क्या छात्र आंदोलन और GenZ के गुस्से ने ढहाया BJP का बांकेपुर किला?
द फ़ेडरल देश के शो 'जनपथ' में मनीष कुमार और दीपक कोचगवे के साथ देखिए बांकेपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत, नितिन नवीन के गढ़ में बीजेपी की हार और GenZ आंदोलन पर विस्तृत राजनीतिक विश्लेषण।
Janpath: बिहार की राजधानी पटना की सबसे प्रतिष्ठित और हाई-प्रोफाइल बांकेपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने पूरे देश के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। पिछले 29 वर्षों (1995 से) से लगातार भारतीय जनता पार्टी (BJP) का गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के सांसद बनने के बाद हुए उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने एक ऐतिहासिक और चौंकाने वाली जीत दर्ज की है।
डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के विशेष कार्यक्रम 'जनपथ' में एंकर मनीष कुमार ने बिहार के वरिष्ठ पत्रकार दीपक कोचगवे के साथ इस चुनाव परिणाम के पीछे की अंदरूनी वजहों, गुटबाज़ी, GenZ और छात्र आंदोलन के प्रभाव और बिहार की राजनीति में आने वाले बड़े बदलावों पर विस्तार से चर्चा की।
1. 29 साल पुराने 'बीजेपी के किले' में कैसे सेंधमारी हुई?
बांकेपुर सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं है; यह नवीन प्रसाद किशोर और उनके बेटे नितिन नवीन की 29 साल पुरानी विरासत का केंद्र रही है। 2025 के विधानसभा चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद जन सुराज और प्रशांत किशोर पर सवाल उठ रहे थे।
प्रशांत किशोर का मास्टरस्ट्रोक: 2025 में खुद मैदान में न उतरने की गलती से सीख लेते हुए प्रशांत किशोर ने इस बार खुद बांकेपुर से उम्मीदवार बनने का साहसिक फैसला लिया। उन्होंने हर मोहल्ले, कम्युनिटी और कोचिंग सेंटरों में सघन जनसंपर्क अभियान चलाया।
समीकरणों का टूटना: बांकेपुर को सवर्ण बाहुल्य (कायस्थ, भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण - करीब 18%) और बीजेपी का सबसे पक्का वोट बैंक माना जाता था। लेकिन नतीजों ने दिखाया कि इस बार कायस्थ, भूमिहार, राजपूत और ब्राह्मण वोटों के साथ-साथ मुस्लिम और यादव वोट भी प्रशांत किशोर की तरफ पोलराइज (ध्रुवीकृत) हुए।
कम वोटिंग प्रतिशत (34%): पहले माना जा रहा था कि कम मतदान (34%) का फायदा कैडर बेस वाली बीजेपी को मिलेगा, लेकिन जनता की ख़ामोशी और अंडरकरेंट ने बीजेपी के दो मन (80 किलो) लड्डू बनाने के दावों को ध्वस्त कर दिया।
2. छात्र आंदोलन, AK-47 और GenZ की नाराजगी का असर
बांकेपुर इलाका पटना में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों और कोचिंग संस्थानों का बहुत बड़ा हब है।
छात्रों पर लाठीचार्ज और बीजेपी नेताओं के बयान: हाल ही में छात्रों के विरोध प्रदर्शनों पर पुलिसिया बर्बरता, सिवान में पुलिस द्वारा AK-47 लहराने की घटना और बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं द्वारा छात्रों को उग्रवादी कहे जाने का कड़ा विरोध हुआ।
GenZ का बदलाव का मिज़ाज: वरिष्ठ पत्रकार दीपक कोचगवे ने रेखांकित किया कि छात्र आंदोलन का 'अंडरकरेंट' बहुत गहरा था। पटना कॉलेज की छात्राओं से लेकर कोचिंग के युवाओं तक ने खुले तौर पर कहा कि बीजेपी के वर्षों के शासन के बाद अब प्रशांत किशोर को मौका मिलना चाहिए। GenZ और पहली बार वोट करने वाले युवाओं ने पारंपरिक राजनीतिक नारों से इतर बदलाव के पक्ष में मतदान किया।
3. नितिन नवीन, सम्राट चौधरी और बीजेपी की अंदरूनी गुटबाज़ी
यह चुनाव सिर्फ एक सीट का नहीं था, बल्कि बिहार बीजेपी के तीन शीर्ष कमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन (जिनकी खाली की हुई सीट थी), उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री सम्राट चौधरी (जिनके नेतृत्व में चुनाव हुआ), और प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल की साख की परीक्षा था।
गलत उम्मीदवार चयन (Selection of Candidate): बीजेपी ने पहले घोषित प्रत्याशी का नामांकन रद्द कराकर नीरज कुमार सिन्हा को टिकट दिया, जिन्हें स्थानीय कार्यकर्ताओं और कैडर का समर्थन नहीं मिला। समर्थकों में यह धारणा बनी कि उम्मीदवार पर थोपा गया था।
पार्टी के भीतर गुटबाज़ी: टिकट बंटवारे को लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के समर्थकों और सम्राट चौधरी खेमे के बीच गुटबाज़ी हावी रही। स्टार प्रचारकों की फौज (40 नेता) उतारने और स्थानीय सांसद रविशंकर प्रसाद के क्षेत्र होने के बावजूद बीजेपी अपने ही गढ़ में कार्यकर्ताओं का उत्साह नहीं जगा सकी।
4. बिहार की राजनीति में आने वाले बड़े भूचाल और विपक्षी समीकरण
विधानसभा में प्रशांत किशोर का प्रवेश बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत का संकेत दे रहा है:
तेजस्वी की एकाधिकार (Monopoly) को चुनौती: आरजेडी और तेजस्वी यादव को अब तक बिहार में एकमात्र विपक्षी चेहरा माना जाता था, लेकिन चुनाव प्रचार से लालू यादव की दूरी और आरजेडी की ढिलाई का फायदा प्रशांत किशोर ने उठाया। अब विधानसभा के भीतर प्रशांत किशोर सरकार को घेरने वाले सबसे मुखर विपक्षी चेहरे के रूप में उभरेंगे।
जातिगत राजनीति से परे नया विकल्प: यद्यपि बिहार में बिना सामाजिक समीकरणों के राजनीति संभव नहीं है, लेकिन बांकेपुर के नतीजे दिखाते हैं कि विकास, रोजगार, शिक्षा और शासन के मुद्दों पर मतदाता अब पारंपरिक बंधनों को तोड़कर नए विकल्प को अपनाने के लिए तैयार हैं।
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