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जनपथ: एफसीएनआर स्कीम, राज्यों का कर्ज और यूपीआई का पूरा विश्लेषण

FCNR स्कीम से डॉलर का प्रवाह, राज्यों पर 60 लाख करोड़ का कर्ज और बैंकों में घटते रोजगार, जानिए आर्थिक क्षेत्र से जुड़े इन प्रमुख सवालों का पूरा सच।


Janpath: भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट को थामने के लिए उठाये गए कदमों से लेकर देश के अर्थतंत्र से जुड़े कई गंभीर सवालों पर मंथन शुरू हो गया है। द फ़ेडरल देश के विशेष कार्यक्रम जनपथ में एंकर मनीष कुमार ने वॉइस ऑफ बैंकिंग के संस्थापक और बैंकिंग मामलों के विशेषज्ञ अश्विनी राणा से खास बातचीत की। इस चर्चा में एफसीएनआर (FCNR) डिपॉजिट स्कीम, राज्यों पर बढ़ता कर्ज, यूपीआई पर चार्ज और बैंकों में घटते रोजगार जैसे प्रमुख ज्वलंत मुद्दों का गहराई से विश्लेषण किया गया।


एफसीएनआर जमा योजना: राहत या आने वाले समय का जोखिम?
हाल के समय में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में देखी गई गिरावट को नियंत्रित करने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने फॉरेन करेंसी नॉन रेजिडेंट (FCNR) स्कीम के तहत स्पेशल ड्राइव शुरू की है। इसके तहत विदेशों में रहने वाले गैर-आवासीय भारतीय (NRI) बैंकों में डॉलर जमा कर सकते हैं, जिस पर उन्हें आकर्षक ब्याज दर और लोन की सुविधा मिलती है।

सितंबर तक इस योजना के जरिए लगभग 100 बिलियन डॉलर आने का अनुमान है। हालांकि, कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जब यह अवधि पूरी होगी और पैसा वापस निकाला जाएगा, तब रुपये पर फिर से दबाव बन सकता है।

एक्सपर्ट का नजरिया: क्या डरने की जरूरत है?
बैंकिंग विशेषज्ञ अश्विनी राणा का मानना है कि इस योजना को लेकर घबराने की आवश्यकता नहीं है।

फॉरेक्स रिजर्व की मजबूती: वैश्विक तनाव और युद्ध की परिस्थितियों के कारण देश का एक्सपोर्ट प्रभावित हुआ है और पेमेंट्स आने में समय लग रहा है। ऐसे में फॉरेक्स रिजर्व को बनाए रखना अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है।

आरबीआई की गारंटी: रिजर्व बैंक ने बैंकों को करेंसी स्वाइप दर में होने वाले उतार-चढ़ाव के जोखिम से आश्वस्त किया है। इससे न तो जमाकर्ताओं को नुकसान होगा और न ही बैंकों पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा।

2013 से तुलना: 2013 में भी अमेरिका द्वारा नीतियां बदलने पर डॉलर की निकासी हुई थी, लेकिन वर्तमान समय में केंद्रीय बैंक स्थितियों को संभालने में सक्षम दिख रहा है।

राज्यों पर 60 लाख करोड़ का कर्ज: विकास या मुफ्त योजनाओं की भेंट?
कार्यक्रम में दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा राज्यों पर लगातार बढ़ते कर्ज के बोझ का उठाया गया। आंकड़ों के अनुसार, देश के विभिन्न राज्यों पर कर्ज का आंकड़ा 60 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि राज्य सरकारें कैपिटल एक्सपेंडिचर और बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान देने के बजाय चुनावी लाभ और नकद हस्तांतरण जैसी लोक-लुभावन (फ्रीबीज) योजनाओं पर भारी रकम खर्च कर रही हैं। इसके कारण स्कूल, कॉलेज, स्वास्थ्य सेवाएं और प्रशासनिक कार्य प्रभावित हो रहे हैं।

कर्ज का इस्तेमाल और भविष्य की चिंताएं
पेंशन और योजनाओं के लिए कर्ज: उदाहरण के तौर पर बिहार सरकार द्वारा सोशल सिक्योरिटी पेंशन बांटने के लिए आरबीआई से कर्ज मांगने का मामला उठाया गया।

