RSS प्रमुख के बयान पर संग्राम: पेपर लीक और वोट चोरी पर चुप्पी क्यों?
विजयादशमी भाषण में मोहन भागवत के विदेशी साजिश वाले बयान पर सियासी घमासान, जनपथ में वरिष्ठ पत्रकारों ने उठाए पेपर लीक और चुनावी जवाबदेही पर गंभीर सवाल।
Janpath: 'द फ़ेडरल' न्यूज़ नेटवर्क के खास कार्यक्रम 'जनपथ' में विजयादशमी के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत द्वारा दिए गए भाषण पर एक विस्तृत और तीखी चर्चा हुई। इस कार्यक्रम का संचालन पत्रकार मनीष ने किया, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ला और नवीन निगम बतौर मेहमान शामिल हुए। चर्चा का मुख्य केंद्र मोहन भागवत का वह बयान था जिसमें उन्होंने देश में अस्थिरता फैलाने के लिए 'विदेशी ताकतों' और उनके 'पिठुओं' को जिम्मेदार ठहराया था।
भागवत के बयान के निहितार्थ और कार्यक्रम की प्रस्तावना
कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए एंकर मनीष ने दर्शकों को विजयादशमी की शुभकामनाएं दीं और बताया कि आज ही के दिन आरएसएस की स्थापना हुई थी। मनीष ने बताया कि अपने वार्षिक संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि भारत में बांग्लादेश और फ्रांस जैसे हालात पैदा करने की कोशिश की जा रही है। भागवत के अनुसार, दुनिया की कुछ ऐसी शक्तियां हैं जो भारत को दबाना चाहती हैं और सत्ता परिवर्तन कर हालात सुधारने के बजाय अपने 'पिठुओं' (कठपुतलियों) को सत्ता में बैठाना चाहती हैं। मनीष ने इस बात पर भी जोर दिया कि भागवत का यह आक्रामक बयान ऐसे समय में आया है जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार आरएसएस और मोहन भागवत पर निशाना साध रहे हैं।
वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ला का विश्लेषण: "बिना नाम लिए विदेशी ताकतों का हौव्वा"
वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ला ने भागवत के दावों पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित थे:
सरकार की चुप्पी पर सवाल: सुनील शुक्ला ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के शासनकाल में विदेशी ताकतों से सचेत करने का काम मोहन भागवत कर रहे हैं। उन्होंने 2012, 2013 और 2014 के दौरान नरेंद्र मोदी के भाषणों की याद दिलाई, जब वह कहते थे कि "किसी की ताकत नहीं है कि आंख उठाकर हमारी तरफ देख ले"।
विदेशी ताकतों का नाम क्यों नहीं?: शुक्ला ने सवाल उठाया कि अगर आरएसएस और सत्ता पक्ष को पता है कि देश में कौन सी विदेशी ताकतें अपने 'पिठ्ठू' बैठाना चाहती हैं, तो उनका नाम क्यों नहीं बताया जाता?। उन्होंने कहा कि देश को आगाह करने के लिए उन ताकतों का नाम उजागर करना आवश्यक है।
राजनयिक संबंधों पर टिप्पणी: शुक्ला ने स्पष्ट किया कि आज तक भारत सरकार ने किसी भी देश को आधिकारिक तौर पर दुश्मन देश घोषित नहीं किया है (शत्रु देशों को छोड़कर), न ही किसी देश के साथ राजनीतिक संबंध खत्म किए हैं।
फ्रांस और बांग्लादेश से तुलना गलत: फ्रांस और बांग्लादेश में हो रहे प्रदर्शनों का उदाहरण दिए जाने पर शुक्ला ने कहा कि फ्रांस में आंदोलनकारियों का दमन उस तरह से नहीं होता जैसा हिंदुस्तान में हुआ है।
विरोध प्रदर्शन के अधिकार का हनन: शुक्ला ने कहा कि आरएसएस की परिकल्पना एक 'आज्ञापालक समाज' बनाने की है, जहाँ प्रदर्शन, बहस या असहमति के लिए कोई जगह न हो।
प्रदर्शन स्थलों को दूर करना: लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार का जिक्र करते हुए शुक्ला ने कहा कि 1947 से लेकर हाल के कुछ वर्षों तक संसद के आसपास विरोध प्रदर्शन की जगह होती थी। लेकिन अब, बुराड़ी का मैदान सत्ता प्रतिष्ठान से 24 किलोमीटर दूर है, सीबीडीटी (CBDT) का मैदान 15 किलोमीटर दूर है, और रामलीला मैदान 6 किलोमीटर दूर है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सरकार चाहती है कि लोग अपने घरों के अंदर ही विरोध प्रदर्शन करें।
