
भारत में राजनीति पारंपरिक रूप से पुरुषों का अखाड़ा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी एक स्थायी और यादगार राजनीतिक विरासत छोड़ने की प्रबल इच्छा से प्रेरित हैं। महिलाओं के आरक्षण कानून को आगे बढ़ाने की योजना भी इसी विरासत निर्माण का हिस्सा मानी जा रही है।
महिलाओं के आरक्षण को लागू करना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा—यह जड़ जमाए पुरुष वर्चस्व को चुनौती देगा, लेकिन साथ ही मोदी की दीर्घकालिक राजनीतिक विरासत को भी आकार देगा।
यह पूरा मामला शुरू से ही उलझे हुए तर्कों पर आधारित रहा है। आखिर क्यों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (BJP) व सरकार के उनके रणनीतिकारों ने लोकसभा सीटों के परिसीमन (Delimitation) और विस्तार को संसद व राज्य/केंद्रशासित प्रदेशों की विधानसभाओं में एक-तिहाई महिला आरक्षण से जोड़ दिया? क्या उन्हें लगा कि एक कदम दूसरे को आसान बना देगा?
वास्तव में, इन दोनों के बीच कोई सीधा तार्किक संबंध नहीं था। लेकिन इसके पीछे एक कारण है, जिसे न तो भाजपा और उसके सहयोगी खुलकर स्वीकार कर रहे हैं और न ही विपक्ष।
पुरुषों का प्रभुत्व क्यों बरकरार?
असल वजह यह है कि मोदी-शाह यथास्थिति (status quo) को बदलना नहीं चाहते थे। उन्हें आशंका थी कि अगर एक-तिहाई महिला आरक्षण को सीधे लागू किया गया, तो पुरुष नेताओं में विद्रोह हो सकता है।
इसका मतलब होता कि मौजूदा 543 लोकसभा सीटों में से लगभग 170 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करनी पड़तीं। ऐसे में पुरुष नेताओं को अपनी सीट छोड़नी पड़ती—जो उत्तर भारत हो या दक्षिण, कहीं भी आसान नहीं था।
इसलिए एक तरीका यह निकाला गया कि सीटों के विस्तार और परिसीमन के जरिए महिलाओं के लिए नई सीटें जोड़ी जाएं, ताकि मौजूदा पुरुष सांसदों को हटाना न पड़े।
राजनीति: अब भी पुरुषों का मैदान
पुरुषों को सत्ता से हटाना सामाजिक और राजनीतिक रूप से बेहद कठिन काम है। इसलिए सीटों का विस्तार पुरुषों को “संतुष्ट” रखने का एक तरीका माना गया।
आज भी राजनीति मुख्यतः पुरुषों का क्षेत्र बनी हुई है, जहां महिलाओं के लिए जगह अक्सर औपचारिकता के तौर पर दी जाती है। जो महिलाएं राजनीति में हैं, वे या तो खुद मजबूत राजनीतिक पहचान रखती हैं, या फिर लैंगिक समानता दिखाने के लिए प्रतीकात्मक रूप से शामिल की जाती हैं।
महिलाओं को शामिल करने की यह रणनीति—बिना पुरुषों के अहं और वर्चस्व को चुनौती दिए—131वें संविधान संशोधन विधेयक के जरिए अपनाई गई, लेकिन यह पूरी तरह सफल नहीं हो पाई।
कानून लागू करने की दिशा में कदम
नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण बिल) संसद के दोनों सदनों से पारित होने के दो साल से अधिक समय बाद, सरकार ने 16 अप्रैल को इसे अधिसूचित किया, ताकि इसे तुरंत लागू किया जा सके।
निर्वाचन आयोग को 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए 170 से अधिक सीटों को महिलाओं के लिए चिन्हित करना होगा। महिलाओं के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण एक बड़ा प्रशासनिक कार्य होगा। इसके साथ ही रोटेशन (घुमाव) का मुद्दा भी रहेगा—कोई भी सीट हमेशा के लिए महिलाओं के लिए आरक्षित नहीं रह सकती।
चूंकि संसद इस कानून को पारित कर चुकी है, इसलिए इसे कभी न कभी लागू करना ही होगा। लेकिन इस प्रक्रिया में काफी विरोध और असंतोष सामने आ सकता है। जिन पुरुष नेताओं को अब उन सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिलेगा, उन्हें किसी न किसी रूप में संतुष्ट और समायोजित करना पड़ेगा।
समझौता और सामाजिक असहजता
महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण भी एक तरह का समझौता है, क्योंकि वे आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं। शुरुआत में समाज में हलचल और असहजता देखी जा सकती है, क्योंकि समानता का विचार अभी पूरी तरह लोगों की सोच में नहीं बैठा है।
यह बदलाव महिलाओं के लिए भी आसान नहीं होगा। राजनीति अपने आप में सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करती है, जो सभी दलों, क्षेत्रों और समुदायों में महसूस होंगे। इसलिए यह बदलाव एक तरह की अग्निपरीक्षा साबित हो सकता है।
