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'लूट तो हो गई, पर लुटेरा कोई नहीं...', राम मंदिर चंदे पर अहम खुलासा

Janpath Show Lalit Rai 2026: राम मंदिर चंदा चोरी विवाद पर वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान और सुनील शुक्ला का बड़ा विश्लेषण। SIT जांच को बताया महज एक छलावा।


Janpath: अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे और चंदे में कथित हेराफेरी का मामला एक बार फिर देश की राजनीति और सोशल मीडिया पर गरमा गया है। डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फेडरल' के लोकप्रिय डिबेट शो 'जनपथ' में इस मुद्दे पर एक बेहद गहन चर्चा देखने को मिली। शो के एंकर ललित राय ने उत्तर प्रदेश की सियासत और जमीनी हकीकत पर गहरी पकड़ रखने वाले दो वरिष्ठ पत्रकारों शरत प्रधान और सुनील शुक्ला ने इस पूरे घटनाक्रम का कड़ा विश्लेषण किया और मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए।


चंपत राय की चौपाई और 'X' पर छिड़ी जंग
गहन चर्चा की शुरुआत चंपत राय (राम मंदिर ट्रस्ट के पूर्व महासचिव) द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर पोस्ट की गई एक चिट्ठी से हुई। इस चिट्ठी में उन्होंने रामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाई का हवाला देते हुए लिखा कि "आपदा के समय में धीरज, धर्म, मित्र और नारी की परीक्षा होती है।"

इस पर तंज कसते हुए वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान ने कहा, "चंपत राय की नज़र में कुछ गलत हुआ ही नहीं है। उनके लिए शायद यह सब एक आम रूटीन की तरह था। वे एक बेहद आक्रामक और अहंकारी आचरण वाले व्यक्ति रहे हैं, जिन्हें खुद देश के शीर्ष नेतृत्व का संरक्षण प्राप्त था। अब जब इस बड़े घोटाले की परतें खुली हैं, तो इल्ज़ाम छोटे कार्यकर्ताओं पर मढ़कर मुख्य किरदारों को बचाने की कोशिश की जा रही है।" शरत प्रधान ने इस मामले की तुलना दिल्ली के बहुचर्चित 'जेसिका लाल हत्याकांड' से करते हुए कहा कि यह स्थिति वैसी ही बनती जा रही है जहाँ "लूट तो हो गई, पर लुटेरा कोई नहीं है।"

कोषाध्यक्ष गोविंद गिरि की भूमिका पर सवाल
शो के दौरान राम मंदिर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरि के उस बयान पर भी तीखी प्रतिक्रिया हुई, जिसमें उन्होंने खुद को इस पूरे प्रकरण से अलग बताते हुए 'क्लीन चिट' देने की कोशिश की थी। गोविंद गिरि का तर्क था कि के. परासरण (देश के दिग्गज वकील) के अनुसार ट्रस्ट के संविधान में इस्तीफा स्वतः ही स्वीकार्य मान लिया जाता है, इसलिए उनकी इसमें कोई सीधी भूमिका नहीं है।

इस पर वरिष्ठ विश्लेषक सुनील शुक्ला ने उन्हें कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा, "अगर गोविंद गिरि जी की कोई भूमिका ही नहीं थी, तो वे किस बात के कोषाध्यक्ष हैं? एक संत का काम त्याग और पारदर्शिता का होता है। यदि उन्हें काम करने का अवसर नहीं मिल रहा था, तो उन्हें तुरंत पद छोड़ देना चाहिए था।" शुक्ला ने याद दिलाया कि राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के दौरान मंच पर प्रधानमंत्री और संघ प्रमुख के साथ जो पाँच विशिष्ट लोग मौजूद थे, उनमें गोविंद गिरि भी एक थे। ऐसे में वे अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते।

करोड़ों के घोटाले का गणित और सियासी फॉलआउट
एंकर ललित राय ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत के उस गणित का ज़िक्र किया, जिसमें कुंभ मेले और अन्य अवसरों पर आए करोड़ों श्रद्धालुओं के अनुमानित दान के मुकाबले ट्रस्ट द्वारा दिखाए गए आंकड़ों में भारी अंतर (करीब 3116 करोड़ रुपये के कथित अंतर) की बात कही गई है।

ललित राय ने पूछा कि क्या आगामी उत्तर प्रदेश चुनावों में विपक्ष को 'राम के नाम' पर ही भाजपा को घेरने का एक बड़ा हथियार मिल गया है?

इसका जवाब देते हुए सुनील शुक्ला ने कहा, "यह मुद्दा इतनी आसानी से दफन नहीं होगा। जिस आस्था के नाम पर जनता ने राजनीतिक ताकत सौंपी, उसी आस्था के साथ खिलवाड़ होने पर जनता में भारी आक्रोश है। हालांकि, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे विपक्षी दलों को इसका राजनीतिक लाभ तभी मिलेगा जब वे सिर्फ बयानों तक सीमित न रहकर लगातार बड़े आंदोलन और राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित करेंगे।"

'एसआईटी' जांच को बताया छलावा
गहन चर्चा के अंत में दोनों ही विश्लेषक इस बात पर एकमत दिखे कि मामले को दबाने के लिए बनाई गई एसआईटी (SIT) और जांच कमेटियां महज़ एक 'आई-वॉश' (दिखावा) हैं। शरत प्रधान ने अपने 48 साल के पत्रकारिता के अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी कमेटियां अक्सर सच को सामने लाने के लिए नहीं, बल्कि रसूखदार लोगों को बचाने और जनता का ध्यान भटकाने के लिए बनाई जाती हैं।

इस बेबाक चर्चा ने यह साफ़ कर दिया है कि राम मंदिर चंदे का यह विवाद आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति की दिशा तय करने में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।


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