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जनपथ: राम मंदिर ट्रस्ट के नए CEO क्या रोक पाएंगे भ्रष्टाचार?

क्या राम मंदिर ट्रस्ट में नए CEO की नियुक्ति से पारदर्शिता आएगी या यह महज एक दिखावा है? 'द फ़ेडरल देश' के शो 'जनपथ' में एंकर मनीष कुमार के साथ विशेषज्ञों का सटीक विश्लेषण।


Janpath: अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के साथ ही 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' लगातार विवादों के साये में रहा है। जमीन खरीद में कथित घोटाले से लेकर चंदे की चोरी तक के गंभीर आरोपों के बाद, अब ट्रस्ट एक नए मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की तलाश कर रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या महज एक नए CEO की नियुक्ति से ट्रस्ट के कामकाज में पारदर्शिता आएगी या यह सिर्फ पुरानी गलतियों पर पर्दा डालने की एक कॉस्मेटिक कोशिश है?


'द फ़ेडरल देश' के शो 'जनपथ' में एंकर मनीष कुमार ने इसी ज्वलंत मुद्दे पर गहन चर्चा की। इस चर्चा में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता धर्मेंद्र कुमार सिंह और वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ल ने ट्रस्ट की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक ढांचे और संघ (RSS) के नियंत्रण को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए।

ट्रस्ट की जवाबदेही पर सवाल: विशेषज्ञों ने पूछा कि जब ट्रस्ट में पहले से ही गृह सचिव और जिलाधिकारी जैसे शीर्ष अधिकारी पदेन सदस्य हैं, तो भ्रष्टाचार कैसे हुआ?

जांच (SIT) की निष्पक्षता: जमीन और चंदे के मामलों की जांच कर रही SIT की विश्वसनीयता पर सवाल, क्योंकि जांच उन्हीं अधिकारियों के पास है जिन पर खुद पुराने आरोप हैं।

अन्य मंदिरों से तुलना: तिरुपति बालाजी, माता वैष्णो देवी और सोमनाथ मंदिर की तरह राम मंदिर में सरकारी और पारदर्शी नियंत्रण क्यों नहीं है?

क्या नया CEO स्वतंत्र होगा?: जब पूरा नियंत्रण एक खास विचारधारा (RSS) से जुड़े लोगों के पास है, तो नया CEO बिना किसी दबाव के स्वतंत्र फैसले कैसे ले पाएगा?

महज दिखावा है CEO की नियुक्ति?
शो के दौरान वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ल ने स्पष्ट किया कि केवल एक नया कार्यकारी अधिकारी ले आने से कुप्रबंधन नहीं रुकेगा। उन्होंने तर्क दिया कि देश के अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों (जैसे तिरुपति, काशी विश्वनाथ या वैष्णो देवी) का संचालन संसदीय या विधानसभा के अधिनियमों के तहत होता है, जहां पूरी पारदर्शिता और जवाबदेही तय होती है। इसके विपरीत, राम मंदिर ट्रस्ट को एक विशेष संगठन के नियंत्रण में दे दिया गया है। ऐसे में, जब तक ट्रस्ट के मूल ढांचे और नियंत्रण व्यवस्था को नहीं बदला जाता, तब तक नए CEO की नियुक्ति सिर्फ एक 'आईवाश' (Eyewash) यानी दिखावा है।

प्रशासनिक विफलता और जांच पर संदेह
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता धर्मेंद्र कुमार सिंह ने ट्रस्ट में चल रही प्रशासनिक विफलताओं पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट के गठन (फरवरी 2020) के बाद से ही जमीन की खरीद-फरोख्त में हेराफेरी और चंदे की चोरी की शिकायतें आम हो गई हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मंदिर प्रबंधन में जिलाधिकारी और वरिष्ठ IAS अधिकारी पदेन सदस्य के रूप में मौजूद हैं, तो उनकी नाक के नीचे इतनी बड़ी चोरियां कैसे हो गईं?

उन्होंने जांच कमेटियों (SIT) को भी कठघरे में खड़ा किया और आरोप लगाया कि जांच जानबूझकर उन अधिकारियों को सौंपी गई है, जो पहले से ही महाकुंभ जैसे अन्य मामलों में विवादों में रहे हैं। एसपी प्रवक्ता ने मौजूदा ट्रस्ट को पूरी तरह भंग कर एक नए और पारदर्शी बोर्ड के गठन की मांग की।

आगे क्या?
एंकर मनीष कुमार ने चर्चा का समापन इस मूल सवाल के साथ किया कि अगस्त के अंत तक जो भी नया CEO कार्यभार संभालेगा, क्या उसके पास वास्तव में कड़े फैसले लेने के अधिकार होंगे, या वह केवल ट्रस्ट के महासचिव (चंपत राय) और मौजूदा पदाधिकारियों के निर्देशों का पालन करने वाला एक 'डमी' अधिकारी बनकर रह जाएगा?

करोड़ों रामभक्तों की आस्था के इस केंद्र में पारदर्शिता और शुचिता कैसे लौटेगी, यह देखना अभी बाकी है।


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