विकास बनाम रेवड़ियां: एक्सपर्ट के अनुसार, अगर कर्ज ढांचागत विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर या रोजगार सृजन के लिए लिया जाता है तो वह गलत नहीं है। लेकिन केवल चुनाव जीतने या मुफ्त सुविधाएं बांटने के लिए कर्ज लेना भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

कड़े नियमों की जरूरत: केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को राज्यों के कर्ज लेने की सीमा और उसके उपयोग को लेकर सख्त नियम बनाने की आवश्यकता है।

यूपीआई ट्रांजैक्शन पर एमडीआर और आम उपभोक्ता की चिंताएं
डिजिटल पेमेंट और यूपीआई के बढ़ते नेटवर्क के बीच हाल ही में 2000 रुपये से अधिक के ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या शुल्क लगाने से जुड़ी खबरों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।

कंज्यूमर पर असर नहीं: एक्सपर्ट ने स्पष्ट किया कि आम उपभोक्ताओं द्वारा किए जाने वाले दैनिक लेनदेन पर कोई चार्ज नहीं लगाया जाना चाहिए, ताकि डिजिटल इंडिया का अभियान प्रभावित न हो।

मर्चेंट और हाई वैल्यू ट्रांजैक्शन: बड़ी राशि के लेनदेन और व्यापारियों (मर्चेंट्स) पर लगने वाले नॉमिनल चार्ज से बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा तंत्र का खर्च निकाला जा सकता है। सरकार और वित्त मंत्रालय ने भी आम जनता को आश्वस्त किया है कि छोटे लेनदेन पर ऐसा कोई बोझ नहीं डाला जाएगा।

बैंकों में घटते रोजगार और आउटसोर्सिंग का कड़वा सच
चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील हिस्सा बैंकिंग क्षेत्र में रोजगार के अवसरों की कमी पर केंद्रित रहा। देश भर में युवा नौकरियों और पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर आंदोलित हैं।

बैंकिंग सेक्टर की वास्तविक स्थिति पर बात करते हुए चौंकाने वाले तथ्य सामने आए:

कर्मचारियों की संख्या में भारी गिरावट: साल 2013 से पहले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में करीब 9 लाख कर्मचारी कार्यरत थे, जो अब घटकर लगभग 7 लाख पर आ गए हैं।

रिटायरमेंट बनाम नई भर्ती: बैंकों में जितने कर्मचारी हर साल सेवानिवृत्त होते हैं, उसकी तुलना में केवल 10 फीसदी नई भर्तियां ही की जा रही हैं।

विलय का प्रभाव: सरकारी बैंकों के विलय (मर्जर) के बाद शाखाएं कम हुईं और नौकरियों के अवसर सीमित हो गए।

चौथे दर्जे के पदों की आउटसोर्सिंग: स्वीपर, चपरासी और सुरक्षा गार्ड जैसे पदों को पूरी तरह से ठेके (आउटसोर्सिंग) पर दे दिया गया है। करीब 80 हजार से अधिक बैंक शाखाओं के हिसाब से लगभग 2 लाख स्थायी पद आउटसोर्सिंग की भेंट चढ़ चुके हैं।

ठेकेदारों द्वारा कम वेतन देने, अत्यधिक कार्य दबाव (वर्क प्रेशर) और स्थायी नौकरी न होने के कारण युवा बैंक की नौकरियों से दूर हो रहे हैं या कुछ ही समय में नौकरी छोड़ रहे हैं।

निष्कर्ष
शो के अंत में एंकर मनीष कुमार और मेहमान अश्विनी राणा ने स्पष्ट किया कि देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए सही वित्तीय नीतियों, राज्यों में प्रशासनिक अनुशासन और युवाओं के लिए स्थायी रोजगार के अवसर पैदा करना बेहद जरूरी है।

आप इस पूरी चर्चा और अर्थशास्त्र से जुड़े इन मुद्दों पर क्या राय रखते हैं? कमेंट करके जरूर बताएं और 'द फ़ेडरल देश' के आधिकारिक यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें।


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