महिला आरक्षण के बहाने परिसीमन! केंद्र सरकार के विधेयकों से सियासी हलचल
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संविधान (131वां संशोधन) विधेयक लोकसभा की सदस्य संख्या को वर्तमान संवैधानिक सीमा 550 सदस्यों (वर्तमान में 543 सांसदों की संख्या के मुकाबले) से बढ़ाकर 850 सदस्य (815 राज्यों से और 35 केंद्र शासित प्रदेशों से) करने का प्रस्ताव करता है।

महिला आरक्षण के बहाने परिसीमन! केंद्र सरकार के विधेयकों से सियासी हलचल

केंद्र सरकार के नए बिलों से महिला आरक्षण के साथ परिसीमन का रास्ता साफ हो सकता है। लेकिन विपक्ष इसे चुनावी संतुलन बदलने की रणनीति बता रहा है।


केंद्र सरकार ने मंगलवार (14 अप्रैल) को तीन अलग-अलग विधेयकों का मसौदा जारी किया। यदि ये विधेयक 16 अप्रैल से शुरू हो रहे संसद के तीन दिवसीय विस्तारित बजट सत्र में पारित हो जाते हैं, तो देशभर में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों के नए सिरे से परिसीमन (Delimitation) के बाद महिला आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया तेज हो जाएगी।

इन विधेयकों ने विपक्ष को झटका दिया है, जो पिछले कुछ हफ्तों से इस बात को लेकर नाराज था कि केंद्र सरकार महिला आरक्षण लागू करने के बहाने चुपचाप परिसीमन लागू करना चाहती है। अब जब इन विधेयकों का पूरा पाठ सार्वजनिक हो गया है, तो विपक्ष की आशंकाएं सच होती नजर आ रही हैं।

कौन-कौन से हैं ये विधेयक?

प्रस्तावित तीन विधेयक हैं। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, परिसीमन विधेयक2026, केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026

इन विधेयकों से न केवल दक्षिणी और छोटे राज्यों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व कम हो सकता है, बल्कि इससे चुनावी परिदृश्य भी सत्तारूढ़ दल के पक्ष में झुक सकता है। साथ ही, भविष्य में परिसीमन की प्रक्रिया पर कार्यपालिका (Executive) का नियंत्रण भी बढ़ सकता है।

लोकसभा सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव

संविधान (131वां संशोधन) विधेयक के तहत लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है (जिसमें 815 सदस्य राज्यों से और 35 केंद्र शासित प्रदेशों से होंगे)।इन 850 सीटों में से एक-तिहाई (लगभग 283 सीटें) महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है, जो 2023 के ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के अनुरूप है।

50 साल पुरानी रोक खत्म

इन विधेयकों के लागू होने से परिसीमन पर लगी लगभग 50 साल पुरानी संवैधानिक रोक खत्म हो जाएगी। यह रोक 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने लगाई थी, जिसे 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 2026 तक बढ़ा दिया था।

महिला आरक्षण लागू करने का नया रास्ता

2023 में संसद द्वारा महिला आरक्षण कानून पास किया गया था, लेकिन इसे तुरंत लागू नहीं किया गया। केंद्र ने इसमें यह शर्त जोड़ी थी कि पहले नई जनगणना के बाद परिसीमन होगा, तभी आरक्षण लागू होगा।हालांकि, हाल ही में केंद्र ने रुख बदलते हुए कहा कि अगर महिला आरक्षण को जनगणना 2027 से जोड़ा गया, तो यह 2029 लोकसभा चुनाव के बाद ही लागू हो पाएगा।

क्या बदलना चाहती है सरकार?

ये विधेयक केवल महिला आरक्षण लागू करने तक सीमित नहीं हैं। विपक्ष का आरोप है कि इनके जरिए चुनावी नक्शे में बड़ा बदलाव किया जा सकता है और परिसीमन की प्रक्रिया पर सरकार का नियंत्रण बढ़ाया जा सकता है।प्रस्तावित संशोधनों के अनुसार, अब “जनसंख्या” की परिभाषा संसद तय करेगी, यानी यह सरकार पर निर्भर होगा कि किस जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन किया जाए।

बड़ा बदलाव और विवाद

नए प्रस्ताव के अनुसार परिसीमन को हर जनगणना से जोड़ने की बाध्यता कमजोर की जा रही है। सरकार साधारण बहुमत से भी परिसीमन करवा सकती है। परिसीमन आयोग को सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां दी जाएंगी। आयोग के फैसलों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। यह बदलाव भविष्य में किसी भी समय परिसीमन कराने का रास्ता खोल सकता है।

दक्षिणी राज्यों की चिंता

विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि इन विधेयकों में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि दक्षिणी और छोटे राज्यों के प्रतिनिधित्व की रक्षा कैसे होगी आलोचकों का कहना है कि अगर केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें तय की गईं, तो जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई है, उनका प्रतिनिधित्व घट सकता है, जबकि हिंदी पट्टी के राज्यों को फायदा मिल सकता है।

विपक्ष का बढ़ता विरोध

विपक्ष ने इन विधेयकों पर चर्चा के लिए अधिक समय देने की मांग की है, लेकिन केंद्र ने 16 से 18 अप्रैल के बीच ही इन्हें पारित कराने का संकेत दिया है।कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे विपक्षी नेताओं के साथ बैठक कर साझा रणनीति बनाने वाले हैं। आने वाले दिनों में संसद में सरकार और विपक्ष के बीच तीखी टकराव की संभावना है।



महिला आरक्षण को जल्दी लागू करने का मुद्दा अब इन विधेयकों के व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक प्रभावों के बीच दबता नजर आ रहा है। विपक्ष इसे संघीय ढांचे के लिए खतरा बता रहा है, जबकि सरकार इसे सुधारात्मक कदम बता रही है। आने वाला संसद सत्र इस मुद्दे पर निर्णायक साबित हो सकता है।

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