत से संचालित हो रहा है या किसी दूसरे देश से।

निजता और सुरक्षा साथ-साथ जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव है, जब डिजिटल अधिकार समूह, तकनीकी विशेषज्ञ और सरकार मिलकर ठोस नीतियां तैयार करें।आज का माहौल इतना ध्रुवीकृत हो चुका है कि मिलकर नीति बनाना कठिन होता जा रहा है।लेकिन यदि मजबूत नियम और पारदर्शी तकनीकी व्यवस्था नहीं बनाई गई, तो बिना सत्यापित डिजिटल पहचान प्रणाली आने वाले समय में नागरिकों के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। विशेषज्ञों का निष्कर्ष स्पष्ट है—निजता और सार्वजनिक सुरक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। मजबूत कानून, प्रभावी नियमन और सुरक्षित तकनीकी ढांचा ही दोनों के बीच सही संतुलन स्थापित कर सकता है।

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