
वीजा से लेकर चीन तक, किन मुद्दों पर बिगड़ रहे भारत-बांग्लादेश संबंध?
भारत और बांग्लादेश के बीच तनाव के कई बिंदु हैं। लेकिन जानकारों का कहना है कि दोनों देशों को बातचीत के रास्ते को खोलकर रखना चाहिए।
भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में पिछले कुछ समय से लगातार तनाव देखने को मिल रहा है। सीमा पर लोगों को वापस भेजने (पुशबैक), वीजा प्रतिबंध, चीन के साथ बांग्लादेश की बढ़ती नजदीकी और गंगा जल संधि के नवीनीकरण जैसे मुद्दों ने दोनों देशों के संबंधों को मुश्किल दौर में पहुंचा दिया है। हालांकि वरिष्ठ पत्रकार और बांग्लादेश मामलों के जानकार सुबीर भौमिक का मानना है कि भारत और बांग्लादेश दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है और घरेलू राजनीति की वजह से रिश्तों को खराब नहीं होने देना चाहिए।
चीन का दौरा पहले, भारत बाद में क्यों?
सुबीर भौमिक का कहना है कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान का भारत से पहले चीन जाना दोनों देशों के बीच बनी दूरी का संकेत माना जा सकता है। हालांकि वे इसे सिर्फ भारत विरोधी कदम नहीं मानते।उनके मुताबिक, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रहमान को भारत आने का न्योता दिया था। पहले चर्चा थी कि रहमान सबसे पहले भूटान जाएंगे और उसके बाद भारत आएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने पहले मलेशिया का दौरा किया और फिर सीधे चीन चले गए।
भौमिक कहते हैं कि इसे ज्यादा बड़ा मुद्दा नहीं बनाना चाहिए क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी भारत के साथ अच्छे रिश्ते रखते हुए चीन से मजबूत संबंध बनाए थे।
बांग्लादेश के लिए चीन क्यों अहम है?
भौमिक के अनुसार, बांग्लादेश चीन को सबसे बड़ा विकास साझेदार मानता है। अमेरिका विकास परियोजनाओं में ज्यादा मदद नहीं देता और भारत की अपनी आर्थिक जरूरतें हैं। ऐसे में जब बांग्लादेश को बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए पैसा चाहिए होता है तो उसकी पहली पसंद चीन बन जाता है।उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पद्मा ब्रिज भारत के पैसे से नहीं बना। जब विश्व बैंक ने फंड देने से इनकार कर दिया तो चीनी कंपनियों ने निर्माण में अहम भूमिका निभाई और बाकी पैसा बांग्लादेश ने खुद जुटाया।
हालांकि उनका कहना है कि अब फर्क यह है कि तारिक रहमान सिर्फ आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि चीन के साथ रक्षा सहयोग भी बढ़ाना चाहते हैं। चर्चा है कि बांग्लादेश चीन के J-10 लड़ाकू विमान खरीदने पर भी विचार कर रहा है। इससे भारत की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।
भारत रिश्ते सामान्य करने में पीछे क्यों दिख रहा है?
सुबीर भौमिक का कहना है कि भारत ने 1971 में सिर्फ भावनाओं की वजह से बांग्लादेश की मदद नहीं की थी, बल्कि उसके पीछे साफ रणनीतिक सोच थी। भारत चाहता था कि पूर्वी पाकिस्तान की जगह एक दोस्ताना बांग्लादेश बने, जिससे पूर्वोत्तर राज्यों में शांति बनी रहे।उनका कहना है कि आज समस्या यह है कि बांग्लादेश का मुद्दा पश्चिम बंगाल की राजनीति का हिस्सा बन गया है। चुनाव खत्म होने के बाद भी सीमा पर पुशबैक को लेकर बयानबाजी जारी है।
उन्होंने बताया कि भारत सरकार ने कहा था कि करीब 2,390 बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जाएगा। लेकिन कुछ राजनीतिक नेताओं ने यह संख्या 4,800 और बाद में 10,000 तक बता दी। जबकि सीमा सुरक्षा बल (BSF) और बांग्लादेश के गृह मंत्रालय के आंकड़े करीब 2,300 के आसपास हैं।उनके मुताबिक, इसी वजह से सीमा पर तनाव बढ़ा और कई लोग नो-मैन्स लैंड में घंटों तक फंसे रहे। दोनों देशों की सीमा सुरक्षा एजेंसियां उन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं थीं।
वीजा सेवाएं अब तक पूरी तरह सामान्य क्यों नहीं हुईं?
