'पेंडोरा बॉक्स' खुला: क्या खत्म हो गया मोदी सरकार का खौफ?
द फ़ेडरल देश पर 'श्रीनी से संवाद'। एस. श्रीनिवासन का विश्लेषण: जेन-ज़ी के आंदोलन ने खत्म किया सरकार का खौफ, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सिर्फ शुरुआत है।
Srini se Samvad: देश की राजधानी के जंतर-मंतर पर एक महीने से अधिक समय तक चले युवाओं और छात्रों के ऐतिहासिक आंदोलन ने आखिरकार सत्ता के शीर्ष को हिला कर रख दिया है। 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) और जेन-ज़ी (Gen Z) के नेतृत्व में हुए इस उग्र और अभूतपूर्व विरोध-प्रदर्शन के दबाव में मोदी सरकार के कद्दावर नेता और पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना इस्तीफा सौंपना पड़ा है।
क्या यह इस्तीफा इस छात्र आंदोलन की समाप्ति है या फिर किसी बड़े राजनीतिक भूचाल का 'पेंडोरा बॉक्स' खुल गया है? इस ज्वलंत मुद्दे पर द फ़ेडरल देश के खास कार्यक्रम 'श्रीनी से संवाद' में एंकर मनीष कुमार ने द फ़ेडरल के एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन के साथ विस्तार से चर्चा की। श्रीनिवासन ने इस घटनाक्रम को पिछले एक दशक की भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट करार दिया है।
पेश हैं इस खास चर्चा के मुख्य और विश्लेषणात्मक अंश:
1. "बोतल का ढक्कन खुल गया है, और तंत्र का डर खत्म हो गया है"
चर्चा की शुरुआत करते हुए एस. श्रीनिवासन ने कहा कि पिछले 12-13 सालों की राजनीति में यह एक बहुत बड़े बदलाव का आगाज है। यह आंदोलन किसी स्थापित राजनीतिक दल या संगठन ने नहीं, बल्कि छोटे-छोटे बच्चों, बेरोजगारों और वेतन से परेशान आम युवाओं ने खड़ा किया है। श्रीनिवासन के मुताबिक, इस आंदोलन की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि इसने समाज के भीतर बैठे 'सरकार और पुलिसिया तंत्र के डर' को खत्म कर दिया है।
जहां पहले लाठीचार्ज, पेलेट गन, वाटर कैनन, आंसू गैस और धारा 144 से लोग दहल जाते थे, वहीं जेन-ज़ी (Gen Z) ने पुलिस की इस चाक-चौबंद व्यवस्था का मुकाबला 'व्यंग्य, तंज, रील्स और मीम्स' जैसे नए हथियारों से किया। पुलिस की लाठियों के आगे छात्रों का यह पूछना कि "अंकल, क्या आप अपने बच्चों को भी ऐसे ही मारते हैं?" सत्ता के अहंकार पर एक करारा प्रहार था।
2. सरकार की मुसीबतें कम नहीं, बल्कि और बढ़ गई हैं
एंकर मनीष कुमार के सवाल कि क्या प्रधान के इस्तीफे के बाद मामला शांत होगा? इसका जवाब देते हुए श्रीनिवासन ने स्पष्ट किया कि सरकार की मुश्किलें अब कम नहीं, बल्कि और बढ़ने वाली हैं। यह एक 'पेंडोरा बॉक्स' की तरह है। अब ई-20 (E20) पेट्रोल का मुद्दा, महंगाई, घटती मैन्युफैक्चरिंग, बेरोजगारी और चरमराती अर्थव्यवस्था जैसे सवाल भी उठने लगे हैं। आम आदमी अब यह समझ चुका है कि वह अपनी बात रख सकता है। आंदोलन अब सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी फैल चुका है।
3. दमन की नीति से शांत नहीं होगा युवाओं का आक्रोश
दिल्ली से लेकर बिहार और अन्य राज्यों में छात्रों को उनके घरों और हॉस्टलों से उठाए जाने की पुलिसिया कार्रवाई पर श्रीनिवासन ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि सरकार यदि यह सोचती है कि दमन की नीति या पुलिस के खौफ से वह इन युवाओं को कंट्रोल कर लेगी, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी। आवाजें अब और मुखर होंगी, क्योंकि यह एक लोकतांत्रिक देश है और युवाओं को अब सवाल पूछने की आदत हो गई है।