आंदोलन समस्याओं के समाधान के लिए होते हैं: शुक्ला ने स्पष्ट किया कि जुलाई में जो विद्यार्थी सड़कों पर आए, वे शिक्षा और नीट (NEET) जैसी परीक्षाओं के पेपर लीक के सवाल पर आए थे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलनों से समाधान खोजा जाता है, देश टूटता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन छात्रों ने पेपर लीक पर प्रदर्शन किया, पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
नवीन निगम का विश्लेषण: "चुनावी मोड और वोट बैंक की राजनीति"
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए नवीन निगम ने आरएसएस और बीजेपी की कार्यप्रणाली को चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा। उन्होंने कई गंभीर मुद्दे उठाए:
लगातार चुनावी मोड: निगम ने कहा कि बीजेपी की सरकार और आरएसएस 24 घंटे, सातों दिन (24/7) केवल चुनाव के मूड में रहते हैं। उनके हर भाषण का उद्देश्य यह देखना होता है कि इससे उन्हें चुनाव में क्या फायदा या नुकसान होगा।
विदेशी साजिश का नैरेटिव: निगम ने बताया कि परसों के कार्यक्रम में ही उन्होंने अंदेशा जताया था कि यूरोप की सारी गतिविधियों को भारत से जोड़कर एक नैरेटिव गढ़ा जाएगा। उन्होंने कहा कि फ्रांस की घटनाओं को भारत के अखबारों (हिंदी और अंग्रेजी दोनों) ने प्रमुखता से पहले पन्ने पर छापा, जबकि अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को आमतौर पर दूसरे या तीसरे पन्ने पर जगह मिलती है। यह सब एक प्रचार तंत्र का हिस्सा है।
इजरायल के काउंसलर की उपस्थिति: निगम ने एक नई बात की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि इस बार के विजयादशमी कार्यक्रम में इजरायल के काउंसलर भी शामिल हुए, जो एक नई तरह की घटना है।
शिक्षा व्यवस्था और वैचारिक कब्जा: राहुल गांधी द्वारा विश्वविद्यालयों में आरएसएस के लोगों की नियुक्ति के आरोपों का समर्थन करते हुए निगम ने कहा कि देश के सभी बेहतरीन विश्वविद्यालयों (जैसे जेएनयू, इलाहाबाद, जामिया, बीएचयू) में वैचारिक आधार पर नियुक्तियां हो रही हैं। उन्होंने कहा कि यदि आप केवल एक विचारधारा को प्रोत्साहित करेंगे, तो शैक्षणिक संस्थानों की गुणवत्ता और मेरिट के साथ समझौता होगा।
नीट (NEET) और धर्मेंद्र प्रधान: निगम ने कहा कि जब शिक्षा और पेपर लीक के मुद्दे पर छात्रों ने आंदोलन किया, तो सरकार को धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सिर्फ इसलिए कराना पड़ा ताकि युवाओं की नाराजगी को दूर किया जा सके।
चुनाव आयोग और 14 करोड़ मतदाता: निगम ने मोहन भागवत के भाषण में चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल न उठाने पर भी निराशा व्यक्त की। उन्होंने पूछा कि भागवत ने यह क्यों नहीं पूछा कि देश के 14 करोड़ मतदाताओं का मताधिकार कैसे छीन लिया गया?। उन्होंने आरटीआई एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज का हवाला देते हुए बताया कि चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर (SIR) में 'घुसपैठियों' की पहचान करने का कोई तरीका ही नहीं है। इसके बावजूद, घुसपैठियों के नाम पर लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।
'द फ़ेडरल' की इस चर्चा का लब्बोलुआब यह रहा कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का बयान मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने का एक राजनीतिक प्रयास है। दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने सहमति जताई कि जब सरकार बेरोजगारी, पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था की गिरती गुणवत्ता और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता जैसे वास्तविक मुद्दों पर घिरती है, तो वह 'विदेशी साजिश' और 'घुसपैठियों' का नैरेटिव गढ़कर अपने वोट बैंक को संतुष्ट करने की कोशिश करती है। पत्रकारों के अनुसार, एक मजबूत लोकतंत्र के लिए पारदर्शी चुनाव, असहमति का सम्मान और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का होना अत्यंत आवश्यक है, जिसे वर्तमान व्यवस्था में कुचला जा रहा है।
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