
महिला आरक्षण या राजनीतिक चक्रव्यूह? परिसीमन के बहाने दक्षिण भारत की ताकत कम करने की तैयारी!
परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या के आधार पर चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण और सीटों की संख्या बढ़ाना। अनुमान है कि नई संसद के बाद लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 850 के आसपास हो सकती है।
भारत की संसद में एक बार फिर महिला आरक्षण और परिसीमन (Constituencies Redrawing) को लेकर घमासान मचा हुआ है। केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण अधिनियम को क्रियान्वित करने के लिए तीन नए विधेयक पेश किए हैं, लेकिन इन विधेयकों ने महिला सशक्तीकरण की खुशी से ज्यादा 'उत्तर बनाम दक्षिण भारत' की राजनीतिक जंग को हवा दे दी है। पारदर्शिता अधिकार कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन बताया है।
महिला आरक्षण: हकीकत या सिर्फ एक 'मुखौटा'?
जब 2023 में महिला आरक्षण कानून पारित हुआ था, तभी से यह मांग की जा रही थी कि इसे जनगणना (Census) और परिसीमन (Delimitation) से अलग रखा जाए। अंजलि भारद्वाज का तर्क है कि यदि सरकार की नीयत साफ होती, तो वह मौजूदा 543 लोकसभा सीटों में से ही एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर सकती थी। ऐसा करने से 2024 के आम चुनाव में ही महिला सांसदों की संख्या बढ़ जाती।
लेकिन सरकार ने इसे परिसीमन से जोड़ दिया। अब सरकार जो तीन नए विधेयक लाई है, उनमें 'परिसीमन विधेयक' सबसे महत्वपूर्ण है, जिसे विशेषज्ञ "मदर बिल" कह रहे हैं। बिना इसके पास हुए महिला आरक्षण लागू नहीं हो सकता। सवाल यह उठता है कि जब 30 महीने पहले सरकार ने इसे जनगणना से जोड़ा था, तो अब अचानक रुख क्यों बदला जा रहा है?
संसद और विधायी प्रक्रिया का 'मखौल'
अंजलि भारद्वाज के अनुसार, इन विधेयकों को पेश करने का तरीका बेहद चिंताजनक है। प्री-लेजिस्लेटिव कंसल्टेशन पॉलिसी के तहत किसी भी विधेयक को संसद में लाने से कम से कम 30 दिन पहले सार्वजनिक चर्चा के लिए रखा जाना चाहिए। लेकिन यहाँ सांसदों को ड्राफ्ट बिल केवल 36 घंटे पहले दिया गया। इतने कम समय में इतने जटिल संविधान संशोधन को पढ़ना और उस पर बहस करना लगभग असंभव है। यह विधायी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
परिसीमन का विवाद: क्यों डरे हुए हैं दक्षिण भारतीय राज्य?
इस पूरी बहस का केंद्र 'परिसीमन' है। परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या के आधार पर चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण और सीटों की संख्या बढ़ाना। अनुमान है कि नई संसद के बाद लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 850 के आसपास हो सकती है।
विवाद की जड़ यह है कि यदि सीटों का आवंटन केवल जनसंख्या के आधार पर होता है, तो उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे हिंदी भाषी राज्यों की सीटें भारी संख्या में बढ़ जाएंगी। दूसरी ओर, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों ने पिछले दशकों में शिक्षा और स्वास्थ्य के जरिए अपनी जनसंख्या को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है।
अब इन राज्यों को डर है कि जनसंख्या कम करने का इनाम मिलने के बजाय उन्हें 'राजनीतिक सजा' दी जा रही है। अगर दक्षिण भारत की सीटें उत्तर के मुकाबले कम बढ़ती हैं, तो राष्ट्रीय राजनीति में उनकी आवाज कमजोर हो जाएगी। यह देश के संघीय ढांचे (Federal Structure) के लिए एक बड़ा खतरा पैदा कर सकता है।
क्या होगा दीर्घकालिक राजनीतिक प्रभाव?
अंजलि भारद्वाज आगाह करती हैं कि यदि सीटों की संख्या 850 हो गई और अधिकांश बढ़त उत्तर भारत से हुई, तो केंद्र में किसी एक विशेष क्षेत्र का स्थायी बहुमत हो सकता है। इससे दक्षिण भारत के राज्यों के हितों की अनदेखी करना आसान हो जाएगा। उन्होंने कहा, "यह सिर्फ महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उस परिसीमन ढांचे का मुद्दा है जिसे महिला आरक्षण की आड़ में धकेला जा रहा है।"
विपक्ष का तर्क है कि सरकार को एक साधारण संशोधन लाना चाहिए था जिसमें लिखा हो कि संसद और विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें तुरंत प्रभाव से महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। परिसीमन पर सभी दलों और राज्यों से लंबी चर्चा होनी चाहिए थी, न कि इसे हड़बड़ी में पास कराया जाना चाहिए।
क्या है आगे का रास्ता?
सरकार का तर्क है कि वह केवल महिलाओं को उनका हक देना चाहती है, लेकिन पारदर्शिता और सहमति के अभाव ने इस नेक इरादे पर शक की परतें चढ़ा दी हैं। वर्तमान में एनडीए के पास संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत अपने दम पर नहीं है, इसलिए उसे विपक्ष के सहयोग की जरूरत होगी।
दक्षिण भारत के नेताओं ने पहले ही विरोध की चेतावनी दी है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने परिसीमन के विरोध में काले झंडे दिखाने का आह्वान किया है। यदि सरकार इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने में विफल रहती है, तो यह आने वाले समय में देश के भीतर एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक असंतोष का कारण बन सकता है।
जरूरत इस बात की है कि महिला आरक्षण को तुरंत लागू किया जाए और परिसीमन जैसे गंभीर मुद्दे पर सभी राज्यों की चिंताओं को ध्यान में रखकर एक ऐसा मॉडल तैयार किया जाए जिससे किसी भी राज्य को जनसंख्या नियंत्रण करने के लिए राजनीतिक रूप से नुकसान न उठाना पड़े।

