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राम मंदिर पर बीजेपी का 'रणनीतिक मौन': क्या 'चंदा चोरी' के विवाद से सहम गई BJP?

यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी राम मंदिर के मुद्दे पर मुखर क्यों नहीं दिख रही है। राम मंदिर ट्रस्ट में कथित 'चंदा चोरी' (चढ़ावा चोरी) के आरोपों और एसआईटी जांच के नतीजों को लेकर उठे सवालों ने बीजेपी को बैकफुट पर ला दिया है।


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीनों का समय बचा है। राजनीतिक दल अपनी-अपनी बिसात बिछाने में जुट गए हैं। लेकिन इस बार यूपी के सियासी समर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जिस राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को भारतीय जनता पार्टी दशकों तक अपने हर छोटे-बड़े चुनाव का मुख्य केंद्र बनाती आई है, आज उसी राम मंदिर के नाम पर पार्टी में एक 'टैक्टिकल साइलेंस' या रणनीतिक चुप्पी देखने को मिल रही है।

वरिष्ठ मंत्रियों के भाषणों से लेकर चुनावी रैलियों तक में धारा 370, माफिया राज और विकास कार्यों की बात तो हो रही है, लेकिन राम मंदिर का नाम लेने से नेता बचते नजर आ रहे हैं। 'द फेडरल देश' के कार्यक्रम 'जनपथ' में पत्रकारों और विश्लेषकों ने इस राजनीतिक बदलाव की गहराइयों पर विस्तृत चर्चा की।

'चंदा चोरी' के आरोप और बैकफुट पर बीजेपी

राम मंदिर मुद्दे से दूरी बनाने के पीछे सबसे बड़ा कारण राम मंदिर ट्रस्ट पर लगे 'चंदा चोरी' (चढ़ावा चोरी) के गंभीर आरोप माने जा रहे हैं। मंदिर निर्माण और जमीन खरीद में कथित धांधली की बातें सामने आने के बाद विपक्ष को बीजेपी पर हमला बोलने का बड़ा हथियार मिल गया।

सड़कों से लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर तक छात्र और विपक्षी कार्यकर्ता "वोट चोर-चंदा चोर" जैसे नारे लगा रहे हैं। यद्यपि राज्य सरकार ने मामले में एसआईटी (SIT) का गठन किया और कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन संतों, श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों के मन में बने सवाल पूरी तरह शांत नहीं हो सके हैं। बीजेपी को यह डर सता रहा है कि यदि वे राम मंदिर का मुद्दा उठाएंगे, तो जवाब में विपक्ष 'चंदा चोरी' का मुद्दा उठाकर उन्हें बैकफुट पर ला देगा।

2024 की अयोध्या हार और स्थानीय असंतोष

बीजेपी के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव में अयोध्या (फैजाबाद सीट) पर मिली हार एक बहुत बड़ा राजनीतिक झटका थी। भव्य राम मंदिर के उद्घाटन और प्राण-प्रतिष्ठा के ठीक बाद मिली इस हार ने यह साबित कर दिया कि केवल धार्मिक भावनाओं के सहारे चुनाव नहीं जीता जा सकता।

अयोध्या के कॉरिडोर निर्माण, चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण के दौरान सैकड़ों स्थानीय दुकानदारों के रोजगार छिन गए और लोगों के घर-मकान टूट गए। उचित मुआवजा न मिलने और बाहरी व्यवसायियों के हावी होने से स्थानीय निवासियों और अयोध्या के संतों के एक वर्ग में गहरी नाराजगी पैदा हुई। इसके अलावा, मंदिर ट्रस्ट में स्थानीय संतों को उचित प्रतिनिधित्व न मिलने का मुद्दा भी बना हुआ है।

अखिलेश यादव का 'पीडीए' कार्ड और बीजेपी की उलझन

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) का जो राजनीतिक फॉर्मूला खड़ा किया है, उसने बीजेपी के हिंदुत्व वोट बैंक में सेंध लगाने का काम किया है। अखिलेश यादव खुद को धार्मिक विवादों से अलग रखकर केदारेश्वर मंदिर बनवाने और भागवत कथा आयोजनों में शामिल होने जैसे कदम उठा रहे हैं। वे बीजेपी को सीधे चुनौती दे रहे हैं कि यदि हिम्मत है तो धार्मिक मुद्दों के बजाय विकास और भ्रष्टाचार पर बात करें।

इस पीडीए की काट के लिए बीजेपी अब सवर्णों के साथ-साथ अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) और दलितों के नेताओं को राज्यसभा भेजने और संगठन में जगह देने की रणनीति अपना रही है।

अयोध्या से मथुरा की ओर शिफ्ट होता फोकस

विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी अब राम मंदिर और अयोध्या के मुद्दे को छोड़कर मथुरा (कृष्ण जन्मभूमि) और काशी (ज्ञानवापी) के मुद्दे की तरफ ध्यान केंद्रित करने की कोशिश में है।

हाल के दिनों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मथुरा और वृंदावन के बार-बार दौरों, बांके बिहारी कॉरिडोर की पहल और कृष्ण जन्मभूमि मामले में अदालती कार्यवाहियों के तेज होने को इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी को लगता है कि अयोध्या में 'चंदा चोरी' के दाग के कारण राम मंदिर का मुद्दा अब राजनीतिक रूप से फायदेमंद नहीं रहा, इसलिए कृष्ण जन्मभूमि के मुद्दे को आगे बढ़ाकर धार्मिक गोलबंदी को बनाए रखा जा सकता है।

2027 की लड़ाई में किसकी होगी जीत?

राम मंदिर का निर्माण पूरा हो चुका है और यह आम जनता की आस्था का स्थाई केंद्र बन गया है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इसे बार-बार भुनाने की बीजेपी की कोशिश अब 'सैचुरेशन प्वाइंट' (संतृप्ति) पर पहुंच चुकी है।

विपक्ष के लगातार आक्रामक तेवरों और स्थानीय मुद्दों के हावी होने के चलते बीजेपी के लिए इस बार राह आसान नहीं है। आने वाले चुनावों में देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीजेपी मथुरा के जरिए धार्मिक कार्ड खेलने में सफल होती है, या फिर विपक्ष 'चंदा चोरी' और 'पीडीए' के दम पर बाजी मार लेता है।

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