x

वोटर लिस्ट से 13.5 करोड़ नाम कटे! चुनाव आयोग पर 'श्रीनि से संवाद'

देश में 13.5 करोड़ वोट कटे! दिल्ली में हर तीसरा वोटर बाहर। 'श्रीनि से संवाद' में एडिटर-इन-चीफ़ एस. श्रीनिवासन ने बताई चुनाव आयोग के SIR अभियान की असलियत।


Srini se Samwad: देश भर में चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट सुधारने के लिए चलाए जा रहे 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। 'द फ़ेडरल देश' के खास कार्यक्रम 'श्रीनि से संवाद' में एंकर मनीष कुमार और 'द फ़ेडरल' के एडिटर-इन-चीफ़ एस. श्रीनिवासन के बीच इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई। बातचीत में सामने आया कि वोटर लिस्ट की सफाई के नाम पर देश के करोड़ों आम नागरिकों से उनका वोट देने का बुनियादी अधिकार छीना जा रहा है।


आंकड़ों के मुताबिक, अब तक देश भर में करीब 13.5 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम काटे जा चुके हैं और यह संख्या 15 करोड़ के पार जा सकती है। यानी देश की लगभग 10 प्रतिशत आबादी का नाम वोटर लिस्ट से बाहर हो चुका है।

इतिहास में पहली बार: आबादी बढ़ी, लेकिन वोटर घट गए
एंकर मनीष कुमार के सवालों का जवाब देते हुए एस. श्रीनिवासन ने कहा कि 1950 से लेकर आज तक का नियम रहा है कि हर साल 18 साल के नए युवा जुड़ते हैं, जिससे वोटर लिस्ट हमेशा बढ़ती है। नाम सिर्फ किसी की मौत होने पर ही हटता है। लेकिन आजादी के बाद पहली बार ऐसा हो रहा है कि देश की आबादी बढ़ने के बावजूद लगभग हर राज्य में औसतन 10% वोटर कम हो गए हैं।

राज्यों की चौंकाने वाली स्थिति:

दिल्ली: राजधानी में हर तीन में से एक वोटर (लगभग 33%) का नाम लिस्ट से हटा दिया गया है।

महाराष्ट्र: 2 करोड़ से ज्यादा लोगों के नाम कट चुके हैं।

कर्नाटक: करीब 1.08 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।

तेलंगाना: 3.38 करोड़ की कुल लिस्ट में से लगभग 74 लाख नाम बाहर कर दिए गए हैं।

सबसे ज्यादा मार महिलाओं, गरीबों और अल्पसंख्यकों पर
चर्चा में यह बात साफ तौर पर उभरी कि नाम कटने का शिकार कोई खास तबका ही ज्यादा बन रहा है:

महिलाएं: असम और तमिलनाडु को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में सबसे ज्यादा नाम महिलाओं के कटे हैं। सालों की मेहनत के बाद महिलाओं को वोट डालने के लिए आगे लाया गया था, लेकिन इस फैसले से उन्हें बड़ा झटका लगा है।

अल्पसंख्यक समाज: मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक इलाकों में बड़े पैमाने पर नाम काटे जाने की शिकायतें आ रही हैं।

प्रवासी मजदूर और गरीब: रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्यों में जाने वाले कामगारों के पास चुनाव आयोग द्वारा मांगे गए 11 कागजात नहीं होते। कागजों की इसी कमी के चलते उन्हें लिस्ट से बाहर किया जा रहा है।

नाम काटने के बहाने: 'ASDD' से लेकर उम्र का फेर
चुनाव आयोग ने नाम हटाने के लिए चार श्रेणियां बनाई थीं गायब (Absent), दूसरी जगह गए (Shifted), मृत (Dead) और दो जगह नाम (Duplicate), जिसे संक्षेप में ASDD कहा गया।

कर्नाटक पहुंचते-पहुंचते इसमें 'O' यानी Others (अन्य) जोड़ दिया गया, जिससे अफसरों को किसी भी वजह से नाम काटने की खुली छूट मिल गई।

इसके अलावा 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' (तार्किक गड़बड़ी) का नाम देकर छोटी-मोटी गलतियों पर नाम काट दिए गए। जैसे—नाम की स्पेलिंग में हल्की गलती होना, या पिता और बच्चे की उम्र में 50 साल से ज्यादा या 15 साल से कम का अंतर दिखना। कागजों की गलती सुधारने के बजाय सीधे वोट ही काट दिया गया।

'फॉर्म-7' का दुरुपयोग और झारखंड की मिसाल
नियमों के मुताबिक, किसी का फर्जी नाम कटवाने के लिए 'फॉर्म-7' भरा जाता है। चर्चा में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल के हवाले से बताया गया कि झारखंड में सत्ताधारी दल (भाजपा) के कार्यकर्ताओं ने थोक के भाव सैकड़ों फॉर्म भरकर खास समुदाय के नाम कटवाने की कोशिश की। गनीमत रही कि वहां गैर-भाजपा सरकार थी और बूथ लेवल अफसरों (BLO) ने हिम्मत दिखाकर इन फॉर्मों की जांच की और इन्हें खारिज कर दिया। लेकिन आरोप है कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है, वहां सरकारी टीचरों (जो BLO का काम करते हैं) पर दबाव बनाकर बिना सही जांच के नाम हटाए जा रहे हैं।

पश्चिम बंगाल का सबक: 90% नाम सही थे, फिर भी वोट नहीं दे पाए
पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले भी इसी तरह करीब 37 लाख नाम काटे गए थे। जब मामला बढ़ा, तो 19 ट्रिब्यूनल बनाए गए। बाद में आरटीआई (RTI) से पता चला कि जांच में 90% से ज्यादा लोग पूरी तरह सही और असली वोटर निकले। लेकिन सुनवाई इतनी धीमी चली कि चुनाव खत्म हो गए और लाखों वैध नागरिक वोट डालने से महरूम रह गए।

सिर्फ वोट नहीं, आम जिंदगी पर भी संकट
वोटर लिस्ट से नाम कटने का असर केवल चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे आम आदमी का पूरा जीवन प्रभावित हो रहा है:

वोटर पहचान संदिग्ध होने से गरीबों का सरकारी राशन बंद हो रहा है।

नीट (NEET) जैसे बड़े इम्तिहान पास करने के बाद भी छात्रों को मूल निवास (डोमिसाइल) प्रमाण पत्र और पुलिस वेरिफिकेशन नहीं मिल पा रहा है।

पासपोर्ट बनने और सरकारी नौकरियों में जॉइनिंग रुक रही है।

कार्यक्रम के अंत में एंकर मनीष कुमार और एस. श्रीनिवासन ने योगेंद्र यादव के उस बयान को दोहराया जिसमें उन्होंने कहा था कि "सच्चे लोकतंत्र में जनता सरकार चुनती है, लेकिन आज के दौर में सरकार अपने पसंद के मतदाता चुन रही है।" जब तक सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग इस पर सख्त कदम नहीं उठाते, तब तक आम नागरिक के वोट देने का अधिकार खतरे में रहेगा।


Read More
Next Story