भौमिक का कहना है कि मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल के दौरान भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में काफी तनाव आ गया था। उस समय भारत विरोधी प्रदर्शन हुए और भारतीय दूतावासों को भी निशाना बनाया गया। सुरक्षा कारणों से भारत ने अपने कई अधिकारियों को वापस बुला लिया, जिससे वीजा जारी करने की प्रक्रिया धीमी हो गई।
बाद में तारिक रहमान की सरकार बनने पर हालात सुधरने की उम्मीद जगी। भारत ने पहली बार करियर डिप्लोमैट की जगह वरिष्ठ नेता दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में राजदूत बनाया। लेकिन उनके एक दोस्ताना बयान को भी कुछ कट्टरपंथी संगठनों ने 'अखंड भारत' से जोड़कर विवाद खड़ा कर दिया।
दोनों देशों में बढ़ रही कट्टर सोच
सुबीर भौमिक का कहना है कि भारत में बांग्लादेश विरोधी बयानबाजी बढ़ी है, वहीं बांग्लादेश में भी कुछ कट्टरपंथी संगठन भारत विरोधी माहौल बना रहे हैं।उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले चिंता का विषय हैं, लेकिन साथ ही वहां 87 सूफी दरगाहों को भी कट्टरपंथियों ने नुकसान पहुंचाया है। यानी समस्या सिर्फ एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि कट्टर सोच पूरे समाज को प्रभावित कर रही है।
शेख हसीना की वापसी पर क्या सोचती है नई सरकार?
भौमिक का मानना है कि तारिक रहमान की सरकार ने यह स्वीकार कर लिया है कि शेख हसीना के भारत से खास रिश्ते रहे हैं और वह फिलहाल दिल्ली में हैं।नई सरकार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारत की जमीन का इस्तेमाल बांग्लादेश के खिलाफ राजनीतिक गतिविधियों के लिए न हो। वहीं भारत चाहता है कि बांग्लादेश अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए न होने दे।भारत को यह भी चिंता है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य संबंध भविष्य में सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं।
गंगा जल संधि पर क्या होगा?
भौमिक का मानना है कि गंगा जल संधि दोनों देशों के लिए बेहद अहम है।भारत को पूर्वोत्तर राज्यों में शांति और बेहतर संपर्क के लिए बांग्लादेश की जरूरत है। वहीं बांग्लादेश को पानी, बिजली और व्यापार के लिए भारत की जरूरत है।उन्होंने कहा कि कुछ लोग बांग्लादेश में कहते हैं कि उन्हें भारत की जरूरत नहीं क्योंकि उनके पास चीन और अमेरिका हैं। लेकिन पानी चीन नहीं दे सकता और बिजली भी भारत से ही आती है। बिजली आपूर्ति रुकने पर बांग्लादेश के उद्योगों पर सीधा असर पड़ता है।
सुबीर भौमिक का साफ कहना है कि भारत और बांग्लादेश दोनों एक-दूसरे के बिना अपने हितों की रक्षा नहीं कर सकते। उनका मानना है कि विदेश नीति नारों, ताकत दिखाने या राजनीतिक बयानबाजी से नहीं चलती। दोनों देशों को बातचीत के जरिए अपने मतभेद दूर करने होंगे। अगर भारत और बांग्लादेश क्षेत्र में शांति, विकास और स्थिरता चाहते हैं, तो उन्हें फिर से संवाद और भरोसे की राह पर लौटना होगा।

