x

13 करोड़ वोटरों का सवाल: क्या चुनाव आयोग की तकनीकी गलतियों ने पलटा चुनावी गणित?

'द फेडरल देश' के विशेष कार्यक्रम 'श्रीनि से संवाद' में एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन और एंकर मनीष ने चुनाव आयोग (ECI) की ओर से जारी हालिया दो पन्नों की प्रेस रिलीज पर विस्तार से विश्लेषण किया।


भारतीय चुनाव आयोग (ECI) की हालिया गतिविधियों और प्रेस रिलीज ने देश की चुनावी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चार महीने के लंबे अंतराल के बाद शनिवार को तीनों चुनाव आयुक्तों की एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक के बाद चुनाव आयोग ने दो पन्नों की एक प्रेस रिलीज जारी की। लेकिन इस प्रेस नोट ने सवालों का जवाब देने के बजाय कई नए अनसुलझे प्रश्नों को जन्म दे दिया है। 'द फेडरल देश' के खास शो 'श्रीनि से संवाद' में एंकर मनीष ने एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन के साथ इस पूरे विवाद की परतें खोलीं।

आयोग की सफाई से सुलझने के बजाय और उलझा विवाद

शो की शुरुआत करते हुए एंकर मनीष ने सवाल किया कि क्या शनिवार को आए चुनाव आयोग के प्रेस बयान से संदेह खत्म हुए हैं या और बढ़ गए हैं? इस पर 'द फेडरल' के एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन ने स्पष्ट कहा, "26 तारीख को आए इस दो पन्नों के प्रेस नोट से क्लेरिफिकेशन मिलने के बजाय और ज्यादा सवाल खड़े हो गए हैं। इस प्रेस रिलीज ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' की उस रिपोर्ट पर मुहर लगा दी है, जिसमें कहा गया था कि आयोग के भीतर मतभेद हैं। आयोग ने परोक्ष रूप से माना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अलावा बाकी दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की बातों को नजरअंदाज किया गया था और जमीनी स्तर पर गंभीर त्रुटियाँ (Errors) हुई हैं।"

आयोग ने यह भी माना कि गोवा जैसे छोटे राज्य में 91,000 से अधिक मतदाताओं के नाम काट दिए गए थे, जिन्हें अब तक रिस्टोर (पुनर्स्थापित) नहीं किया जा सका है।

ECINET की जाँच के लिए बनेगी विशेष कमेटी

विवाद इतना गहरा चुका है कि चुनाव आयोग को अब अपने ही डिजिटल नेटवर्क पर सवाल स्वीकार करने पड़े हैं। आयोग ने घोषणा की है कि चुनाव आयोग के पूरे डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की रीढ़ कहे जाने वाले 'ECINET' की व्यापक जाँच के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई जाएगी। इस कमेटी में डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर और आईआईटी (IIT) के एक प्रोफेसर शामिल होंगे, जो पूरे सिस्टम की तकनीकी खामियों की निष्पक्ष जाँच करेंगे।

इसके अलावा, शहरी इलाकों में वोटरों को बड़ी राहत देने का दावा किया गया है। राजधानी दिल्ली का उदाहरण देते हुए एस. श्रीनिवासन ने बताया कि करीब 32 लाख वोटरों को नोटिस मिले हैं। यानी दिल्ली की आबादी का लगभग आधा हिस्सा या हर दूसरा वोटर इस एसआईआर (SIR) प्रक्रिया से परेशान है।

अब चुनाव आयोग ने कहा है कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) खुद घर-घर जाकर दो मुख्य गड़बड़ियों को दूर करेंगे:

मैपिंग त्रुटि: यानी 2002 या पुरानी वोटर लिस्ट के साथ मैपिंग न होना।

लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी (Logical Discrepancy): वोटर आईडी और जमा किए गए दस्तावेजों (जैसे नाम या जन्मतिथि) में लिपकीय अंतर।

बीएलओ स्तर पर मामला हल न होने पर इसे इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO/RO) के पास भेजा जाएगा। वहीं ग्रामीण व गरीब तबके के लिए विशेष कैंप लगाए जाएंगे।

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR रोकने की मांग तेज़

चुनाव आयोग के इस रवैये के बाद विपक्षी खेमे में भारी नाराजगी है। जो आयोग अब तक 'सब सही है' का दावा कर रहा था, उसकी कमियाँ अब खुलकर सामने आ गई हैं।

एस. श्रीनिवासन के अनुसार, "अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अपने पद पर रहने का नैतिक अधिकार नहीं है और उन्हें तुरंत इस्तीफा देना चाहिए। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने तो यहाँ तक कहा है कि आयोग के अन्य दो सदस्यों (संधू और जोशी) को भी हट जाना चाहिए।"

हाल ही में हुई कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की बैठक में तीन प्रमुख माँगें रखी गईं:

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तुरंत अपने पद से इस्तीफा दें।

देश भर में चल रही मौजूदा SIR प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड (रोका) किया जाए।

जिन 13 करोड़ लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काटे गए हैं, उन्हें तुरंत इलेक्ट्रोरल रोल में वापस जोड़ा जाए।

दिलचस्प बात यह है कि केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि पूर्व केंद्रीय सचिव और भाजपा नेता आर.पी. सिंह जैसे दिग्गजों ने भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग का समर्थन किया है।

बीते चुनावों की वैधानिकता पर खड़े होते सवाल

संवाद के दौरान एंकर मनीष ने एक बड़ा संवैधानिक और व्यावहारिक सवाल उठाया—"जब 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम कटे हैं और बिहार व पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चुनाव संपन्न हो चुके हैं, जहाँ विपक्ष हार गया; तो अब नाम वापस जोड़ने की बात कहने से क्या उन चुनावों की वैधानिकता (Legitimacy) पर सवाल नहीं उठता?"

इस यक्ष प्रश्न का जवाब देते हुए एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन ने कहा, "यह बेहद जायज़ सवाल है। चुनाव के दौरान राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने 'वोट अधिकार यात्रा' निकाली थी और ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट तक गई थीं। लेकिन हमारे देश की कानूनी और संवैधानिक व्यवस्था में एक बार चुनाव खत्म होने और परिणाम आने के बाद पूरे चुनाव को रद्द करना या पीछे जाकर बदलना व्यावहारिक रूप से असंभव है। अतीत में ऐसा कोई कानूनी उदाहरण नहीं मिलता।"

हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि जिन लोगों के नाम गलत तरीके से कटे हैं, उनके साथ न्याय होना जरूरी है। पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि लगभग 27 लाख लोगों के नाम 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' के नाम पर हटा दिए गए थे। इसके लिए गठित न्यायिक ट्रिब्यूनल अब तक करीब 80 हजार मामलों की जाँच कर चुका है, जिसमें से 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में ट्रिब्यूनल को मतदाताओं की कोई गलती नहीं मिली है। लेकिन जिस धीमी गति से सुनवाई चल रही है, इस हिसाब से 27 लाख मामलों को सुलझाने में 10 से 12 साल का वक्त लग जाएगा!

Read More
Next Story