
परिसीमन विवाद के बीच नायडू बने सरकार के सहारा, बताया क्यों नहीं चिंता की जरूरत
महिला आरक्षण पर सहमति के बीच परिसीमन को लेकर विवाद गहरा गया है। इस मुद्दे पर दक्षिण भारत के कुछ दल समर्थन में तो कुछ विरोध में हैं।
महिला आरक्षण को लेकर आज से संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र शुरू हो रहा है, जिसमें ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ में संशोधन का प्रस्ताव पेश किया जाएगा। केंद्र सरकार का उद्देश्य इस कानून को 2029 के आम चुनावों से पहले लागू करना है। हालांकि, महिला आरक्षण को लेकर किसी भी राजनीतिक दल ने सीधा विरोध नहीं जताया है, लेकिन परिसीमन के मुद्दे ने सियासी बहस को तेज कर दिया है। दक्षिण भारत के कई दलों ने इस पर गंभीर सवाल उठाए हैं, वहीं कांग्रेस ने भी इसी आधार पर सरकार की मंशा पर संदेह जताया है।
इस बीच सरकार को दक्षिण भारत से ही समर्थन भी मिला है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने केंद्र सरकार का समर्थन करते हुए कहा कि प्रस्तावित फॉर्मूला सभी राज्यों के हित में है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकसभा और विधानसभा सीटों को बढ़ाने का निर्णय संतुलन बनाए रखने के लिए है और इसे जनसंख्या के अनुपात से जोड़ना जरूरी नहीं है। उनका मानना है कि यदि परिसीमन को जनगणना से जोड़ा गया, तो दक्षिण भारतीय राज्यों को नुकसान हो सकता है, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।
नायडू ने कहा कि सीटों की संख्या बढ़ने से किसी भी राज्य का प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा और केंद्र की योजना इस दिशा में संतुलित है। उन्होंने विपक्ष के उस तर्क को भी खारिज किया, जिसमें मौजूदा जनगणना के आधार पर परिसीमन की मांग की जा रही है। उनके अनुसार, परिसीमन को जनगणना से जोड़ना आवश्यक नहीं है और ऐसा करने से क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ सकता है।
वहीं दूसरी ओर, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए इसे ‘काला कानून’ बताया है। उनकी पार्टी डीएमके राज्यभर में विरोध प्रदर्शन कर रही है। स्टालिन का आरोप है कि यह कानून तमिल लोगों को उनकी ही भूमि पर कमजोर कर सकता है और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है।
इसी तरह ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि भले ही ओडिशा की सीटों की संख्या बढ़े, लेकिन अन्य राज्यों की तुलना में उसका अनुपात कम हो सकता है, जिससे राज्य की राजनीतिक हिस्सेदारी घटने का खतरा है। महिला आरक्षण को लेकर राजनीतिक सहमति के बावजूद परिसीमन का मुद्दा इस पूरे विधायी प्रयास में सबसे बड़ा विवाद बनकर उभरा है, जिस पर आने वाले दिनों में संसद में तीखी बहस होने की संभावना है।

