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पंजाब में बगावत पर एक्शन: भूपेश बघेल की छुट्टी, क्या सचिन पायलट सुलझा पाएंगे कांग्रेस की कलह?

आगामी 7 राज्यों के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस आलाकमान ने अपने संगठन में बड़ा फेरबदल किया है। पंजाब कांग्रेस में जारी कलह और अंतर्कलह के बीच भूपेश बघेल को प्रभारी पद से हटाकर असम भेज दिया गया है।


अगले साल देश के सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसे देखते हुए कांग्रेस आलाकमान ने संगठन में अचानक कई बड़े बदलाव किए हैं। सबसे बड़ा कदम पंजाब को लेकर उठाया गया है, जहां लंबे समय से कांग्रेस के भीतर भारी उथल-पुथल और बगावत मची हुई थी।

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पंजाब के प्रभारी पद से हटाकर असम की कमान सौंप दी गई है। वहीं, राजस्थान के वरिष्ठ नेता सचिन पायलट को पंजाब का नया प्रभारी बनाया गया है। इसके अलावा, रणदीप सिंह सुरजेवाला को गुजरात की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है।

पंजाब कांग्रेस में क्यों बिगड़े हालात?

पंजाब में कांग्रेस की अंतर्कलह कोई नई बात नहीं है। 1 जुलाई को जब कांग्रेस ने चुनाव के लिए समन्वय, चुनाव प्रचार और कोर कमेटियों का गठन किया, तो अगले ही दिन से पार्टी में खुलकर बगावत शुरू हो गई। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, पूर्व गृह मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा, राणा गुरजीत, प्रगट सिंह और भारत भूषण आशु जैसे कई दिग्गज नेता प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के खिलाफ खड़े हो गए।

इन असंतुष्ट नेताओं का आरोप था कि तत्कालीन प्रभारी भूपेश बघेल केवल राजा वडिंग का बचाव कर रहे हैं और बाकी नेताओं की बात नहीं सुन रहे हैं। विरोध इस हद तक बढ़ गया था कि पिछले महीने भूपेश बघेल के दौरे के दौरान उनके और राजा वडिंग के खिलाफ कार्यकर्ताओं ने जमकर नारेबाजी की और आपत्तिजनक पोस्टर तक लगा दिए।

सचिन पायलट ही क्यों?

पंजाब में विधानसभा चुनाव से सात-आठ महीने पहले फैली इस कड़वाहट से केंद्रीय नेतृत्व चिंतित था। आंतरिक सर्वे में कांग्रेस को पंजाब में सरकार बनाने की मजबूत संभावना दिखाई दी थी, लेकिन गुटबाजी के कारण स्थिति हाथ से निकलती दिख रही थी।

रंधावा-पायलट का राजस्थान कनेक्शन: पंजाब कांग्रेस में बगावत का मुख्य चेहरा सुखजिंदर सिंह रंधावा पिछले दो सालों से राजस्थान के प्रभारी हैं। ऐसे में राजस्थान से आने वाले सचिन पायलट और रंधावा के बीच अच्छे कामकाजी संबंध हैं। माना जा रहा है कि पायलट इस तालमेल का इस्तेमाल पंजाब के अलग-अलग गुटों को साधने में करेंगे।

नेतृत्व का संदेश: सचिन पायलट को पंजाब जैसे चुनौतीपूर्ण राज्य में अपनी प्रशासनिक क्षमता साबित करने का मौका दिया गया है।

बघेल को हटाने से चन्नी और रंधावा गुट को यह संदेश गया है कि आलाकमान किसी एक नेता का पक्ष नहीं ले रहा है।

राहुल गांधी का कड़ा रुख: 'पहले एकजुटता, फिर यात्रा'

पंजाब में माहौल सुधारने के लिए भूपेश बघेल ने अमृतसर से एक 'बस यात्रा' शुरू करने का प्रस्ताव रखा था, जिसे राहुल गांधी हरी झंडी दिखाने वाले थे।लेकिन राहुल गांधी ने साफ कर दिया कि जब तक पार्टी के सभी गुट एक मंच पर नहीं आते, तब तक ऐसी किसी यात्रा का कोई फायदा नहीं है। यदि राहुल गांधी की मौजूदगी में नेताओं के समर्थकों ने एक-दूसरे के खिलाफ नारेबाजी कर दी, तो चुनाव से पहले ही अभियान को भारी नुकसान पहुंचेगा। अब यह जिम्मेदारी सचिन पायलट पर है कि वे कैसे सभी को एक साथ लाते हैं।

असम और गुजरात में नई जिम्मेदारियां

भूपेश बघेल (असम): भूपेश बघेल को पूरी तरह दरकिनार नहीं किया गया है, बल्कि उन्हें असम भेजा गया है। असम में लोकसभा उपचुनाव (नौगांव सीट) कांग्रेस के लिए साख का सवाल बना हुआ है। बघेल पहले भी असम में पार्टी के ऑब्जर्वर रह चुके हैं, इसलिए उनका अनुभव वहां काम आएगा।

रणदीप सिंह सुरजेवाला (गुजरात): कर्नाटक चुनाव में मिली जीत के बाद सुरजेवाला को अब गुजरात जैसे कठिन राज्य का जिम्मा सौंपा गया है, जहां राहुल गांधी ने लोकसभा में बीजेपी को सीधे चुनौती दी थी।

कांग्रेस आलाकमान ने इन बदलावों के जरिए यह साफ कर दिया है कि चुनाव से पहले गुटबाजी और अनुशासनहीनता को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। पंजाब में सचिन पायलट के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के बिखरे हुए क्षत्रपों को एक मंच पर लाना और कार्यकर्ताओं में नया जोश भरना है।

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