बिहार में दलितों का असली रहनुमा कौन? 'जनता का फैसला' क्या होगा?
बिहार की दलित राजनीति और परिवारवाद पर 'जनपथ' शो में बड़ा विश्लेषण; वरिष्ठ पत्रकार दीपक कोचगवे ने बताया चिराग और मांझी का जमीनी गणित।
Janpath: बिहार की सियासत में इन दिनों दलित नेतृत्व को लेकर शह-मात का खेल शुरू हो गया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के बीच खुद को बिहार का सबसे बड़ा दलित चेहरा साबित करने की होड़ मची है। जीतन राम मांझी जहां सीट बंटवारे और राजनीति में चिराग पासवान के बराबर हिस्सेदारी का दावा ठोक रहे हैं, वहीं चिराग पासवान खुद को पूरे बिहार का नेता मानकर चल रहे हैं। इसी सियासी रस्साकशी का विश्लेषण करने के लिए 'द फेडरल देश' के शो 'जनपथ' में एंकर ललित राय ने वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक दीपक कोचगवे से विस्तृत चर्चा की।
पासवान बनाम मांझी: किसका जनाधार कितना मजबूत?
शो 'जनपथ' में चर्चा के दौरान दीपक कोचगवे ने स्पष्ट किया कि जब हम 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' के नारे की बात करते हैं, तो इस गणित में चिराग पासवान का पलड़ा जीतन राम मांझी पर बहुत भारी पड़ता है।
चिराग पासवान की ताकत: चिराग पासवान को अपने पिता स्वर्गीय रामविलास पासवान की विरासत मिली है। बिहार में पासवान समाज का लगभग 6% का एकमुश्त वोट बैंक है, जो रामविलास पासवान के समय से ही उनका वफादार रहा है। रामविलास पासवान ने जगजीवन राम के बाद बिहार में दलितों की राजनीति को एक बड़ा मुकाम दिया था। चिराग पासवान न केवल चुनाव जीतते हैं, बल्कि अपनी सीटों पर वोट ट्रांसफर कराने की गजब की क्षमता भी रखते हैं। हालिया चुनावों में उनकी पार्टी (लोजपा-आर) ने 29 सीटों में से 19 सीटें जीतकर अपनी इस ताकत को साबित भी किया है।
जीतन राम मांझी की सीमाएं: इसके विपरीत, जीतन राम मांझी का प्रभाव मुख्य रूप से 'मगध' के इलाके (खासकर गया और उसके आसपास के क्षेत्रों) तक ही सीमित है, जिसे 'मांझी बहुल क्षेत्र' कहा जाता है। मांझी जब भी चुनाव जीतते हैं, तो वे सहयोगियों (जैसे भाजपा या जदयू) के वोटों के सहारे ही जीत पाते हैं। वे पूरे बिहार के स्तर पर दलितों के उतने बड़े सर्वमान्य नेता नहीं बन पाए हैं।
परिवारवाद के मुद्दे पर दोनों एक ही कश्ती में सवार
एंकर ललित राय ने जब यह सवाल उठाया कि क्या बिहार की दलित राजनीति परिवारवाद से मुक्त है? इस पर दीपक कोचगवे ने बेहद दिलचस्प विश्लेषण दिया। उन्होंने कहा कि बिहार की दलित राजनीति में ऐसा कोई भी बड़ा चेहरा नहीं है, जिस पर परिवारवाद का ठप्पा न लगा हो:
जगजीवन राम ने अपनी बेटी मीरा कुमार को राजनीति में आगे बढ़ाया।
रामविलास पासवान ने अपने भाई, भतीजे और बेटे चिराग पासवान को राजनीति की कमान सौंपी।
जीतन राम मांझी भी इसी रास्ते पर हैं। उनकी राजनीति भी अब उनके बेटे, बहू और समधी के इर्द-गिर्द घूमती है। मांझी जब भी सीटों की मांग करते हैं, तो उनका मकसद अपने परिवार के लोगों को टिकट दिलाना ज्यादा होता है। इसलिए परिवारवाद के मामले में कोई भी किसी से कम नहीं है।
'भरत तिवारी एनकाउंटर' और 'भोजपुर कांड': बदली राजनीतिक चालें
शो में बिहार और पूर्वांचल की राजनीति को प्रभावित करने वाले 'भरत तिवारी एनकाउंटर' (भोजपुर/आरा क्षेत्र) का भी जिक्र आया। इस मुद्दे पर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी की प्रतिक्रियाओं ने उनकी राजनीतिक मंसा को साफ कर दिया:
चिराग पासवान का डैमेज कंट्रोल: भरत तिवारी की मौत के बाद चिराग पासवान पहले तो खामोश रहे, लेकिन बाद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलने के बाद वे करीब 10-12 दिन देरी से पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे। चिराग पासवान असल में बिहार में 'दलित और ब्राह्मण' (सवर्ण) का एक नया राजनीतिक समीकरण बनाना चाहते हैं। चूंकि यह मामला सवर्ण समाज से जुड़ा था, इसलिए अपने कोर वोट बैंक (दलित) को बचाते हुए सवर्णों को साधने के लिए वे वहां गए और भावुकता कार्ड खेला।
जीतन राम मांझी का अमानवीय बयान: दूसरी तरफ, जीतन राम मांझी ने इस एनकाउंटर पर बेहद सख्त और अमानवीय रुख अपनाया। उन्होंने पुलिस की कार्रवाई का समर्थन करते हुए कहा कि पुलिस ने सही किया। मांझी ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि वे अपने खास वोट बैंक (मांझी समाज) को यह संदेश देना चाहते हैं कि वे उनके हितों के लिए किसी के भी खिलाफ खड़े हो सकते हैं। वे अक्सर शराबबंदी और ताड़ी बंदी के खिलाफ भी इसी वोट बैंक को एकजुट रखने के लिए बयान देते रहते हैं।
कौन है असली नेता?
चर्चा के आखिरी हिस्से में दीपक कोचगवे ने निष्कर्ष देते हुए कहा कि भले ही जीतन राम मांझी उम्र और अनुभव में बड़े हों, लेकिन राजनीतिक कद, वोट बैंक और प्रभाव के मामले में चिराग पासवान ही इस समय बिहार के सबसे बड़े दलित नेता हैं। मांझी की राजनीति सिर्फ गया और मगध क्षेत्र को बचाने की मजबूरी तक सिमट चुकी है, जबकि चिराग पासवान राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी पैर पसारने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि, एंकर ललित राय ने शो के अंत में कहा कि नेताओं के दावों से अलग असली फैसला तो जनता और वोटर्स को ही करना है कि वे किसे अपना असली हमदर्द और रहनुमा मानते हैं।
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