'जनपथ': परिसीमन पर खड़गे की पीएम को चिठी, 2029 का बदला समीकरण?
'जनपथ' में अभिषेक रावत संग सुनील शुक्ल और मनीष कुमार की चर्चा: किरेन रिजिजू के बयान और मल्लिकार्जुन खड़गे के पत्र के बाद परिसीमन पर क्यों मचा हड़कंप?
Janpath: संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के एक हालिया बयान के बाद देश में लोकसभा परिसीमन (Delimitation) को लेकर एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। रिजिजू ने संकेत दिए हैं कि परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए सरकार जल्द ही संसद का एक विशेष सत्र (Special Session) बुला सकती है। इस बयान के आते ही कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है।
डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के खास राजनीतिक शो 'जनपथ' में एंकर अभिषेक रावत ने वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ल और राजनीतिक विश्लेषक मनीष कुमार के साथ परिसीमन के इस पेंच, विपक्षी चक्रव्यूह और 2029 के चुनावी गणित पर विस्तृत चर्चा की।
1. खड़गे के पत्र का संदेश और कांग्रेस का स्पष्ट रुख
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे अपने पत्र में पार्टी के स्टैंड को पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है:
543 सीटों की मर्यादा बनी रहे: कांग्रेस का कहना है कि लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या (543 सीटों) में कोई बदलाव या वृद्धि नहीं की जानी चाहिए और इस व्यवस्था को अगले 25 वर्षों तक यथावत रखा जाए।
वर्तमान सीटों पर ही लागू हो महिला आरक्षण: कांग्रेस ने सरकार के उस दावे को खारिज कर दिया कि महिला आरक्षण लागू करने के लिए सीटों की संख्या बढ़ाना अनिवार्य है। खड़गे ने कहा कि 33% महिला आरक्षण को इसी वर्तमान 543 सीटों के ढांचे के भीतर 2029 के चुनाव से ही लागू किया जाना चाहिए।
सर्वदलीय बैठक की मांग: परिसीमन जैसे देश के बड़े संवैधानिक और राजनीतिक ढांचे को प्रभावित करने वाले विषय पर एकतरफा फैसला लेने के बजाय तुरंत एक सर्वदलीय बैठक (All-Party Meeting) बुलाई जाए और व्यापक विचार-विमर्श हो।
वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ल का मानना है कि खड़गे ने इस पत्र के जरिए सरकार की उस संभावित घेराबंदी को बेनकाब कर दिया है, जिसके तहत विपक्ष को 'महिला आरक्षण विरोधी' के रूप में पेश करने की कोशिश की जा रही थी।
2. परिसीमन का गणित: नीतिगत संस्थाएं बनाम राजनीतिक हित
चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ल ने नीतिगत संस्थाओं की संरचना और उत्तर-दक्षिण राज्यों के बीच के संतुलन पर कई महत्वपूर्ण बिंदु रखे:
लोकसभा की सदस्य संख्या का सवाल: संवैधानिक और नीतिगत फैसले लेने वाली शीर्ष संस्थाओं में सदस्यों की संख्या बहुत सीमित होनी चाहिए। 800 से 1000 सांसदों वाले सदन में नीतिगत निर्णय लेना व्यावहारिक नहीं होगा। भारत जैसे लोकतंत्र में 543 सदस्यों का प्रतिनिधि मंडल पर्याप्त है।
उत्तर बनाम दक्षिण भारत का असंतुलन: यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाकर परिसीमन किया जाता है, तो उत्तर प्रदेश (80 से बढ़कर ~120 सीटें) जैसे राज्यों का प्रतिनिधित्व काफी बढ़ जाएगा। वहीं, तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों को नुकसान होगा, जिन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय मानकों को ईमानदारी से लागू किया है।
क्षेत्रीय दलों और डीएमके (DMK) का रुख: भले ही भाजपा तमिलनाडु में नए राजनीतिक समीकरण साधने का प्रयास करे, लेकिन डीएमके या एआईएडीएमके जैसी पार्टियां अपनी राज्य की जनता और राजनीतिक वजूद के खिलाफ जाकर ऐसे किसी कदम का समर्थन नहीं कर सकतीं, जिससे दक्षिण का प्रतिनिधित्व कम हो।
3. अप्रैल की शिकस्त और 'ऑपरेशन लोटस' की बेचैनी
राजनीतिक विश्लेषक मनीष कुमार ने याद दिलाया कि 17 अप्रैल को बुलाए गए विशेष सत्र के दौरान सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक पर पहले ही झटका खा चुकी है:
2029 की चुनावी ढाल: भाजपा के लिए परिसीमन सिर्फ एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव की जीत सुनिश्चित करने का सबसे बड़ा राजनीतिक औजार है। देश में 'Gen Z' और 'Gen Alpha' के बढ़ते प्रदर्शनों, बेरोजगारी, महंगाई और पेपर लीक जैसे मुद्दों से उपजे जन-आक्रोश के बीच भाजपा उत्तर भारत में सीटें बढ़ाकर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है।
विपक्षी दलों में तोड़फोड़: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी 20 सांसदों के अलग गुट बनाने (NCPI में जाने) और उस पर सुप्रीम कोर्ट व लोकसभा स्पीकर की नोटिस प्रक्रिया से यह साफ है कि सरकार लगातार संख्याबल जुटाने की कोशिश में है। लेकिन जब तक टीएमसी और अन्य दलों की स्थिति स्पष्ट नहीं होती, सरकार के लिए दोबारा विशेष सत्र बुलाकर बिल पास कराना जोखिम भरा है।
4. आगामी चुनाव और उत्तर प्रदेश की राजनीति का कनेक्शन
उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए सरकार महिलाओं के लिए कई घोषणाएं कर रही है।
नैरेटिव सेट करने का प्रयास: उत्तर प्रदेश में योगी सरकार द्वारा महिलाओं के लिए मुफ्त बस सफर और अखिलेश यादव की 40 हजार रुपये की योजना के बीच, केंद्र सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण का मुद्दा उछालकर एक बड़ा चुनावी माहौल बनाना चाहती है।
विपक्ष का मजबूत तर्क: विपक्षी दलों का कहना है कि जब 2023 में महिला आरक्षण बिल संसद से सर्वसम्मति से पास हो चुका है, तो सरकार इसे तुरंत लागू करने के बजाय 2029 के परिसीमन की आड़ में क्यों अटका रही है? यह सवाल अब जनता के बीच भी जा रहा है।