अनिवार्य बाधाएं
यह लग सकता है कि पंचायतों और नगर निगमों में महिलाओं के आरक्षण की आदत अब समाज को हो चुकी है, लेकिन बड़े और अहम पद अभी भी अधिकतर पुरुषों के पास ही रहते हैं। बहुत कम मामलों में महिलाओं को शीर्ष नेतृत्व की जिम्मेदारी दी जाती है।
यह स्थिति 125 साल पुराने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भी देखने को मिली है। इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी विशेष परिस्थितियों में अध्यक्ष बनीं, हालांकि उन्होंने अपने कार्यकाल में असाधारण क्षमता का प्रदर्शन किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ऐसी ऐतिहासिक विरासत छोड़ना चाहते हैं, जो नए संसद भवन से भी आगे जाए। उनका यह लक्ष्य स्पष्ट और निर्विवाद है।
अपवाद और वास्तविकता
कुछ अपवाद जरूर हैं—जैसे जयललिता, मायावती और ममता बनर्जी—जिन्होंने क्रमशः एआईएडीएमके, बहुजन समाज पार्टी (BSP) और तृणमूल कांग्रेस (AITMC) का नेतृत्व किया।
लेकिन भारतीय जनता पार्टी (BJP) में महिलाएं आमतौर पर उपाध्यक्ष जैसे पदों तक ही सीमित रहती हैं। सुषमा स्वराज या उमा भारती जैसी वरिष्ठ नेता भी कभी पार्टी अध्यक्ष नहीं बन सकीं।
वामपंथी दल—जैसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)—भी लैंगिक संतुलन के मामले में बहुत आगे नहीं बढ़ पाए।
समाजवादी दलों में भी कई प्रतिभाशाली महिलाएं रही हैं, लेकिन वे भी अक्सर संगठन के निचले स्तर तक ही सीमित रह गईं।
आरक्षण व्यवस्था एक तरह से महिलाओं के लिए सीमाएं भी तय कर देती है। इससे यह जोखिम रहता है कि महिलाएं अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाएंगी। पार्टियों के शीर्ष नेता, जो ज्यादातर पुरुष होंगे, एक-तिहाई सीटों के लिए महिला उम्मीदवारों का चयन करेंगे। और अन्य उम्मीदवारों की तरह, ये महिलाएं भी पार्टी हाईकमान पर निर्भर रहेंगी।
लेकिन ये ऐसी बाधाएं हैं, जिन्हें एक अधिक समानतापूर्ण भविष्य के लिए पार करना जरूरी है।
मोदी की मंशा
भारत कोई असफल देश (basket case) नहीं है। राजनीति में महिलाओं की स्थिति पूरी दुनिया में लगभग समान ही है। स्कैंडिनेवियाई देश इसमें अपवाद जरूर हैं।
ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में महिला प्रधानमंत्री रही हैं, जो पार्टी के भीतर से उभरकर शीर्ष पद तक पहुंचीं।
वहीं श्रीलंका, भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में भले ही कई महिला प्रधानमंत्री रही हों, लेकिन इसे महिलाओं के सशक्तिकरण का आदर्श उदाहरण नहीं माना जा सकता।
अपने वैचारिक झुकाव के बावजूद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बड़ी और ऐतिहासिक विरासत छोड़ने की इच्छा से प्रेरित हैं, जो नए संसद भवन से भी आगे जाती है। महिलाओं के आरक्षण को लागू करने की योजना भी इसी विरासत का हिस्सा है।
मंशा चाहे जो भी हो, अंततः देश और महिलाएं इसमें मोदी की भूमिका को स्वीकार करने के लिए बाध्य होंगी।
राजनीतिक संतुलन की मजबूरी
साथ ही, मोदी को राजनीतिक मैदान में पुरुषों का भी ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि वही पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता हैं।
जैसे हिंदुत्व विचारधारा में पुरुष प्रतिबद्ध हैं, वैसे ही महिलाएं भी इस विचारधारा के प्रति समर्पित हैं। यह धारणा कि महिलाएं राजनीति में आकर “नरम और संतुलित” माहौल लाएंगी, संभवतः एक मिथक साबित हो सकती है।
मोदी दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद में महिलाओं की भागीदारी को मजबूत करना चाहते हैं, जो उनके वैचारिक दृष्टिकोण के अनुरूप एक तार्किक रणनीति है।
एकता की संभावना कम
महिला नेताओं के बीच भी वैचारिक विविधता रहेगी। यह संभावना कम है कि वे पार्टी सीमाओं से ऊपर उठकर एकजुट होंगी।
स्वाभाविक रूप से वे पार्टी, विचारधारा, क्षेत्र और यहां तक कि सामुदायिक आधार पर भी विभाजित रहेंगी।
इसलिए यह केवल “महिला बनाम पुरुष” का संघर्ष नहीं होगा, बल्कि पुराने राजनीतिक संघर्ष ही नए चेहरों के साथ जारी रहेंगे।
(द फेडरल सभी पक्षों के विचार प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और जरूरी नहीं कि वे द फेडरल के दृष्टिकोण को दर्शाते हों।)