4. 50 NTA अफसरों को हटाना सिस्टम की नाकामी का सबूत
संसद में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद बीजेपी सांसदों द्वारा उनके 'हीरो' की तरह स्वागत किए जाने को श्रीनिवासन ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा, "धर्मेंद्र प्रधान एक शिक्षा मंत्री के तौर पर जवाबदेह थे। 47-50 एनटीए (NTA) अफसरों को रातों-रात हटाना और नंदन नीलेकणी, कामकोटि और सोमनाथ जैसे दिग्गजों की कमेटियां बिठाना इस बात का सुबूत है कि आपकी पूरी व्यवस्था फेल हो चुकी थी।" उन्होंने कहा कि ऐसे में किसी मंत्री का महिमामंडन करना आंदोलनकारी छात्रों को गलत संदेश देता है। राजनेताओं को यह समझना होगा कि वे जनता के सेवक हैं।
5. पीएम मोदी की लोकप्रियता और 'इमेज' को लगा भारी धक्का
श्रीनिवासन ने एक अहम राजनीतिक विश्लेषण करते हुए कहा कि हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज भी देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं, लेकिन उनके 'केयरफुली क्राफ्टेड' (सावधानी से बनाए गए) मजबूत राजनीतिक बिंब (Image) को इस आंदोलन ने महज कुछ हफ़्तों में एक बड़ा धक्का पहुंचाया है। सरकार जिस तरह के बचाव की मुद्रा में दिखी, उससे उनके राजनीतिक वर्चस्व को गहरी चोट पहुंची है।
6. विपक्ष की नाकामी: 'बैगेज' के बोझ तले दबी कांग्रेस
इस आंदोलन में विपक्ष, खासकर कांग्रेस की भूमिका पर श्रीनिवासन ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ बीजेपी के लिए नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र के लिए एक सबक है। जेन-ज़ी का स्थापित राजनीति से भरोसा उठ चुका है। आंदोलन के 25-26 दिनों तक कांग्रेस या 'इंडिया' गठबंधन के बड़े नेता जंतर-मंतर नहीं गए। जब तक राहुल गांधी मैदान में उतरे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
विपक्ष इस मौके को भुना नहीं सका क्योंकि उनके पास अपने 'पास्ट बैगेज' (पुराने दाग) हैं। पेपर लीक राजस्थान और कर्नाटक जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में भी हुए हैं। परिवारवाद, भ्रष्टाचार और जातिवाद के आरोपों के कारण जब बीजेपी विपक्ष पर पलटवार करती है, तो वे घिर जाते हैं। वहीं, आंदोलनकारी छात्र बिल्कुल बेदाग और 'नए-नवेले' थे, जिन्हें सरकार देशद्रोही या सांप्रदायिक साबित नहीं कर सकी।
7. क्षेत्रीय दलों के लिए विकल्प बनने की चुनौती
आम आदमी पार्टी (AAP) जो कि अब सिर्फ पंजाब तक सिमट गई है, वह 1 अगस्त और 4 अगस्त को ई-20 जैसे मुद्दों को लेकर इस 'पॉलिटिकल स्पेस' को भरने की कोशिश कर रही है। सपा, टीएमसी और एनसीपी जैसी क्षेत्रीय पार्टियां भी आने वाले चुनावों को देखते हुए इस जन-आक्रोश का फायदा उठाने की कोशिश करेंगी।
'श्रीनी से संवाद' कार्यक्रम का लब्बोलुआब यह रहा कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा किसी एक घटना का अंत नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में एक नए युग का प्रारंभ है। भारत का युवा अब सत्ता से खौफ नहीं खाता, बल्कि उसकी आंखों में आंखें डालकर अपनी बेरोजगारी, शिक्षा और अधिकारों का हिसाब मांग रहा है।
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