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कमाल अख्तर का इस्तीफा; अखिलेश का डैमेज कंट्रोल या रुचि वीरा की शर्त?

यूपी चुनाव 2027 से पहले सपा मुख्य सचेतक कमाल अख्तर का इस्तीफा; मुरादाबाद में 'सांसद बनाम विधायक' की अंदरूनी जंग और आजम खान फैक्टर की पूरी इनसाइड स्टोरी।


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Janpath: उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव (2027) से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) के भीतर एक बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया है। सपा के बेहद वरिष्ठ नेता, पूर्व राज्यसभा सांसद और कैबिनेट मंत्री रहे कमाल अख्तर ने अचानक पार्टी के मुख्य सचेतक (Chief Whip) के पद से इस्तीफा दे दिया है। खास बात यह है कि कमाल अख्तर ने खुद स्वीकार किया है कि उन्होंने सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के कहने पर यह इस्तीफा दिया।


'द फेडरल देश' के खास शो 'जनपथ' में एंकर प्रदीप सहगल के साथ सपा प्रवक्ता मोहम्मद आजम और वरिष्ठ पत्रकार नितिन श्रीवास्तव ने इस इस्तीफे के पीछे छिपी मुरादाबाद की 'इंटरनल पॉलिटिक्स' और इसके दूरगामी सियासी मायनों का दिलचस्प विश्लेषण किया।


1. कमाल अख्तर का इस्तीफा: अखिलेश का आदेश या नेचुरल प्रोसेस?
चर्चा की शुरुआत में सपा प्रवक्ता मोहम्मद आजम ने कमाल अख्तर के इस्तीफे को एक सामान्य और स्वाभाविक प्रक्रिया (Natural Process) बताया। उन्होंने कंट्रोवर्सी को खारिज करते हुए कहा:

"कमाल अख्तर साहब समाजवादी पार्टी के एक बहुत ही सीनियर, पढ़े-लिखे और अनुशासित लीडर हैं। मुख्य सचेतक का पद कोई स्थायी पद नहीं होता, यह समय-समय पर रोटेट होता रहता है। एक अनुशासित सिपाही की तरह उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव जी के आदेश का पालन किया है।" — मोहम्मद आजम, प्रवक्ता, सपा

सपा प्रवक्ता ने संकेत दिया कि अखिलेश यादव अपने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के तहत संगठन को और धार देने के लिए आगामी मानसून सत्र से पहले किसी अति-पिछड़े या अति-दलित चेहरे को मुख्य सचेतक की जिम्मेदारी सौंप सकते हैं।

2. इनसाइड स्टोरी: मुरादाबाद की 'सांसद बनाम विधायक' जंग और रुचि वीरा की शर्त
हालांकि, लखनऊ से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार नितिन श्रीवास्तव ने इस इस्तीफे के पीछे की असली 'क्रोनोलॉजी' और अंदरूनी कलह का पर्दाफाश किया। उन्होंने बताया कि यह विवाद मुरादाबाद के राजनीतिक वर्चस्व से जुड़ा है, जहां से रुचि वीरा लोकसभा सांसद हैं और कमाल अख्तर उसी लोकसभा के तहत आने वाली काठ विधानसभा सीट से विधायक हैं।

आजम खान फैक्टर और टूटने का डर

आजम खान कोटे की रुचि वीरा: रुचि वीरा को सपा के कद्दावर नेता आजम खान का बेहद करीबी माना जाता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में एसटी हसन का टिकट काटकर आखिरी वक्त पर उन्हें मुरादाबाद से लड़ाया गया था।

बीजेपी में जाने की चर्चा और शर्त: राजनीतिक गलियारों में यह जोर-शोर से चर्चा थी कि रुचि वीरा के साथ मतभेद के चलते सपा में बड़ी टूट हो सकती है और वे बीजेपी खेमे की तरफ रुख कर सकती हैं।

रुचि वीरा की शर्त पर इस्तीफा
: नितिन श्रीवास्तव ने सूत्रों के हवाले से बताया कि अखिलेश यादव ने यह बड़ा कदम उठाकर एक बहुत बड़ा डैमेज कंट्रोल किया है। कमाल अख्तर से इस्तीफा लेना दरअसल सांसद रुचि वीरा को मनाने की एक बड़ी शर्त थी, ताकि पार्टी को पश्चिमी यूपी में टूटने से बचाया जा सके।

3. सोशल मीडिया पर 'अखिलेश के प्रति वफादारी' और राजभर पर पलटवार
दिलचस्प बात यह है कि इन विवादों के बीच कमाल अख्तर और रुचि वीरा, दोनों ने ही सोशल मीडिया पर अखिलेश यादव को उनके 53वें जन्मदिन की बधाई देकर अपनी वफादारी का प्रदर्शन किया है। रुचि वीरा ने तो अपने आवास पर बकायदा 53 फीट का केक काटकर जश्न मनाया।

ओपी राजभर के 'टूट' वाले बयान पर तीखा पलटवार
सुभासपा नेता ओम प्रकाश राजभर के उस बयान पर, जिसमें उन्होंने कहा था कि सपा के कई सांसद और विधायक एनडीए के संपर्क में हैं, सपा प्रवक्ता और पत्रकार दोनों ने करारा जवाब दिया।

सपा प्रवक्ता ने कहा कि राजभर अपनी 9 विधायकों वाली पार्टी नहीं संभाल पा रहे हैं, उनके आधे विधायक खुद सपा का झंडा लगाकर घूम रहे हैं और टिकट के लिए लाइन में लगे हैं।

नितिन श्रीवास्तव ने खुलासा किया कि हाल ही में सुभासपा के नेताओं का एक 'स्टिंग ऑपरेशन' सामने आया था, जिसमें वे पैसे के बदले विधानसभा टिकट बेचने की बात कर रहे थे। राजभर केवल उस बदनामी और डैमेज से मीडिया का ध्यान भटकाने के लिए सपा पर अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं।

4. क्या अल्पसंख्यकों के साथ हो रहा है सौतेला व्यवहार?
एंकर प्रदीप सहगल ने सवाल उठाया कि कमाल अख्तर जैसे बड़े अल्पसंख्यक चेहरे से इस्तीफा मांगकर क्या सपा ने विपक्ष (और सहयोगी कांग्रेस) को माइनॉरिटी कार्ड खेलने का मौका दे दिया है?

सपा प्रवक्ता मोहम्मद आजम ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि सपा में मुसलमानों की हिस्सेदारी सबसे मजबूत है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा में सपा के 100 विधायकों में से 32-33 विधायक मुस्लिम हैं, जो देश के किसी भी राजनीतिक दल (यहां तक कि कांग्रेस) की तुलना में सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि असम जैसे राज्यों में जहां सपा नहीं है, वहां मुसलमान कांग्रेस के साथ जा रहे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में आज भी मुस्लिम समाज पूरी तरह से अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के साथ इंटैक्ट है।


'जनपथ' शो के इस गंभीर विश्लेषण से साफ है कि कमाल अख्तर का इस्तीफा केवल संगठनात्मक फेरबदल नहीं, बल्कि 2027 के महामुकाबले से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आजम खान समर्थकों (रुचि वीरा गुट) को संतुष्ट रखने और किसी भी संभावित बड़ी टूट को रोकने के लिए अखिलेश यादव का एक बेहद सधा हुआ और समय पर किया गया 'डैमेज कंट्रोल' है।


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