हम AAP के हैं कौन? आंदोलन का विश्वास गया, अब राघव भी रूठे, केजरीवाल के कुनबे में क्यों मची भगदड़?
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हम 'AAP' के हैं कौन? आंदोलन का 'विश्वास' गया, अब 'राघव' भी रूठे, केजरीवाल के कुनबे में क्यों मची भगदड़?

आम आदमी पार्टी में एक बार फिर बड़ी टूट हुई है। राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने 6 अन्य सांसदों के साथ पार्टी से इस्तीफा दे दिया है और भाजपा में शामिल होने का फैसला किया है। कैसे 2012 में 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन से निकली यह पार्टी लगातार अपने संस्थापक सदस्यों और बड़े चेहरों को खोती रही है।


आम आदमी पार्टी (AAP), जिसने भारतीय राजनीति में 'वैकल्पिक राजनीति' के वादे के साथ कदम रखा था, आज अपने सबसे बड़े संगठनात्मक संकट से गुजर रही है। कभी अरविंद केजरीवाल के 'दाहिने हाथ' माने जाने वाले राघव चड्ढा ने 6 अन्य राज्यसभा सांसदों के साथ पार्टी को अलविदा कह दिया है। चड्ढा का भाजपा में शामिल होना केवल एक राजनीतिक दल-बदल नहीं है, बल्कि यह उस पैटर्न की निरंतरता है जो 2012 में पार्टी के जन्म के साथ ही शुरू हो गई थी।

एक आंदोलन, दो रास्ते और अंतहीन दरारें

आम आदमी पार्टी की अस्थिरता की जड़ें इसके गठन के समय 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' (IAC) आंदोलन में ही छिपी थीं। जब अन्ना हजारे और किरण बेदी ने चुनावी राजनीति में उतरने का विरोध किया, तभी यह साफ़ हो गया था कि इस आंदोलन के भीतर दो अलग-अलग विचारधाराएं काम कर रही हैं। एक समूह आंदोलन को जारी रखना चाहता था, जबकि केजरीवाल के नेतृत्व वाला दूसरा समूह चुनावी राजनीति के जरिए व्यवस्था बदलना चाहता था।

यह शुरुआती मनमुटाव खत्म नहीं हुआ, बल्कि समय-समय पर नेतृत्व, निर्णय लेने की प्रक्रिया और संगठन के ढांचे को लेकर उभरता रहा। जब आप (AAP) एक विरोध प्रदर्शन वाले आंदोलन से दिल्ली की सत्ताधारी पार्टी बनी, तो उसे बहुत तेज़ी से चुनावी अनुशासन अपनाना पड़ा। इसी प्रक्रिया में प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जैसे संस्थापक सदस्यों की विदाई हुई, जो पार्टी की वैचारिक बुनियाद की पहली बड़ी दरार थी।

क्यों साथ छोड़ रहे हैं केजरीवाल के सिपहसालार?

राघव चड्ढा, कुमार विश्वास, आशुतोष, अलका लांबा, योगेंद्र यादव सूची लंबी है। इन तमाम नेताओं के जाने के पीछे कुछ सामान्य कारण रहे हैं-

केंद्रीकृत नेतृत्व (Centralised Decision Making): जैसे-जैसे AAP का चुनावी विस्तार हुआ, पार्टी का ढांचा पूरी तरह से अरविंद केजरीवाल के इर्द-गिर्द सिमट गया। रणनीतिक और संगठनात्मक फैसले एक संकीर्ण घेरे में लिए जाने लगे, जिससे आंतरिक असहमति के लिए जगह खत्म हो गई।

मूवमेंट बनाम कमांड: जो नेता कभी सहमति-आधारित आंदोलन का हिस्सा थे, उन्हें अचानक 'कमांड-आधारित' राजनीतिक मशीनरी में काम करना पड़ा। कई नेताओं ने आरोप लगाया कि पार्टी के भीतर अब लोकतंत्र नहीं बचा है।

टिकट वितरण और महत्वाकांक्षा: जैसे ही AAP दिल्ली से बाहर पंजाब और अन्य राज्यों में फैली, टिकट वितरण और पद आवंटन कलह का मुख्य केंद्र बन गए। राघव चड्ढा का मामला भी कुछ ऐसा ही बताया जा रहा है, जहाँ संसदीय नेतृत्व से हटाए जाने के बाद उनके और आलाकमान के बीच दूरियां बढ़ गईं।

राघव चड्ढा का जाना क्यों है सबसे अलग?

अब तक AAP ने कई इस्तीफे देखे हैं, लेकिन चड्ढा का जाना सबसे बड़ा संसदीय झटका है। पहली बार एक साथ 7 राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़ी है। यह न केवल राज्यसभा में AAP की संख्या कम करता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि पार्टी का 'कोर' अब असुरक्षित महसूस कर रहा है। चड्ढा ने 'वैचारिक विचलन' का हवाला देते हुए भाजपा का दामन थामने का फैसला किया है, जो पार्टी की नैतिक साख पर गहरी चोट है।

लचीलापन बनाम कमजोरी

इसमें कोई दो राय नहीं कि इतने सालों में कई दिग्गजों के जाने के बावजूद AAP चुनावी रूप से टिकी रही है। पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में अपनी पकड़ बनाए रखी है और एक 'ब्रांड' के रूप में खुद को स्थापित किया है। लेकिन, लगातार हो रहे ये इस्तीफे एक गंभीर समस्या की ओर इशारा करते हैं। पार्टी के पास केजरीवाल के अलावा नेतृत्व की कोई 'सेकंड लाइन' तैयार नहीं हो पा रही है। हर बार जब कोई कद्दावर नेता बाहर निकलता है, तो पार्टी की सांगठनिक स्थिरता पर सवाल उठते हैं।

भविष्य की चुनौती

AAP की कहानी एक विरोधाभास है। यह चुनावी मैदान में तो मजबूत है, लेकिन अंदरूनी तौर पर बेहद नाजुक। राघव चड्ढा और अन्य सांसदों का जाना कोई अचानक हुई घटना नहीं है, बल्कि यह उस संरचनात्मक दोष का हिस्सा है जो पार्टी की स्थापना के समय से मौजूद है। आने वाले समय में AAP के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह अपनी 'आंदोलन वाली पहचान' और 'चुनावी पार्टी की जरूरतों' के बीच संतुलन कैसे बनाती है।

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