क्या नकद ट्रांसफर से मिलेगी सत्ता की चाबी? यूपी चुनाव में 'फ्रीबीज़' का गणित
'द फ़ेडरल देश' के शो 'जनपथ' में हेमंत तिवारी और SP प्रवक्ता मोहम्मद आजम की बहस। जानिए यूपी चुनाव में नकद ट्रांसफर योजना, फ्रीबीज और राजनीतिक असर का सच।
Janpath: 'द फ़ेडरल देश' के खास कार्यक्रम 'जनपथ' में इस बार उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में 'रेवड़ी संस्कृति' (Freebies) के बढ़ते प्रभाव पर गहरी चर्चा हुई। शो में वरिष्ठ पत्रकार हेमंत तिवारी और समाजवादी पार्टी (SP) के प्रवक्ता मोहम्मद आजम ने हिस्सा लिया और इस बात पर बहस की कि क्या चुनाव से ठीक पहले नकद राशि बांटने की घोषणाएं लोकतंत्र के लिए सही हैं और क्या इससे यूपी की सत्ता का ऊंट किस करवट बैठेगा।
यहाँ इस चर्चा की विस्तृत रिपोर्ट दी गई है:
यूपी चुनाव में 'नकद' की होड़
कार्यक्रम की शुरुआत में बताया गया कि यूपी विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने बचे हैं और 'चुनावी सौगातों' का दौर शुरू हो गया है। खबरें हैं कि योगी सरकार चुनाव से पहले महिलाओं के खाते में 50,000 रुपये ट्रांसफर करने की योजना बना रही है (जिसमें से 20,000 रुपये चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले दिए जा सकते हैं)। वहीं, इसके जवाब में अखिलेश यादव ने भी ऐलान किया है कि उनकी सरकार बनने पर महिलाओं को सालाना 40,000 रुपये दिए जाएंगे।
हेमंत तिवारी का विश्लेषण: "हार के डर से उठाया गया हथियार"
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत तिवारी ने इस 'रेवड़ी कल्चर' का बेबाकी से विश्लेषण किया। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित रहे:
एंटी-इनकंबेंसी का डर: साढ़े नौ साल सत्ता में रहने के बाद योगी सरकार को भारी सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) का सामना करना पड़ रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव के 'पीडीए' (PDA) फॉर्मूले की सफलता ने बीजेपी के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।
सफल 'फॉर्मूले' की नकल: यह कोई नया प्रयोग नहीं है। मध्य प्रदेश में 'लाडली बहना योजना', महाराष्ट्र में 'लाडकी बहिन योजना' और बिहार में नकद ट्रांसफर की घोषणाओं ने बीजेपी और उसके सहयोगियों को चुनाव जिताने में अहम भूमिका निभाई है।
मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश: हेमंत तिवारी ने स्पष्ट किया कि नकद बांटने का उद्देश्य युवाओं की नाराजगी (पेपर लीक, बेरोजगारी) और राम मंदिर चंदा विवाद जैसे ज्वलंत मुद्दों से ध्यान हटाना है।
चुनाव आयोग और अर्थव्यवस्था पर सवाल: उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि चुनाव आयोग (EC) इस पर रोक लगाने में विफल रहा है, क्योंकि ये घोषणाएं आचार संहिता (MCC) लागू होने से ठीक पहले की जाती हैं। रिजर्व बैंक (RBI) भी लगातार चेतावनी दे रहा है कि इस तरह खजाने का पैसा बांटना राज्यों की अर्थव्यवस्था को खोखला कर रहा है।
मोहम्मद आजम (सपा) का पक्ष: "यह रेवड़ी नहीं, सम्मान है"
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मोहम्मद आजम ने अपनी पार्टी के 40,000 रुपये देने के वादे का बचाव किया और बीजेपी पर तीखा हमला बोला:
साढ़े नौ साल बाद महिलाओं की याद क्यों? आजम ने सवाल उठाया कि योगी सरकार को अपने कार्यकाल के अंतिम महीनों में ही महिलाओं की याद क्यों आ रही है? उन्होंने इसे बीजेपी की घबराहट और हार का डर बताया।
'सम्मान' बनाम 'रेवड़ी': उन्होंने तर्क दिया कि सपा की 'महिला सम्मान स्कीम' रेवड़ी नहीं है, बल्कि गरीब महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और सामाजिक न्याय की दिशा में उठाया गया कदम है।
जनता नहीं भटकेगी: सपा प्रवक्ता ने दावा किया कि यूपी की जनता (खासकर महिलाएं, युवा और किसान) बीजेपी सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार, महंगाई और उत्पीड़न को नहीं भूली है। चुनाव से ठीक पहले दिए गए 20 हजार रुपये से मतदाता 10 साल की नाकामियों को माफ नहीं करेंगे।
'जनपथ' की इस चर्चा से यह साफ होता है कि राजनीतिक पार्टियां अब वैचारिक लड़ाई या बुनियादी ढांचे के विकास से ज्यादा 'सीधे नकद ट्रांसफर' पर निर्भर होने लगी हैं। एक तरफ बीजेपी इसे अपना 'मास्टरस्ट्रोक' मान रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे 'वोटों की खरीद-फरोख्त' बताकर खुद भी उसी रेस में शामिल हो गया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उत्तर प्रदेश का मतदाता इन नकद घोषणाओं के प्रभाव में आता है, या फिर रोजगार और विकास जैसे ठोस मुद्दों पर वोट करता है।
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