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UP चुनाव से पहले RSS पर मायावती का प्रहार: क्या बचेगा बहुजन वोट?

'द फ़ेडरल देश' के शो 'जनपद' में एंकर मनीष कुमार के साथ देखिए मायावती के RSS पर हमले, यूपी उपचुनावों की रणनीति और आरक्षण पर हुए बड़े सियासी विश्लेषण का पूरा सच।


Janpath: बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीमो मायावती ने हालिया बयान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर सीधा और बड़ा आरोप लगाया है। मायावती का दावा है कि आरएसएस सरकारी नौकरियों में आरक्षण को निष्प्रभावी बना रहा है, जिससे दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के संवैधानिक अधिकार छीने जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले मायावती की इस राजनीतिक सक्रियता और संघ प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयानों के बीच, इस मुद्दे ने देश और प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।

डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के विशेष कार्यक्रम 'जनपद' में एंकर मनीष कुमार ने इस गंभीर मुद्दे और इसके सियासी मायनों पर वरिष्ठ पत्रकारों व राजनीतिक विशेषज्ञों के साथ तीखी और विस्तृत चर्चा की।

चर्चा में शामिल प्रमुख मेहमान

सुनील शुक्ल: वरिष्ठ पत्रकार

सुरेंद्र राजपूत: राष्ट्रीय प्रवक्ता, कांग्रेस

वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ल का विश्लेषण: "केवल बयानबाजी से नहीं, सड़क पर उतरने से बनेगी बात"

वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ल ने मायावती के बयान को समय की मांग और स्वाभाविक बताते हुए बसपा के गिरते जनाधार पर गहरा विश्लेषण प्रस्तुत किया:

बीजेपी से बनानी होगी स्पष्ट दूरी: सुनील शुक्ल के अनुसार, मायावती को अपना खोया हुआ राजनीतिक जनाधार वापस पाने के लिए भारतीय जनता पार्टी से पूरी तरह वैचारिक और रणनीतिक दूरी बनानी होगी।

आरक्षण केवल आर्थिक मुद्दा नहीं: उन्होंने जोर देकर कहा कि आरक्षण कोई महज राजनीतिक या आर्थिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह सामाजिक बराबरी और सशक्तिकरण का सबसे बड़ा संवैधानिक टूल है। जब तक समाज के आखिरी व्यक्ति को बराबरी का दर्जा नहीं मिलता, आरक्षण को खत्म या कमजोर नहीं किया जा सकता।

वोटरों का मोहभंग और बसपा का गिरता ग्राफ: 2024 के लोकसभा चुनावों में दलित और पिछड़ा वर्ग यह मानकर 'इंडिया' गठबंधन (सपा-कांग्रेस) की तरफ गया कि संविधान और आरक्षण पर संकट है। नतीजतन, मायावती का वोट प्रतिशत लगातार गिरा है और हालिया चुनावों में उनकी पार्टी का संसदीय ग्राफ बेहद नीचे आ गया है।

संघर्ष का रास्ता: अगर बसपा को अपनी खोई हुई राजनीतिक ताकत वापस पानी है, तो मायावती को केवल बयानबाजी और प्रेस नोट तक सीमित रहने के बजाय, आरक्षण और संविधान के मुद्दे पर कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर उतरकर संघर्ष करना होगा।

कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत का निशाना: "कथनी और करनी में बड़ा फर्क"

कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने मायावती को देश का बड़ा दलित चेहरा स्वीकारते हुए भी उनकी मौजूदा कार्यशैली पर तीखे सवाल खड़े किए:

बीजेपी के पक्ष में रणनीतिक रुख: सुरेंद्र राजपूत ने आरोप लगाया कि पिछले पांच सालों से मायावती के काम करने का तरीका अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी को फायदा पहुंचाने वाला रहा है।

विपक्ष पर हमला कर धार कुंद करना: उन्होंने कहा कि जब भी मायावती सत्ता पक्ष (बीजेपी) पर हमला करती हैं, तो साथ ही राहुल गांधी और अखिलेश यादव पर भी निशाना साध देती हैं, जिससे मूल मुद्दे की धार कुंद हो जाती है।

संविदा और लेटरल एंट्री पर चुप्पी: सरकार 'लेटरल एंट्री', संविदा (Contract) और आउटसोर्सिंग के जरिए बिना आरक्षण दिए भर्तियां कर रही है, लेकिन मायावती ने इस संस्थागत बदलाव पर कभी कोई ठोस या मुखर विरोध दर्ज नहीं कराया।

बहुजन मिशन की वापसी: यदि मायावती को मान्यवर कांशीराम के मूल 'बहुजन मिशन' को पुनर्जीवित करना है, तो उन्हें बीजेपी और आरएसएस की नीतियों के खिलाफ बिना किसी समझौते के डटकर मुकाबला करना होगा।

'जनपद' निष्कर्ष

'द फ़ेडरल देश' के कार्यक्रम 'जनपद' की इस विस्तृत चर्चा से यह साफ उभरकर आता है कि मायावती का आरएसएस पर हमला अपने खिसकते कोर वोट बैंक को वापस खींचने की एक बड़ी कवायद हो सकती है। लेकिन क्या वे 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों और आगामी चुनावों से पहले अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पा सकेंगी? यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि वे सत्ताधारी दल से कितनी राजनीतिक दूरी कायम रखती हैं और बहुजन समाज के ज्वलंत मुद्दों को लेकर कितनी गंभीरता से जमीन पर उतरती हैं।

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