भारी मतदान के बीच किसे बढ़त? तमिलनाडु और बंगाल चुनाव का सबसे सटीक विश्लेषण
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भारी मतदान के बीच किसे बढ़त? तमिलनाडु और बंगाल चुनाव का सबसे सटीक विश्लेषण

23 अप्रैल को तमिलनाडु की सभी 234 सीटों और पश्चिम बंगाल की 152 सीटों पर पहले चरण का मतदान संपन्न हुआ। तमिलनाडु में 82% से अधिक और पश्चिम बंगाल में लगभग 90% मतदान दर्ज किया गया।


"दोनों पक्ष इस तरह लड़ रहे हैं जैसे उनकी पीठ दीवार से सटी हो... जैसे इस चुनाव के बाद कोई भविष्य ही न बचा हो।" वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी की यह टिप्पणी पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चल रहे चुनावी महासंग्राम की तीव्रता को सटीक रूप से बयां करती है। 23 अप्रैल को तमिलनाडु की सभी 234 सीटों और पश्चिम बंगाल की 152 सीटों पर पहले चरण का मतदान संपन्न हुआ। भारी मतदान और छिटपुट हिंसा के बीच, राजनीतिक विश्लेषकों ने इस चुनाव के उन पहलुओं पर प्रकाश डाला है जो मीडिया की हेडलाइंस से परे हैं।

रिकॉर्ड मतदान: आंकड़ों की गवाही

शाम 5 बजे तक के आंकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु में 82% से अधिक और पश्चिम बंगाल में लगभग 90% मतदान दर्ज किया गया। शिखा मुखर्जी के अनुसार, बंगाल में राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को सुबह जल्दी घर से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया था। इसका कारण गर्मी और मतदाता सूची (SIR) में गड़बड़ी की आशंकाएं भी थीं। जब जनता को लगता है कि उनका नाम हटाया जा सकता है या वोटिंग में बाधा आ सकती है, तो वे अधिक संख्या में बाहर निकलते हैं।

तमिलनाडु: विजय का 'एक्स-फैक्टर' और युवाओं की पसंद

राजनीतिक विश्लेषक आर. कन्नन ने तमिलनाडु के चुनाव को "अत्यधिक ऊर्जावान" और "अप्रत्यक्ष" करार दिया है। यहाँ सबसे बड़ा बदलाव अभिनेता विजय की पार्टी TVK की एंट्री है। कन्नन का मानना है कि विजय की लोकप्रियता ने अभूतपूर्व भीड़ जुटाई है।

विशेष रूप से 18 से 30 वर्ष के युवा मतदाताओं में विजय का क्रेज सबसे अधिक है। आंकड़ों के अनुसार, इस आयु वर्ग का हर दूसरा व्यक्ति विजय के पक्ष में मतदान कर सकता है। हालांकि, सवाल यह है कि क्या यह भीड़ सीटों में बदल पाएगी? विजय का प्रभाव जटिल है; वे डीएमके (DMK) के अल्पसंख्यक और दलित वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं, तो दूसरी तरफ एआईएडीएमके (AIADMK) के पारंपरिक समर्थकों को भी अपनी ओर खींच रहे हैं। यह 2006 में विजयकांत के प्रभाव जैसा है, जहाँ वोटों के बंटवारे ने कई सीटों पर चौंकाने वाले परिणाम दिए थे।

गठबंधन की मजबूरियां: AIADMK और BJP का मेल

आर. कन्नन ने AIADMK और भाजपा के गठबंधन पर तीखी टिप्पणी करते हुए इसे "गले का पत्थर" बताया। उन्होंने कहा कि यह गठबंधन केवल डीएमके के मजबूत गठबंधन का मुकाबला करने के लिए की गई एक 'मजबूरी की शादी' है। इस गठबंधन के कारण अल्पसंख्यक मतदाता AIADMK से दूर होकर विजय या DMK की ओर जा सकते हैं। तमिलनाडु में इस बार राष्ट्रीय मुद्दों (जैसे परिसीमन) से अधिक स्थानीय सुशासन और उम्मीदवार की छवि हावी रही है।

पश्चिम बंगाल: 2021 से भी अधिक आक्रामक जंग

शिखा मुखर्जी ने बंगाल के चुनावी माहौल पर कहा कि हमने सोचा था कि 2021 और 2024 में तीव्रता अपने चरम पर थी, लेकिन 2026 ने उन सभी रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। बंगाल में सभी प्रमुख दल—TMC, BJP, और वाम-कांग्रेस गठबंधन—आक्रामक तरीके से लड़ रहे हैं।

बंगाल के छिपे हुए कारक (Hidden Factors):

वाम-कांग्रेस का पुनरुद्धार: कुछ क्षेत्रों में वामपंथ और कांग्रेस का गठबंधन फिर से मजबूती पकड़ता दिख रहा है, जो टीएमसी और भाजपा दोनों के लिए सिरदर्द बन सकता है।

छोटे दलों का उभार: 'इंडियन सेकुलर फ्रंट' (ISF) जैसे दल कुछ सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। एक या दो सीटों का अंतर भी यहाँ सत्ता की चाबी बदल सकता है।

पहचान और पलायन: आर्थिक मुद्दों के बजाय नागरिकता और घुसपैठ जैसे पहचान से जुड़े मुद्दों ने इस बार भी चुनाव को अनिश्चित बना दिया है।

वोटर लिस्ट से नाम हटने का विवाद (SIR Concerns)

बंगाल में मतदाता सूची से लाखों लोगों के नाम गायब होने की खबर ने लोकतांत्रिक गरिमा पर सवाल खड़े किए हैं। शिखा मुखर्जी ने इसे "चौंकाने वाला" बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों को चुनावी प्रक्रिया से बाहर कैसे रखा जा सकता है? हालांकि, इसके बावजूद मतदान केंद्रों पर भारी भीड़ यह दर्शाती है कि जनता अपने अधिकार के लिए सजग है।

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