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फास्ट-ट्रैक का दांव: क्या थमेगा छात्रों का गुस्सा या बढ़ेगा बवाल?

नीट-नेट पेपर लीक पर पीएम मोदी के फास्ट-ट्रैक कोर्ट के आश्वासन के बावजूद शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और पारदर्शी व्यवस्था की मांग पर अड़े छात्र व विपक्ष।


Janpath: नीट (NEET) और यूजीसी-नेट (UGC-NET) परीक्षाओं में हुई कथित धांधली और पेपर लीक मामलों को लेकर देशभर में छात्रों का आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक तरफ जहां राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए यह आश्वासन दिया है कि दोषियों को सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट्स (Fast-Track Courts) का गठन किया जाएगा।


इसी गंभीर मुद्दे और प्रशासनिक प्रतिक्रियाओं पर 'द फ़ेडरल देश' के विशेष शो 'जनपथ' में गहराई से चर्चा की गई। इस परिचर्चा में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राकेश अहीर और वरिष्ठ पत्रकार नीरज मेहरे शामिल हुए।

1. एंकर द्वारा उठाए गए मुख्य सवाल
अचानक फास्ट-ट्रैक कोर्ट क्यों?: चर्चा की शुरुआत करते हुए एंकर ने पीएम मोदी के सोशल मीडिया संदेश का हवाला दिया, जिसमें युवाओं के भविष्य को प्राथमिकता बताते हुए दोषियों को न बख्शने का वादा किया गया है। हालांकि, शो में यह सवाल उठाया गया कि जब छात्र मुख्य रूप से शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं, तो अचानक फास्ट-ट्रैक कोर्ट का विचार कहाँ से आ गया?

सजा की दर (Conviction Rate) पर सवाल: चर्चा के दौरान राहुल गांधी के बयान का जिक्र किया गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि पिछले 10 सालों में जितने भी पेपर लीक के मामले सामने आए हैं, उनमें से शायद ही किसी आरोपी को ठोस सजा मिल पाई हो। ऐसे में क्या फास्ट-ट्रैक कोर्ट से छात्रों को संतुष्ट किया जा सकेगा?

2. राकेश अहीर (समाजवादी पार्टी प्रवक्ता) का पक्ष
देर से जागी सरकार: जंतर-मंतर पर 6 जून से जारी प्रदर्शन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार की नींद बहुत देर से खुली है। देश में पिछले 10 वर्षों के दौरान 152 से अधिक पेपर लीक के मामले हो चुके हैं, जिसने करोड़ों युवाओं के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है।

संवाद का अभाव और दमन: सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि नैतिक जिम्मेदारी यह थी कि प्रशासन छात्रों से सीधे बात करता, लेकिन इसके उलट प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग, लाठीचार्ज और उत्पीड़न किया गया। यहाँ तक कि आतंकवादियों के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले साधनों का इस्तेमाल भी छात्रों पर किया गया।

इस्तीफे और पारदर्शी जांच की मांग: फास्ट-ट्रैक कोर्ट को 'बड़ी मछलियों' को बचाने का जरिया बताते हुए उन्होंने कहा कि जब तक शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते, तब तक विपक्ष और छात्र अपनी मांग पर कायम रहेंगे। उन्होंने यूपी में 69,000 शिक्षक भर्ती और नीति आयोग की उस रिपोर्ट का भी हवाला दिया जिसके मुताबिक प्राथमिक शिक्षा ढांचा चरमरा रहा है।

3. नीरज मेहरे (वरिष्ठ पत्रकार) का विश्लेषण
लोकतांत्रिक संवाद की कमी: पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलनकारियों से संवाद पहला कदम होना चाहिए। यदि सरकार समय रहते धरने पर बैठे छात्रों से बात कर लेती, तो स्थिति इतनी जटिल नहीं होती।

दिल्ली से बाहर फैलता आंदोलन: उन्होंने ध्यान दिलाया कि यह आक्रोश केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। अब वाराणसी, प्रयागराज, लखनऊ, जयपुर और देहरादून तक छात्र सड़कों पर आ चुके हैं। उत्तराखंड में तो प्रदर्शनकारियों ने सचिवालय का घेराव तक कर दिया।

राजनीतिक परिणाम: इतिहास का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जब भी देश में युवाओं का बड़ा आंदोलन हुआ है, सरकारों को बैकफुट पर आना पड़ा है। आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर भी इस छात्र असंतोष का सीधा प्रभाव देखने को मिल सकता है। उन्होंने कहा कि 16 मेट्रो स्टेशनों को बंद करना और सड़कें रोकना यह दर्शाता है कि आम जनता को परेशानी में डालकर सरकार केवल अपनी जिद्द पर अड़ी है।

चर्चा के अंत में यह बात साफ होकर सामने आई कि केवल फास्ट-ट्रैक कोर्ट का ऐलान कर देने से छात्रों और अभिभावकों का खोया हुआ भरोसा वापस नहीं लाया जा सकता। जब तक NTA जैसी संस्थाओं में सुधार नहीं होता, शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय नहीं की जाती और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं आती, तब तक सड़क से लेकर संसद तक यह संग्राम जारी रहने के आसार हैं।


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