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जनपथ: नक्शे का बहाना या आजम खान को मिटाने का राजनीतिक निशाना?

आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी पर बुलडोजर के खतरे ने विपक्ष को किया एकजुट! 'जनपथ' शो में विशेषज्ञों ने खोले इस पूरी कार्रवाई के सियासी मायने।


Janpath: उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय (Jauhar University) इन दिनों गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक विवादों के केंद्र में है। विश्वविद्यालय की 38 इमारतों को 'बिना नक्शा पास कराए' निर्मित बताने और उन्हें ढहाने के प्रशासन के आदेश ने पूरे प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। हालांकि, मुरादाबाद के मंडलायुक्त (डिवीजनल कमिश्नर) आन्जनेय कुमार सिंह ने इस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है और अब यह पूरा मामला उच्च न्यायालय (High Court) के विचाराधीन है।


इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय पर 'द फ़ेडरल देश' के खास कार्यक्रम 'जनपथ' में एंकर मनीष ने एक बेहद गंभीर और विस्तृत चर्चा की। इस पूरी कार्रवाई के कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं का गहराई से विश्लेषण करने के लिए दो बेहद अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन अग्रवाल और नीरज महेरे बतौर विशेषज्ञ हमारे साथ जुड़े। दोनों ने तथ्यों और तर्कों के आधार पर इस विवाद की परतें खोलीं।
विपक्ष की एकजुटता और राजनीतिक सरगर्मी
कार्यक्रम की शुरुआत में एंकर मनीष ने बताया कि कैसे इस एक मुद्दे ने बिखरे हुए विपक्ष को एकजुट कर दिया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने संसद में पेपर लीक के साथ जौहर यूनिवर्सिटी का मुद्दा उठाया। वहीं, उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय का आजम खान के परिवार से मिलना, बसपा सुप्रीमो मायावती का इस कार्रवाई के खिलाफ बयान देना और एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का समर्थन जताना, इस बात का प्रमाण है कि विपक्ष इसे एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में देख रहा है। यहां तक कि सपा सांसद इकरा हसन ने कड़े शब्दों में कहा है कि यदि यूनिवर्सिटी की एक भी ईंट गिरी, तो वह अपना सिर लगा देंगी।

वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन अग्रवाल का विश्लेषण: "शिक्षा के मंदिर को ढहाना कोई समाधान नहीं"
चर्चा को विस्तार देते हुए वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन अग्रवाल ने इस पूरे विवाद की तकनीकी और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि साझा की। उनके प्रमुख बिंदु इस प्रकार रहे:

नक्शे का विवाद और इतिहास: मनमोहन अग्रवाल ने बताया कि 2006 में जब समाजवादी पार्टी की सरकार में इस यूनिवर्सिटी का निर्माण शुरू हुआ, तब वहां विकास प्राधिकरण का प्रभावी दखल नहीं था। उस समय जिला पंचायत ने इसका नक्शा पास किया था। विडंबना यह है कि 2005 में नगर विकास मंत्री रहते हुए स्वयं आजम खान ने ही उस विकास प्राधिकरण का गठन किया था, जो आज इस यूनिवर्सिटी को अवैध मान रहा है।

यूजीसी (UGC) की सकारात्मक रिपोर्ट: साल 2014 में यूजीसी की एक टीम ने यूनिवर्सिटी का दौरा किया था। अपनी रिपोर्ट में टीम ने स्पष्ट लिखा था कि यह यूनिवर्सिटी किसी व्यावसायिक (Commercial) उद्देश्य से नहीं चल रही है और अन्य प्राइवेट विश्वविद्यालयों की तुलना में यहां की फीस भी काफी कम है।

छात्रों का भविष्य: वर्तमान में इस विश्वविद्यालय में 14 फैकल्टी और 16 विभागों के तहत लगभग 3,000 छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। श्री अग्रवाल ने बेहद तार्किक सवाल उठाया कि जब देश भर में एक लाख से अधिक स्कूल बंद हो रहे हैं, ऐसे में चल रहे एक शिक्षण संस्थान को ढहाना कहां तक उचित है? यदि निर्माण मानकों में कोई कमी है, तो सरकार को इसे ढहाने के बजाय इसके प्रबंधन को अपने हाथ में ले लेना चाहिए या इसे वैध (Regularize) करने के विकल्प तलाशने चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार नीरज महेरे का विश्लेषण: "राजनीतिक प्रतिशोध से बचना चाहिए"
कार्यक्रम के दूसरे विशेषज्ञ, वरिष्ठ पत्रकार नीरज महेरे ने इस मुद्दे के राजनीतिक परिणामों पर अपनी बेबाक राय रखी:

राजनीतिक द्वेष का संदेश: नीरज महेरे ने कहा कि यह पूरी कार्रवाई स्पष्ट रूप से राजनीतिक द्वेष और आजम खान के राजनीतिक अस्तित्व को पूरी तरह से समाप्त करने की मंशा से प्रेरित नजर आती है। लेकिन ऐसा करना सत्ता पक्ष के लिए नुकसानदेह भी हो सकता है, क्योंकि इससे अल्पसंख्यक समुदाय और सपा समर्थक सहानुभूति के चलते पूरी तरह लामबंद हो सकते हैं।

अन्य संस्थानों से तुलना: उन्होंने लखनऊ के प्रतिष्ठित नदवा कॉलेज और अन्य पुराने संस्थानों का उदाहरण देते हुए कहा कि देश में 50-60 साल पुरानी कई ऐसी इमारतें और शिक्षण संस्थान हैं, जिनके पास शायद आज के मानकों के हिसाब से नक्शे नहीं होंगे। तो क्या उन सभी को गिरा दिया जाएगा?

शिक्षा का सम्मान: नीरज ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक लड़ाइयां अपनी जगह हैं, लेकिन एक शिक्षण संस्थान जहां किसी भी जाति या धर्म के बच्चे पढ़ सकते हैं उसे राजनीतिक रंजिश का शिकार बनाना एक बेहद गलत परिपाटी को जन्म देता है। उन्होंने अपील की कि सरकार को इस मामले में बड़ा दिल दिखाना चाहिए और शिक्षा के इस केंद्र को बर्बाद होने से बचाना चाहिए।

'जनपथ' की इस बेहद विस्तृत और संतुलित चर्चा का लब्बोलुआब यह रहा कि जौहर यूनिवर्सिटी का निर्माण भले ही आजम खान ने कराया हो, लेकिन आज यह हजारों छात्रों के भविष्य से जुड़ा एक सार्वजनिक संस्थान है। विशेषज्ञों का एकमत से यही मानना था कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का खामियाजा शिक्षा के मंदिर और निर्दोष छात्रों को नहीं भुगतना चाहिए। अब सभी की निगाहें हाई कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि इस विश्वविद्यालय का भविष्य क्या होगा।


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